(अ) पाठ का नाम: बात
लेखक का नाम: प्रतापनारायण मिश्र
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या:
लेखक पंडित प्रतापनारायण मिश्र का कथन है कि नन्हे बालकों की तुतलाती निष्छल बातें, सुंदर स्त्रियों की मधुर बातें, श्रेष्ठ कवियों की रसमयी रचनाएँ और कुशल वक्ताओं के प्रभावशाली ओजस्वी भाषण ऐसे जादू के समान होते हैं जो श्रोता के चित्त को पूरी तरह बदल देते हैं। यदि कोई मनुष्य इन सरस बातों से प्रभावित और द्रवीभूत नहीं होता, तो वह पशुता से भी नीचे गिर चुका है; उसे सचेतन प्राणी न मानकर कठोर, चेतनाहीन पत्थर का टुकड़ा ही कहना चाहिए।
(स) दूसरों की बुद्धि और समझ पर अपना पूर्ण प्रभाव व आधिपत्य स्थापित कर सके, ऐसी प्रभावशाली एवं तत्त्वपूर्ण बात गढ़ना साधारण (ऐसे-वैसों) व्यक्तियों का काम नहीं है।
अथवा
यह कागभुशुण्डि भी विचित्र पक्षी है—एक साथ समादरित अनादरित, अति सम्मानित अति अवमानित। हमारे बेचारे पुरखे न गरुड़ के रूप में आ सकते हैं, न मयूर के, न हंस के। उन्हें पितरपक्ष में हमसे कुछ पाने के लिये काक बनकर ही अवतीर्ण होना पड़ता है। इतना ही नहीं, हमारे दूरस्थ प्रियजनों को भी अपने आने का मधु सन्देश इनके कर्कश स्वर में ही देना पड़ता है। दूसरी ओर हम कौआ और काँव-काँव करने के की अवमानना के अर्थ में ही प्रयुक्त करते हैं।
प्रश्न—(अ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिये।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिये।
(स) कौआ हमारे समाज मे किस प्रकार समादरित है?
उत्तर:
(अ) पाठ का नाम: गिलू
लेखिका का नाम: महादेवी वर्मा
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या:
लेखिका महादेवी वर्मा कहती हैं कि भारतीय समाज में कौए की स्थिति अत्यंत विचित्र है। उसे एक ही समय पर अत्यधिक सम्मान और घोर अनादर दोनों प्राप्त होते हैं। जहाँ श्राद्ध पक्ष में उसे आदर से आमंत्रित किया जाता है, वहीं आम दिनों में उसकी कर्कश काँव-काँव के कारण उसे तिरस्कृत किया जाता है।
(स) कौआ हमारे समाज में इस प्रकार समादरित है क्योंकि हमारे दिवंगत पूर्वज पितृपक्ष में गरुड़, हंस या मोर बनकर नहीं आते; उन्हें तर्पण और भोजन प्राप्त करने के लिए कौआ बनकर ही धरती पर आना पड़ता है। इसके अलावा, दूर रहने वाले प्रियजनों के आगमन का शुभ संदेश भी कौए के माध्यम से ही प्राप्त समझा जाता है।