(i) सन्दर्भ:
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के काव्य-खण्ड में संकलित एवं राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित 'पंचवटी' शीर्षक कविता से उद्धृत है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या:
• रेखांकित अंश: "चारु चन्द्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है, अवानि और अम्बर तल में।"
• व्याख्या: कवि पंचवटी की प्राकृतिक सुंदर छटा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि सुंदर चंद्रमा की चंचल किरणें जल और थल (पृथ्वी) सब जगह क्रीड़ा करती हुई अत्यंत सुहावनी प्रतीत हो रही हैं। संपूर्ण पृथ्वी (अवनि) से लेकर आकाश (अम्बर) मंडल तक स्वच्छ तथा निर्मल चाँदनी बिछी हुई है, जिससे संपूर्ण वातावरण आलोकित और मनमोहक लग रहा है।
(iii) अलंकार:
'चारु चन्द्र की चंचल किरणें' में 'च' वर्ण की बार-बार आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।
अथवा
(ख)
"इड़ा उठी, दिख पड़ा राज-पथ, धुंधली-सी छाया चलती,
वाणी में भी करुण वेदना, वह पुकार जैसी जलती।
शिथिल शरीर वसन विश्रृंखल, कबरी अधिक अधोर खुली,
छिन्न पत्र मकरन्द लुटी-सी, ज्यों मुरझायी हुई कली।"
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) इड़ा ने जब श्रद्धा को देखा तो उसकी दशा कैसी थी ?
हल / Solution:
(i) सन्दर्भ:
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के काव्य-खण्ड में संकलित तथा महाकवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित 'कामायनी' महाकाव्य के 'पुनर्मिलन' शीर्षक से अवतरित है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या:
• रेखांकित अंश: "शिथिल शरीर वसन विश्रृंखल, कबरी अधिक अधोर खुली, छिन्न पत्र मकरन्द लुटी-सी, ज्यों मुरझायी हुई कली।"
• व्याख्या: कवि वर्णन करते हैं कि दुःखी और वियोग से व्याकुल श्रद्धा का शरीर अत्यंत शिथिल (थका हुआ) था। उसके वस्त्र अस्त-व्यस्त (विश्रृंखल) थे और उसके बालों की चोटी आधी खुली हुई थी। उसकी दयनीय अवस्था उस मुरझाई हुई कली की भाँति लग रही थी, जिसकी पंखुड़ियाँ बिखर गई हों और जिसका मकरंद (रस) पूरी तरह लुट चुका हो।
(iii) उत्तर:
इड़ा ने जब श्रद्धा को देखा तब श्रद्धा का शरीर अत्यंत थका हुआ (शिथिल) था, वस्त्र अस्त-व्यस्त थे, बालों की चोटी खुली हुई थी तथा उसकी वाणी में गहरी करुण वेदना थी। वह एक मुरझाई हुई कली के समान अत्यंत दुखियारी प्रतीत हो रही थी।