प्रश्न 1.
1. 'भाषा योग वासिष्ठ' के लेखक हैं–
(A) मुंशी सदासुखलाल
(B) सदल मिश्र
(C) रामप्रसाद निरंजनी
(D) मुंशी इंशा अल्लाह खाँ।
उत्तर:
(C) रामप्रसाद निरंजनी
व्याख्या: 'भाषा योग वासिष्ठ' की रचना 1741 ई. में रामप्रसाद निरंजनी ने की थी।
Up Board Class 9th Half yearly Paper 2026 Set 3
कक्षा 9वीं · हिंदी · 2026 · अर्धवार्षिक
1. 'भाषा योग वासिष्ठ' के लेखक हैं–
(A) मुंशी सदासुखलाल
(B) सदल मिश्र
(C) रामप्रसाद निरंजनी
(D) मुंशी इंशा अल्लाह खाँ।
उत्तर:
(C) रामप्रसाद निरंजनी
व्याख्या: 'भाषा योग वासिष्ठ' की रचना 1741 ई. में रामप्रसाद निरंजनी ने की थी।
2. 'मेरा जीवन प्रवाह' किसकी रचना है?
(A) वियोगी हरि
(B) वृन्दावन लाल वर्मा
(C) जयशंकर प्रसाद
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
(A) वियोगी हरि
व्याख्या: 'मेरा जीवन प्रवाह' वियोगी हरि जी की प्रसिद्ध आत्मकथा है।
3. द्विवेदी युग की समय क्या है?
(A) 1900–1922 ई.
(B) 1910–1972 ई.
(C) 1920–1942 ई.
(D) 1930–1952 ई.
उत्तर:
(A) 1900–1922 ई.
व्याख्या: हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग की समयावधि 1900 ई. से 1922 ई. तक मानी जाती है।
4. 'इन्दुमती' किस विधा की रचना है–
(A) कहानी
(B) नाटक
(C) निबन्ध
(D) उपन्यास।
उत्तर:
(A) कहानी
व्याख्या: 'इन्दुमती' किशोरीलाल गोस्वामी द्वारा रचित हिंदी की प्रथम कहानी मानी जाती है।
5. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की रचना है–
(A) अशोक के फूल
(B) त्रिवेणी
(C) साहित्य-सीकर
(D) कल्पवृक्ष।
उत्तर:
(C) साहित्य-सीकर
व्याख्या: 'साहित्य-सीकर' आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की रचना है।
6. रामभक्ति शाखा के कवि नहीं हैं–
(A) तुलसी
(B) अग्रदास
(C) चतुर्भुजदास
(D) नाभादास।
उत्तर:
(C) चतुर्भुजदास
व्याख्या: चतुर्भुजदास अष्टछाप के कवि हैं, जो कृष्णभक्ति शाखा से संबंधित हैं।
कौन अष्टछाप का कवि है–
(A) सूरदास
(B) नन्ददास
(C) कृष्णदास
(D) इनमें सभी।
उत्तर:
(D) इनमें सभी।
व्याख्या: सूरदास, नन्ददास और कृष्णदास तीनों ही अष्टछाप के प्रमुख कवियों में सम्मिलित हैं।
पूर्व-मध्यकाल किस काल को कहते हैं–
(A) आदिकाल
(B) भक्तिकाल
(C) रीतिकाल
(D) आधुनिक काल
उत्तर:
(B) भक्तिकाल
व्याख्या: हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल को पूर्व-मध्यकाल कहा जाता है।
'सूरसागर' किसकी रचना है–
(A) सूरदास की
(B) तुलसीदास की
(C) रसखान की
(D) केशवदास की।
उत्तर:
(A) सूरदास की
व्याख्या: 'सूरसागर' महाकवि सूरदास की सर्वप्रमुख एवं प्रसिद्ध काव्य रचना है।
आदि काल की भाषा है–
(A) ब्रज
(B) अवधी
(C) डिंगल
(D) भोजपुरी।
उत्तर:
(C) डिंगल
व्याख्या: आदिकाल (वीरगाथा काल) के साहित्य में डिंगल और पिंगल भाषा का प्रयोग प्रमुखता से हुआ है।
'श्रृंगार रस' का स्थायी भाव है–
(A) रति
(B) उत्साह
(C) शोक
(D) हास।
उत्तर:
(A) रति
व्याख्या: श्रृंगार रस का स्थायी भाव रति (प्रेम) होता है।
'चारू चन्दर की चंचल किरणें खेल रही हैं जल थल में' में कौन सा अलंकार है?
(A) अनुप्रास
(B) यमक
(C) श्लेष
(D) उपमा
उत्तर:
(A) अनुप्रास
व्याख्या: इस पंक्ति में 'च' और 'ल' वर्णों की बार-बार आवृत्ति हुई है, अतः यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
'तन अनुहरत सुचन्दन खोरी, स्यामल गौर मनोहर जोरी' में कौन सा छन्द है?
(A) दोहा
(B) चौपाई
(C) रोला
(D) बरवै
उत्तर:
(B) चौपाई
व्याख्या: इस पंक्ति के प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ हैं, अतः यहाँ चौपाई छन्द है।
'प्रतिदिन' में कौन–सा समास है–
(A) अव्ययी भाव
(B) कर्मधारय
(C) द्वन्द्व
(D) अव्ययीभाव
उत्तर:
(D) अव्ययीभाव
व्याख्या: 'प्रतिदिन' (विग्रह: प्रत्येक दिन) में प्रथम पद 'प्रति' अव्यय है, इसलिए यहाँ अव्ययीभाव समास है।
भाई–बहन, देवी–देवता के मध्य कौन विराम चिन्ह होगा–
(A) योजक
(B) अल्पविराम
(C) समता सूचक
(D) संक्षेप चिन्ह
उत्तर:
(A) योजक
व्याख्या: परस्पर सम्बद्ध या विपरीतार्थक युग्म शब्दों के बीच योजक चिह्न (-) का प्रयोग किया जाता है।
'दुर्भाग्य' का विलोम शब्द है–
(A) सौभाग्य
(B) निर्भाग्य
(C) अभाग्य
(D) कुभाग्य
उत्तर:
(A) सौभाग्य
व्याख्या: 'दुर्भाग्य' (बुरा भाग्य) का विलोम शब्द 'सौभाग्य' (अच्छा भाग्य) होता है।
गृह, सदन, गेह किसके पर्यायवाची हैं–
(A) रात के
(B) घर के
(C) खेल के
(D) नाग के
उत्तर:
(B) घर के
व्याख्या: गृह, सदन और गेह ये सभी शब्द 'घर' (आवास) के पर्यायवाची हैं।
हिमालय : से सन्धि है–
(A) दीर्घ
(B) यण
(C) गुण
(D) वृद्धि
उत्तर:
(A) दीर्घ
व्याख्या: हिम + आलय = हिमालय (अ + आ = आ), दो समान स्वरों के मेल से दीर्घ विकार होने के कारण यहाँ दीर्घ स्वर सन्धि है।
रामाय किस विभक्ति एवं वचन का रूप है–
(A) द्वितीया विभक्ति एकवचन
(B) सप्तमी विभक्ति, बहुवचन
(C) षष्ठी विभक्ति एकवचन
(D) चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।
उत्तर:
(D) चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।
व्याख्या: 'रामाय' शब्द अकारान्त पुल्लिंग 'राम' शब्द रूप का चतुर्थी विभक्ति, एकवचन रूप है।
'गच्छन्तु' किस लकार का रूप है?
(A) लट्लकार
(B) लृट्लकार
(C) लोट्लकार
(D) विधिलङ्ग लकार
उत्तर:
(C) लोट्लकार
व्याख्या: 'गच्छन्तु' शब्द 'गम्' (गच्छ) धातु का लोट्लकार (आज्ञार्थक), प्रथम पुरुष, बहुवचन का रूप है।
निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–
वही हरा भरा मैदान था, वही सुनहरी चाँदनी एक निःशब्द संगीत की भाँति प्रकृति पर छायी हुई थी, वही मित्र समाज था। वही मनोरंजन के सामान थे। मगर जहाँ हास्य की ध्वनि था, वहाँ अब करुण क्रन्दन और अश्रु प्रवाह था।
(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रकृति पर क्या छायी हुई थी?
अथवा
धन्य हो, हे अगम, अगोचर, अलख, अपार देव, तुमही मेरी चिन्ता करो जहाँ तक देखता हूँ वहाँ तक जल में, थल में, पृथ्वी में सर्वत्र तुम्हारी ही लीला व्याप्त है तथा घट-घट में तुम्हारी ज्योति उद्भासित हो रही है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) हजारों दीये किसके सामने स्वयं फीके पड़ गये ?
उत्तर:
मुख्य गद्यांश का हल:
(i) सन्दर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के गद्य-खण्ड में संकलित मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित 'मंत्र' शीर्षक कहानी से अवतरित है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या:
लेखक वर्णन करता है कि प्राकृतिक वातावरण और आसपास का दृश्य बिल्कुल वैसा ही शांत एवं मनोरम था जैसा पूर्व में था। वही हरा-भरा मैदान था, चाँदनी रात की नीरवता संगीत की भाँति व्याप्त थी तथा मित्रों का जमघट भी वही था। परंतु पहले जहाँ हँसी-खुशी और आनंद का माहौल था, वहीं अब भगत के पुत्र की अचानक मृत्यु हो जाने के कारण केवल करुण विलाप और अश्रुओं की धारा बह रही थी।
(iii) उत्तर:
प्रकृति पर सुनहरी चाँदनी एक निःशब्द संगीत की भाँति छायी हुई थी।
अथवा विकल्प वाले गद्यांश का हल:
(i) सन्दर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के गद्य-खण्ड में संकलित 'गुरु नानक देव' शीर्षक पाठ से उद्धृत है। इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या:
गुरु नानक देव जी ईश्वर की महिमा का गुणगान करते हुए कहते हैं कि हे सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, अलौकिक और असीम परमेश्वर! आप ही मेरी चिंता करने वाले हैं। मैं जहाँ भी देखता हूँ, जल, थल और संपूर्ण पृथ्वी में केवल आपकी ही अलौकिक लीला व्याप्त दिखाई देती है और प्रत्येक जीव के हृदय में आपकी ही दिव्य ज्योति प्रज्वलित हो रही है।
(iii) उत्तर:
सृष्टि के रचयिता परमेश्वर की प्रकृति-रूपी विशाल महाआरती के सम्मुख मनुष्यों द्वारा जलाए गए हजारों दीये स्वयं फीके पड़ गए।
निम्नलिखित में पद्यांशों में से किसी एक पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–
(क) बसो मेरे नैनन में नन्दलाल।
मोर मुकुट मकराकृति कुण्डल, अरुण तिलक दिए भाल।
मोहिन मूरति साँवरि सूरति, नैना बने विशाल।
अधर-सुधा-रस मुरली राजत, उर वैजन्ती माल।
क्षुद्र घटिका कटि-तट शोभित, नूपुर सबद रसाल।
मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भगत बछल गोपाल।
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) 'सुधा' के चार पर्यायवाची शब्द लिखिए।
(ख) जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापक नहिं लिपटे रहत भुजंग।
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) भुजंग के चार पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर:
(क) पद्यांश का हल:
(i) सन्दर्भ:
प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के काव्य-खण्ड में संकलित मीराबाई द्वारा रचित 'पदावली' शीर्षक काव्य से अवतरित है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या:
मीराबाई श्रीकृष्ण के मोहक रूप का वर्णन करते हुए कहती हैं कि हे नन्दलाल! आप मेरी आँखों में बस जाइए। आपके सिर पर मोर-मुकुट, कानों में मछली के आकार के कुंडल और मस्तक पर लाल चंदन का तिलक अत्यंत शोभायमान है। आपकी मोहिनी मूरति, साँवला वर्ण और बड़ी-बड़ी आँखें मन को हरने वाली हैं। आपके अमृत रूपी होंठों पर सुंदर मुरली सुशोभित है तथा हृदय पर वैजन्ती की माला अत्यंत सुंदर लग रही है।
(iii) 'सुधा' के चार पर्यायवाची शब्द:
1. अमृत
2. पीयूष
3. सोम
4. अमिय
(ख) अथवा पद्यांश का हल:
(i) सन्दर्भ:
प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के काव्य-खण्ड में संकलित रहीम द्वारा रचित 'दोहावली' शीर्षक से उद्धृत है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या:
कवि रहीम कहते हैं कि जो व्यक्ति उत्तम स्वभाव और सुदृढ़ चरित्र के होते हैं, उनका बुरी संगति (कुसंग) कुछ भी बिगाड़ नहीं सकती। जिस प्रकार चंदन के वृक्ष पर हमेशा विषैले साँप लिपटे रहते हैं, फिर भी चंदन अपनी शीतलता और सुगंध नहीं छोड़ता तथा उस पर सर्पों के विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, ठीक उसी प्रकार सज्जन पुरुष भी कुसंगति में रहकर अपने अच्छे गुणों को नहीं त्यागते।
(iii) 'भुजंग' के चार पर्यायवाची शब्द:
1. सर्प
2. साँप
3. नाग
4. व्याल
(क)
सदाचारः नाम नियमसंयमोः पालनम्। इन्द्रिय संयमः सदाचारस्य मूले तिष्ठति। इन्द्रियसंयमः युक्ताहार विहारेण युक्त स्वप्नावबोधेन च सम्भवति। किं युक्तं किम् अयुक्तम् इति सदाचारेण निर्णतुं शक्यते।
उत्तर:
संदर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के संस्कृत खंड के 'सदाचारः' नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद:
नियम और संयम का पालन करना ही सदाचार है। इन्द्रियों का संयम सदाचार के मूल में स्थित है। इन्द्रिय संयम उचित आहार और विहार (रहन-सहन) तथा उचित सोने और जागने से सम्भव होता है। क्या उचित है और क्या अनुचित, इसका निर्णय सदाचार द्वारा ही किया जा सकता है।
(ख)
एकदा वनात् प्रत्यागत्य रामदासः स्वद्वारि उपविष्टं धर्मदास दुर्बलं खिन्नं च दृष्ट्वा अपृच्छत्, 'मित्र धर्मदास चिराद्दृष्टोऽसि। केनापि रोगेण ग्रस्तः, येन एवं दुर्बलः। धर्मदासः प्रसन्नवदनं तम अवदत् मित्र! नाहं रुग्णः परं क्षीणविभवः इदानीम् अन्य इव सञ्जात। इदमेव चिन्तयामि केनोपायेन, मन्त्रेण–तन्त्रेण वा सम्पन्नः भवेयम्।
उत्तर:
संदर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के संस्कृत खंड के 'सिद्धिमन्त्रः' नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद:
एक बार जंगल से लौटकर रामदास ने अपने दरवाजे पर बैठे हुए धर्मदास को दुर्बल (कमजोर) और दुःखी देखकर पूछा, "मित्र धर्मदास! बहुत दिनों बाद दिखाई दिए हो। क्या किसी रोग से ग्रस्त हो, जिससे इतने दुर्बल हो गए हो?" धर्मदास ने प्रसन्न चेहरे वाले उस रामदास से कहा, "मित्र! मैं बीमार नहीं हूँ, परन्तु धनहीन होकर इस समय दूसरा सा (दरिद्र) बन गया हूँ। यही सोच रहा हूँ कि किस उपाय से, मन्त्र से अथवा तन्त्र से धनवान (सम्पन्न) हो जाऊँ।"
(क)
सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान् नरः।
श्रद्धालुरनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति॥
उत्तर:
संदर्भ:
प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक के संस्कृत खंड के 'सदाचारः' नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद:
जो मनुष्य सभी शुभ लक्षणों से हीन (रहित) होने पर भी सदाचारी, श्रद्धालु (ईश्वर व धर्म में विश्वास रखने वाला) और निन्दा न करने वाला (दोष न निकालने वाला) होता है, वह सौ वर्षों तक जीवित रहता है।
(ख)
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी॥
उत्तर:
संदर्भ:
प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक के संस्कृत खंड के 'पुरुषोत्तमः रामः' नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद:
इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राम नाम के पुरुष लोगों द्वारा सुने गए हैं (अर्थात् सब जानते हैं)। वे वश में की गई आत्मा वाले (जितेन्द्रिय), महान शक्तिशाली, कान्तिमान (तेजस्वी), धैर्यवान और जितेन्द्रिय (इन्द्रियों को वश में रखने वाले) हैं।
'दीपदान' एकांकी का कथासार संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
डॉ. रामकुमार वर्मा द्वारा रचित 'दीपदान' एकांकी मेवाड़ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित एक अत्यंत मार्मिक और देशभक्तिपूर्ण एकांकी है।
कथानक:
महाराणा संग्राम सिंह की मृत्यु के पश्चात् उनका छोटा पुत्र उदयसिंह मेवाड़ के सिंहासन का उत्तराधिकारी था। उदयसिंह की आयु छोटी होने के कारण बनवीर को उसका संरक्षक नियुक्त किया गया। बनवीर स्वयं निष्कंटक राज्य करना चाहता था, इसलिए उसने उदयसिंह की हत्या की योजना बनाई। उसने मयूर पक्षी के नृत्य और दीपदान का उत्सव आयोजित किया ताकि लोगों का ध्यान भटकाया जा सके।
पन्ना धाय कुँवर उदयसिंह की संरक्षिका और धाय माँ थी। वह बनवीर की कुटिल चाल को समझ गई और उसने उदयसिंह को दीपदान उत्सव में जाने से रोक दिया। जब बनवीर उदयसिंह को मारने के लिए तत्पर हुआ, तब पन्ना धाय ने अपने देशप्रेम और स्वामीभक्ति का परिचय देते हुए एक साहसी निर्णय लिया। उसने उदयसिंह को एक टोकरी में पत्तों से ढककर बारी (सेवक) के माध्यम से महल से बाहर सुरक्षित भिजवा दिया और उदयसिंह के पलंग पर अपने सोए हुए एकमात्र पुत्र चन्दन को सुला दिया।
बनवीर हाथ में नंगी तलवार लेकर आया और पन्ना धाय के सामने ही उदयसिंह समझकर मासूम चन्दन की हत्या कर दी। पन्ना धाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़ के कुलदीपक उदयसिंह के प्राणों की रक्षा की।
निष्कर्ष:
दीपदान एकांकी पन्ना धाय के अभूतपूर्व त्याग, स्वामीभक्ति और कर्त्तव्यनिष्ठ चरित्र की अमर गाथा है।
'व्यवहार' एकांकी के प्रमुख पात्र 'क्रान्तिचन्दर' का चरित्र चित्रण कीजिए।
उत्तर:
पं. सेठ गोविन्द दास द्वारा रचित 'व्यवहार' एकांकी के प्रमुख पात्र 'क्रान्तिचन्दर' का चरित्र-चित्रण निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर किया जा सकता है:
1. आधुनिक एवं प्रगतिशील विचारों का युवक:
क्रान्तिचन्दर नए विचारों का युवक है। वह रूढ़िवादी और आडंबरयुक्त सामाजिक व्यवहार का विरोधी है। वह व्यावहारिक जीवन में बनावटीपन के बजाय सहजता और सच्चाई को महत्व देता है।
2. स्पष्टवादी और निडर:
क्रान्तिचन्दर अपनी बात को बिना किसी भय या संकोच के स्पष्ट रूप से रखता है। वह औपचारिकता और दिखावे की कठोर आलोचना करता है।
3. व्यावहारिक दृष्टिकोण:
वह समाज में व्याप्त दिखावे की परंपरा को गलत मानता है। उसका मानना है कि मनुष्य का व्यवहार कृत्रिम और औपचारिक न होकर हृदय की आत्मीयता पर आधारित होना चाहिए।
4. स्नेहशील एवं आत्मीय स्वभाव:
क्रान्तिचन्दर हृदय से अत्यंत सीधा, सरल और स्नेही है। वह अपनों के प्रति गहरा प्रेम और सम्मान रखता है, यद्यपि वह औपचारिक शिष्टाचार का दिखावा नहीं करता।
निष्कर्ष:
इस प्रकार क्रान्तिचन्दर आधुनिक विचारों का समर्थक, आडंबर-विरोधी, स्पष्टवादी और सहज मानवीय मूल्यों को मानने वाला एक सजीव पात्र है।
(i)
मुंशी प्रेमचन्द का जीवन-परिचय देते हुए उनकी दो रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द का जन्म 31 जुलाई 1880 ई. को वाराणसी जिले के लमही नामक गाँव में हुआ था। इनके बचपन का नाम धनपत राय था। इनके पिता का नाम मुंशी अजायब लाल था। बाल्यकाल में ही माता-पिता का साया उठ जाने के कारण इनका प्रारंभिक जीवन अत्यंत अभावों में बीता। इन्होंने कठिन परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त की और अध्यापन कार्य करते हुए बी.ए. पास किया। शिक्षा विभाग में उप-निरीक्षक के पद पर कार्य करते हुए इन्होंने साहित्य सृजन जारी रखा। गांधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर इन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूर्ण रूप से साहित्य सेवा में लग गए। 8 अक्टूबर 1936 ई. को इस महान साहित्यकार का निधन हो गया।
रचनाएँ:
1. गोदान (उपन्यास)
2. गबन (उपन्यास)
(ii)
हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन-परिचय देते हुए उनकी दो रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1907 ई. में बलिया जिले के दुबे का छपरा नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम अनमोल द्विवेदी और माता का नाम ज्योतिष्मती था। इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य की उपाधि प्राप्त की। ये शांतिनिकेतन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष रहे। भारत सरकार ने इन्हें 'पद्म भूषण' की उपाधि से अलंकृत किया। लखनऊ विश्वविद्यालय ने इन्हें डी.लिट्. की मानद उपाधि प्रदान की। 19 मई 1979 ई. को इनका निधन हो गया। द्विवेदी जी निबंधकार, उपन्यासकार और महान आलोचक थे।
रचनाएँ:
1. अशोक के फूल (निबंध संग्रह)
2. बाणभट्ट की आत्मकथा (उपन्यास)
(iii)
महादेवी वर्मा का जीवन-परिचय देते हुए उनकी दो रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
आधुनिक मीरा के नाम से प्रसिद्ध महादेवी वर्मा का जन्म सन् 1907 ई. में फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) में होली के दिन हुआ था। इनके पिता का नाम गोविन्द प्रसाद वर्मा तथा माता का नाम हेमरानी देवी था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा इंदौर में तथा उच्च शिक्षा प्रयाग (इलाहाबाद) में हुई। इन्होंने एम.ए. (संस्कृत) करने के बाद प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्रधानाचार्या के पद को सुशोभित किया। भारत सरकार ने इन्हें 'पद्म भूषण' और 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया। इनकी काव्य रचना 'यामा' पर इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। 11 सितंबर 1987 ई. को इनका निधन हो गया।
रचनाएँ:
1. यामा (काव्य संग्रह)
2. दीपशिखा (काव्य संग्रह)
(i)
मीराबाई का जीवन-परिचय देते हुए उनकी दो रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
कृष्ण भक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री मीराबाई का जन्म सन् 1498 ई. के लगभग राजस्थान में मेड़ता के पास कुड़की नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम महाराज रतन सिंह था। बचपन में ही माता का निधन हो जाने के कारण इनका पालन-पोषण इनके बाबा राव दूदा जी के पास हुआ। इनका विवाह चित्तौड़ के राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र कुँवर भोजराज के साथ हुआ। विवाह के कुछ वर्षों बाद ही पति का देहांत हो गया। पति की मृत्यु के बाद ये साधु-संतों की संगति में कृष्ण भक्ति और भजन-कीर्तन में लीन रहने लगीं। अंत में ये द्वारिका चली गईं और सन् 1546 ई. के लगभग रणछोड़ जी की मूर्ति में समा गईं।
रचनाएँ:
1. नरसी जी का मायरा
2. राग गोविंद
(ii)
जयशंकर प्रसाद का जीवन-परिचय देते हुए उनकी दो रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
छायावाद के प्रवर्तक महाकवि जयशंकर प्रसाद का जन्म सन् 1889 ई. में काशी के प्रसिद्ध 'सुँघनी साहू' वैश्य परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम बाबू देवी प्रसाद था। बाल्यावस्था में ही पिता तथा भ्राता का देहांत हो जाने से परिवार का उत्तरदायित्व इनके कंधों पर आ गया। इन्होंने घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, पाली और प्राकृत भाषाओं का गहन अध्ययन किया। अत्यधिक परिश्रम और क्षय रोग से पीड़ित होने के कारण 15 नवंबर 1937 ई. को मात्र 48 वर्ष की आयु में इनका स्वर्गवास हो गया।
रचनाएँ:
1. कामायनी (महाकाव्य)
2. लहर (काव्य संग्रह)
(iii)
मैथिलीशरण गुप्त का जीवन-परिचय देते हुए उनकी दो रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म सन् 1886 ई. में झांसी जिले के चिरगाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम सेठ रामचरण गुप्त था, जो स्वयं एक सहृदय कवि थे। गुप्त जी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई, जहाँ इन्होंने हिन्दी, संस्कृत और बांग्ला का ज्ञान प्राप्त किया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को ये अपना काव्य-गुरु मानते थे। इनकी रचनाओं में राष्ट्रप्रेम और देश-भक्ति की भावना प्रबल होने के कारण महात्मा गांधी ने इन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि दी। ये राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे। 12 दिसंबर 1964 ई. को इनका देहावसान हो गया।
रचनाएँ:
1. साकेत (महाकाव्य)
2. भारत-भारती (काव्य ग्रन्थ)
अपनी पाठ्य पुस्तक से कण्ठस्थ किया हुआ श्लोक लिखिए जो इस प्रश्न-पत्र में न आया हो।
उत्तर:
वन्दनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः।
उभयत्र समो वीरः वीरभावो हि वीरता॥
सदाचारस्य कोऽर्थः ?
उत्तर:
सतां सज्जनानां आचारः सदाचारः।
जीवलोकस्य रक्षकः कः आसीत् ?
उत्तर:
जीवलोकस्य रक्षकः रामः आसीत्।
अनृतं केन जयेत्।
उत्तर:
अनृतं सत्येन जयेत्।
सिद्धिमन्त्रः किम् अस्ति।
उत्तर:
परिश्रमः (श्रमः) एव सिद्धिमन्त्रः अस्ति।
दाल न गलना
उत्तर:
अर्थ: युक्ति सफल न होना या वश न चलना।
वाक्य प्रयोग: चालाक सेठ की कोई भी चाल बुद्धिमान किसान के सामने काम न आ सकी और उसकी दाल नहीं गली।
गागर में सागर भरना
उत्तर:
अर्थ: थोड़े शब्दों में बहुत बड़ी और गंभीर बात कह देना।
वाक्य प्रयोग: कवि बिहारी ने अपने दोहों में कम शब्दों में गूढ़ बातें कहकर गागर में सागर भर दिया है।
दूर के ढोल सुहावने होना।
उत्तर:
अर्थ: दूर की वस्तुएँ या परिस्थितियाँ आकर्षक और सुंदर प्रतीत होना।
वाक्य प्रयोग: विदेश की चकाचौंध दूर से अच्छी लगती है, परंतु वास्तविकता वहाँ जाकर ही पता चलती है; सच ही कहा गया है कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।
पेड़ से पत्ते गिरते हैं।
उत्तर:
वृक्षात् पत्राणि पतन्ति।
बालक पुस्तक पढ़ेंगे।
उत्तर:
बालकाः पुस्तकं पठिष्यन्ति।
वे फल हैं।
उत्तर:
तानि फलानि सन्ति।
तुम घर जाओ।
उत्तर:
त्वं गृहं गच्छ।
अस्वस्थ होने पर प्रधानाचार्य को सूचित करने के लिए एक प्रार्थना-पत्र लिखिए।
उत्तर:
सेवा में,
श्रीमान प्रधानाचार्य महोदय,
राजकीय इण्टर कॉलेज,
उत्तर प्रदेश।
विषय: अस्वस्थता के कारण अवकाश हेतु प्रार्थना-पत्र।
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मुझे गत रात्रि से अकस्मात तीव्र ज्वर आ गया है। चिकित्सक ने मुझे दो दिन घर पर रहकर विश्राम करने का परामर्श दिया है। इस कारण मैं विद्यालय में उपस्थित होने में असमर्थ हूँ।
अतः आपसे नम्र निवेदन है कि मुझे दो दिन का अवकाश प्रदान करने की कृपा करें। इस हेतु मैं आपका सदैव आभारी रहूँगा।
धन्यवाद!
आपका आज्ञाकारी शिष्य,
नाम: क. ख. ग.
कक्षा: 9 ('अ')
अनुक्रमांक: 15
दिनांक: 15 अक्टूबर 2026