प्रश्न 1(क).
गुरुत्वीय विभव का विमीय सूत्र है—
(a) [ML2 T-2]
(b) [M0 L2 T-2]
(c) [M-1 L2 T-2]
(d) [M-2 L2 T-2]
उत्तर:
सही विकल्प: (b) [M0 L2 T-2]
व्याख्या: गुरुत्वीय विभव = कार्य / द्रव्यमान = [ML2 T-2] / [M] = [M0 L2 T-2]
UP Board Class 11th Physics Annual Paper 2026 B Code
कक्षा 11वीं · भौतिक विज्ञान · 2026 · बोर्ड परीक्षा
गुरुत्वीय विभव का विमीय सूत्र है—
(a) [ML2 T-2]
(b) [M0 L2 T-2]
(c) [M-1 L2 T-2]
(d) [M-2 L2 T-2]
उत्तर:
सही विकल्प: (b) [M0 L2 T-2]
व्याख्या: गुरुत्वीय विभव = कार्य / द्रव्यमान = [ML2 T-2] / [M] = [M0 L2 T-2]
यदि दो सदिश A⃗ तथा B⃗ परस्पर लम्बवत हैं तो—
(a) A⃗ + B⃗ = 0
(b) A⃗ - B⃗ = 0
(c) A⃗ × B⃗ = 0
(d) A⃗ · B⃗ = 0
उत्तर:
सही विकल्प: (d) A⃗ · B⃗ = 0
व्याख्या: जब दो सदिश परस्पर लम्बवत होते हैं तो उनके बीच का कोण 90° होता है। अतः उनका अदिश गुणनफल A · B = AB cos(90°) = 0 होता है।
प्रत्यास्थता में पॉयसन अनुपात का मान होता है—
(a) 1/2 से अधिक
(b) -1 से कम
(c) -1 और 1/2 के बीच
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
सही विकल्प: (c) -1 और 1/2 के बीच
व्याख्या: सैद्धांतिक रूप से पॉयसन अनुपात का मान -1 से 0.5 (1/2) के बीच होता है।
रुद्धोष्म प्रक्रम होता है—
(a) स्थिर दाब पर
(b) स्थिर ताप पर
(c) स्थिर ऊष्मा पर
(d) स्थिर ताप व दाब पर।
उत्तर:
सही विकल्प: (c) स्थिर ऊष्मा पर
व्याख्या: रुद्धोष्म प्रक्रम में निकाय तथा बाह्य वातावरण के बीच ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता, अर्थात् कुल ऊष्मा स्थिर रहती है।
पृष्ठ तनाव का मात्रक है—
(a) न्यूटन/मीटर²
(b) न्यूटन/मीटर
(c) न्यूटन-मीटर
(d) न्यूटन-मीटर²
उत्तर:
सही विकल्प: (b) न्यूटन/मीटर
व्याख्या: पृष्ठ तनाव = बल / लंबाई = न्यूटन/मीटर।
पूर्ण कृष्णिका की अवशोषण क्षमता होती है—
(a) 0
(b) 0.5
(c) 1
(d) ∞
उत्तर:
सही विकल्प: (c) 1
व्याख्या: पूर्ण कृष्णिका अपने पृष्ठ पर आपतित सभी तरंगदैर्घ्यों के विकिरणों को पूर्णतः अवशोषित कर लेती है, अतः इसकी अवशोषण क्षमता 1 होती है।
विशिष्ट ऊष्मा का मात्रक क्या है?
उत्तर:
विशिष्ट ऊष्मा का SI मात्रक जूल प्रति किलोग्राम प्रति केल्विन (J/kg K) अथवा जूल प्रति किलोग्राम प्रति डिग्री सेल्सियस (J/kg °C) है। CGS पद्धति में इसका मात्रक कैलोरी प्रति ग्राम प्रति डिग्री सेल्सियस (cal/g °C) होता है।
सरल आवर्त गति का विस्थापन समीकरण लिखिए।
उत्तर:
सरल आवर्त गति का विस्थापन समीकरण:
y = a sin(ωt + φ)
जहाँ y = समय t पर विस्थापन, a = आयाम, ω = कोणीय आवृत्ति तथा φ = प्रारंभिक कला (प्रकला) है।
श्यानबल से सम्बन्धित स्टोक का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
स्टोक का सूत्र:
F = 6π η r v
जहाँ F = श्यान बल, η = द्रव का श्यानता गुणांक, r = गोली की त्रिज्या तथा v = गोली का सीमान्त वेग है।
प्रतिबल से क्या तात्पर्य है इसका मात्रक लिखिए।
उत्तर:
प्रतिबल: जब किसी वस्तु पर बाह्य विरूपक बल लगाया जाता है, तो वस्तु के आंतरिक अनुप्रस्थ काट के एकांक क्षेत्रफल पर उत्पन्न पुनर्प्रत्यानयन (प्रतिक्रिया) बल को प्रतिबल कहते हैं।
प्रतिबल = बाह्य बल / क्षेत्रफल = F / A
मात्रक: इसका SI मात्रक न्यूटन/मीटर² (N/m²) या पास्कल (Pa) है।
गैसों में अनुप्रस्थ तरंगें क्यों नहीं उत्पन्न की जा सकती हैं।
उत्तर:
अनुप्रस्थ तरंगों के संचरण के लिए माध्यम में कर्तन प्रत्यास्थता (दृढ़ता गुणांक) का गुण होना अनिवार्य है। चूँकि गैसों में दृढ़ता का गुण नहीं होता (दृढ़ता गुणांक शून्य होता है) और वे आकार परिवर्तन का विरोध नहीं कर सकती हैं, इसलिए गैसों के भीतर अनुप्रस्थ तरंगें उत्पन्न नहीं की जा सकती हैं।
किसी तल की उत्सर्जन क्षमता e की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
किसी दिए गए ताप पर किसी पृष्ठ के एकांक क्षेत्रफल से प्रति सेकण्ड उत्सर्जित होने वाली ऊष्मीय विकिरण की मात्रा को उस पृष्ठ की उत्सर्जन क्षमता (e) कहते हैं।
इसका मात्रक जूल / (मीटर² × सेकण्ड) अथवा वाट / मीटर² होता है।
विलगित निकाय क्या होता है? इसका द्रव्यमान केन्द्र किस प्रकार गति करता है?
उत्तर:
वह निकाय जिस पर कोई बाह्य बल कार्य न कर रहा हो (अर्थात बाह्य बल शून्य हो), विलगित निकाय कहलाता है।
विलगित निकाय का द्रव्यमान केन्द्र अचर (स्थिर) वेग से एक सीधी रेखा में गति करता है अथवा यदि वह प्रारम्भ में विराम अवस्था में है तो विराम अवस्था में ही रहता है, क्योंकि बाह्य बल शून्य होने के कारण द्रव्यमान केन्द्र का त्वरण शून्य होता है।
सामान्य ताप तथा स्थिर दाब 1.0 × 10⁵ न्यूटन/मीटर² पर किसी आदर्श गैस के आयतन में 2.0 सेमी³ की कमी करने के लिए कितना बाह्य कार्य करना होगा?
उत्तर:
संख्यात्मक प्रश्न का हल:
दिया है:
स्थिर दाब (P) = 1.0 × 10⁵ N/m²
आयतन में परिवर्तन (ΔV) = 2.0 सेमी³ = 2.0 × 10⁻⁶ मीटर³
ज्ञात सूत्र:
कार्य (W) = P × ΔV
हल:
W = (1.0 × 10⁵ N/m²) × (2.0 × 10⁻⁶ m³)
W = 2.0 × 10⁻¹ जूल
W = 0.2 जूल
अतः उत्तर:
आदर्श गैस के आयतन में कमी करने के लिए किया गया बाह्य कार्य 0.2 जूल (या 2.0 × 10⁻¹ जूल) होगा।
सूर्य के परितः पृथ्वी के क्षेत्रीय वेग की दिशा क्या है?
उत्तर:
सूर्य के परितः पृथ्वी के क्षेत्रीय वेग की दिशा पृथ्वी की कक्षा के तल के लम्बवत् होती है। दाएँ हाथ के नियम के अनुसार यह दिशा कक्षा तल के लम्बवत् ऊपर की ओर (या तल के लम्बवत्) होती है।
किसी घन की प्रत्येक भुजा की माप 7.203 मीटर है। उचित सार्थक अंकों तक घन की कुल पृष्ठ क्षेत्रफल एवं आयतन ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
संख्यात्मक प्रश्न का हल:
दिया है:
घन की भुजा (a) = 7.203 मीटर (सार्थक अंक = 4)
ज्ञात सूत्र:
(i) कुल पृष्ठ क्षेत्रफल (A) = 6 × a²
(ii) आयतन (V) = a³
हल:
(i) कुल पृष्ठ क्षेत्रफल (A):
A = 6 × (7.203)²
A = 6 × 51.883209
A = 311.299254 m²
नियम के अनुसार उत्तर को 4 सार्थक अंकों तक सीमित रखने पर:
A = 311.3 m²
(ii) आयतन (V):
V = (7.203)³
V = 373.714754 m³
4 सार्थक अंकों तक सीमित रखने पर:
V = 373.7 m³
अतः उत्तर:
घन का कुल पृष्ठ क्षेत्रफल = 311.3 मीटर²
घन का आयतन = 373.7 मीटर³
एक प्रक्षेप्य का प्रारम्भिक वेग (3î + 4ĵ) मीटर/सेकण्ड है। इसका प्रक्षेपण कोण, उड्डयन काल, महत्तम ऊँचाई तथा क्षैतिज परास ज्ञात कीजिए। (g = 10 मी/से²)
उत्तर:
संख्यात्मक प्रश्न का हल:
दिया है:
प्रारम्भिक वेग vector u = 3î + 4ĵ m/s
प्रारम्भिक क्षैतिज वेग (uₓ) = 3 m/s
प्रारम्भिक ऊर्ध्वाधर वेग (u_y) = 4 m/s
गुरुत्वीय त्वरण (g) = 10 m/s²
ज्ञात सूत्र:
(i) प्रक्षेपण कोण (θ) = tan⁻¹ (u_y / uₓ)
(ii) उड्डयन काल (T) = 2 × u_y / g
(iii) महत्तम ऊँचाई (H) = (u_y)² / (2 × g)
(iv) क्षैतिज परास (R) = 2 × uₓ × u_y / g
हल:
(i) प्रक्षेपण कोण (θ):
tan θ = u_y / uₓ = 4 / 3
θ = tan⁻¹ (4/3) ≈ 53.13°
(ii) उड्डयन काल (T):
T = (2 × 4) / 10 = 8 / 10 = 0.8 सेकण्ड
(iii) महत्तम ऊँचाई (H):
H = (4)² / (2 × 10) = 16 / 20 = 0.8 मीटर
(iv) क्षैतिज परास (R):
R = (2 × 3 × 4) / 10 = 24 / 10 = 2.4 मीटर
अतः उत्तर:
प्रक्षेपण कोण = tan⁻¹(4/3) अथवा 53.13°
उड्डयन काल = 0.8 सेकण्ड
महत्तम ऊँचाई = 0.8 मीटर
क्षैतिज परास = 2.4 मीटर
सिद्ध कीजिए कि कोणीय संवेग के परिवर्तन की समय दर लगाए गए बल-आघूर्ण के बराबर होती है।
उत्तर:
सिद्ध करना है: dL / dt = τ
उपपत्ति:
माना कि किसी कण का मूल बिंदु के सापेक्ष स्थिति सदिश r तथा रेखीय संवेग p है।
कण का कोणीय संवेग (L) होगा:
L = r × p
दोनों पक्षों का समय t के सापेक्ष अवकलन करने पर:
dL / dt = d(r × p) / dt
अवकलन के गुणन सूत्र द्वारा:
dL / dt = (dr / dt × p) + (r × dp / dt)
हम जानते हैं कि dr / dt = v (वेग) तथा p = m × v
अतः (dr / dt × p) = v × (m × v) = m × (v × v)
चूँकि समान सदिशों का सदिश गुणनफल शून्य होता है (v × v = 0):
(dr / dt × p) = 0
न्यूटन के द्वितीय नियमानुसार, रेखीय संवेग परिवर्तन की दर बल के बराबर होती है:
dp / dt = F
अतः:
dL / dt = 0 + (r × F)
dL / dt = r × F
चूँकि बल-आघूर्ण (τ) = r × F होता है:
dL / dt = τ
अर्थात् कोणीय संवेग परिवर्तन की समय दर निकाय पर लगाए गए बाह्य बल-आघूर्ण के बराबर होती है।
इति सिद्धम्।
किसी लिफ्ट में लटकाए गए एक सरल लोलक के दोलन के आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ता है जब लिफ्ट एक त्वरण a से ऊपर चढ़ रही है।
उत्तर:
जब कोई लिफ्ट त्वरण 'a' से ऊपर की ओर चढ़ती है, तो लिफ्ट में लटकाए गए लोलक पर प्रभावी गुरुत्वीय त्वरण का मान बढ़ जाता है।
प्रभावी गुरुत्वीय त्वरण g' = g + a
सरल लोलक के आवर्तकाल का सूत्र:
T = 2π √(l / g')
T = 2π √(l / (g + a))
चूँकि लिफ्ट के ऊपर चढ़ने पर हर (g + a) का मान बढ़ जाता है, इसलिए आवर्तकाल (T) का मान घट जाता है।
अतः उत्तर:
जब लिफ्ट त्वरण a से ऊपर की ओर चढ़ती है, तो सरल लोलक का आवर्तकाल घट जाता है।
(क) गुरुत्वीय विभव का विमीय सूत्र है—
(a) [ML²T⁻²]
(b) [M⁰L²T⁻²]
(c) [M⁻¹L²T⁻²]
(d) [M⁻²L²T⁻²]
उत्तर:
विकल्प (b) [M⁰L²T⁻²]
व्याख्या: गुरुत्वीय विभव V = कार्य / द्रव्यमान = [ML²T⁻²] / [M] = [M⁰L²T⁻²]।
(ख) यदि दो सदिश A⃗ तथा B⃗ परस्पर लम्बवत हैं तो—
(a) A⃗ + B⃗ = 0
(b) A⃗ − B⃗ = 0
(c) A⃗ × B⃗ = 0
(d) A⃗ · B⃗ = 0
उत्तर:
विकल्प (d) A⃗ · B⃗ = 0
व्याख्या: दो परस्पर लम्बवत् सदिशों का अदिश गुणनफल शून्य होता है (cos 90° = 0)।
(ग) प्रत्यास्थता में पॉयसन अनुपात का मान होता है—
(a) 1/2 से अधिक
(b) -1 से कम
(c) -1 और 1/2 के बीच
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
विकल्प (c) -1 और 1/2 के बीच
व्याख्या: सैद्धांतिक रूप से पॉयसन अनुपात (σ) का मान -1 तथा 0.5 (1/2) के मध्य स्थित होता है।
(घ) रुद्धोष्म प्रक्रम होता है—
(a) स्थिर दाब पर
(b) स्थिर ताप पर
(c) स्थिर ऊष्मा पर
(d) स्थिर ताप व दाब पर।
उत्तर:
विकल्प (c) स्थिर ऊष्मा पर
व्याख्या: रुद्धोष्म प्रक्रम में निकाय और वातावरण के मध्य ऊष्मा का स्थानांतरण नहीं होता।
(ङ) पृष्ठ तनाव का मात्रक है—
(a) न्यूटन/मीटर²
(b) न्यूटन/मीटर
(c) न्यूटन-मीटर
(d) न्यूटन-मीटर²
उत्तर:
विकल्प (b) न्यूटन/मीटर
व्याख्या: पृष्ठ तनाव T = बल / लंबाई = न्यूटन/मीटर।
(च) पूर्ण कृष्णिका की अवशोषण क्षमता होती है—
(a) 0
(b) 0.5
(c) 1
(d) ∞
उत्तर:
विकल्प (c) 1
व्याख्या: पूर्ण कृष्णिका अपने ऊपर आपतित सम्पूर्ण विकिरण ऊर्जा को अवशोषित कर लेती है।
(क) विशिष्ट ऊष्मा का मात्रक क्या है?
उत्तर:
विशिष्ट ऊष्मा का S.I. मात्रक जूल प्रति किलोग्राम-केल्विन (J/kg-K) या कैलोरी/ग्राम-°C होता है।
(ख) सरल आवर्त गति का विस्थापन समीकरण लिखिए।
उत्तर:
सरल आवर्त गति का विस्थापन समीकरण:
y = a sin(ωt + φ)
जहाँ y विस्थापन, a आयाम, ω कोणीय आवृत्ति, t समय तथा φ प्रारम्भिक कला है।
(ग) श्यानबल से सम्बन्धित स्टोक का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
स्टोक का सूत्र:
F = 6πηrv
जहाँ F श्यान बल, η श्यानता गुणांक, r गोलीय वस्तु की त्रिज्या तथा v वेग है।
(घ) प्रतिबल से क्या तात्पर्य है इसका मात्रक लिखिए।
उत्तर:
साम्यावस्था में वस्तु की एकांक अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल पर उत्पन्न आन्तरिक प्रत्यानयन बल को प्रतिबल कहते हैं।
प्रतिबल = बल / क्षेत्रफल
इसका S.I. मात्रक न्यूटन/मीटर² (N/m²) या पास्कल (Pa) है।
(च) गैसों में अनुप्रस्थ तरंगें क्यों नहीं उत्पन्न की जा सकती हैं।
उत्तर:
अनुप्रस्थ तरंगों के संचरण के लिए माध्यम में अपरूपण प्रत्यास्थता (दृढ़ता गुणांक) का होना आवश्यक है। चूंकि गैसों में दृढ़ता गुणांक शून्य होता है, अतः गैसों में अनुप्रस्थ तरंगें उत्पन्न नहीं की जा सकतीं।
सरल आवर्त गति करने वाले किसी कण की सम्पूर्ण यान्त्रिक ऊर्जा का व्यंजक प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
माना m द्रव्यमान का एक कण a आयाम तथा ω कोणीय आवृत्ति से सरल आवर्त गति कर रहा है। किसी समय t पर कण का विस्थापन y है।
1. स्थितिज ऊर्जा (U):
प्रत्यानयन बल F = -k y (जहाँ k = m ω²)
कण को dy विस्थापन देने में किया गया कार्य dW = k y dy
कुल स्थितिज ऊर्जा U = (1/2) k y² = (1/2) m ω² y²
2. गतिज ऊर्जा (K):
विस्थापन y पर कण का वेग v = ω √(a² - y²)
गतिज ऊर्जा K = (1/2) m v² = (1/2) m ω² (a² - y²)
3. सम्पूर्ण यान्त्रिक ऊर्जा (E):
E = K + U
E = (1/2) m ω² (a² - y²) + (1/2) m ω² y²
E = (1/2) m ω² a²
चूँकि m, ω तथा a नियतांक हैं, अतः सरल आवर्त गति में सम्पूर्ण यान्त्रिक ऊर्जा सदैव संरक्षित (नियत) रहती है।
अथवा
(अथवा)
पलायन वेग से क्या तात्पर्य है? पृथ्वी तल के किसी पिण्ड के पलायन वेग का सूत्र स्थापित कीजिए।
उत्तर:
पलायन वेग:
वह न्यूनतम वेग जिससे किसी पिण्ड को पृथ्वी तल से ऊपर की ओर फेंकने पर वह पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र को पार कर जाता है और पुनः वापस नहीं लौटता, पलायन वेग (ve) कहलाता है।
व्यंजक का निगमन:
माना पृथ्वी का द्रव्यमान M, त्रिज्या R तथा m द्रव्यमान का एक पिण्ड पृथ्वी तल पर स्थित है।
पृथ्वी केंद्र से x दूरी पर स्थित पिण्ड पर गुरुत्वाकर्षण बल F = G M m / x²
पिण्ड को dx दूरी विस्थापित करने में किया गया कार्य dW = (G M m / x²) dx
पिण्ड को पृथ्वी तल (x = R) से अनन्त (x = ∞) तक ले जाने में किया गया कुल कार्य:
W = ∫ (R से ∞) (G M m / x²) dx
W = G M m [ -1/x ] (R से ∞)
W = G M m / R
यह कार्य पिण्ड को दी गई प्रारम्भिक गतिज ऊर्जा के बराबर होता है:
(1/2) m ve² = G M m / R
ve² = 2 G M / R
ve = √(2 G M / R)
चूँकि g = G M / R², अतः G M = g R²
ve = √(2 g R)
अतः पृथ्वी तल से पलायन वेग का अभीष्ट सूत्र ve = √(2 g R) है।
गैसों के अणुगति सिद्धान्त की मुख्य परिकल्पनाएँ लिखिए।
उत्तर:
गैसों के अणुगति सिद्धान्त की मुख्य परिकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं:
1. प्रत्येक गैस अति सूक्ष्म एवं सर्वसम कणों से मिलकर बनी होती है, जिन्हें अणु कहते हैं।
2. गैस के अणु निरंतर, अनियमित तथा तीव्र गति से सभी संभव दिशाओं में गति करते रहते हैं।
3. अणुओं का वास्तविक आयतन बर्तन के कुल आयतन की तुलना में नगण्य होता है।
4. अणुओं के मध्य कोई अंतर-अणुक आकर्षण या प्रतिकर्षण बल कार्य नहीं करता।
5. अणुओं की परस्पर एवं बर्तन की दीवारों से होने वाली टक्करें पूर्णतः प्रत्यास्थ होती हैं, जिससे कुल गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है।
6. दो क्रमागत टक्करों के बीच अणु एक निष्कोण सरल रेखीय मार्ग पर चलते हैं।
Cp > Cv इस कथन को स्पष्ट कीजिए। सभी प्रतीक सामान्य अर्थों में प्रयुक्त हैं।
उत्तर:
स्थिर दाब पर मोलर विशिष्ट ऊष्मा (Cp) का मान स्थिर आयतन पर मोलर विशिष्ट ऊष्मा (Cv) से अधिक होता है।
स्पष्टीकरण:
जब किसी गैस को स्थिर आयतन पर ऊष्मा दी जाती है, तो आयतन नियत रहने के कारण कोई बाह्य कार्य नहीं होता (W = 0)। अतः दी गई समस्त ऊष्मा केवल गैस का ताप (आंतरिक ऊर्जा) बढ़ाने में व्यय होती है।
परंतु जब उसी गैस को स्थिर दाब पर ऊष्मा दी जाती है, तो ताप वृद्धि के साथ-साथ गैस में प्रसार भी होता है। इसलिए दी गई ऊष्मा का एक भाग ताप बढ़ाने में तथा शेष भाग दाब के विरुद्ध बाह्य कार्य करने में व्यय होता है।
अतः समान ताप वृद्धि के लिए स्थिर दाब पर अधिक ऊष्मा की आवश्यकता पड़ती है।
इसी कारण Cp > Cv होता है, तथा इनका अंतर Cp - Cv = R (मेयर का सूत्र) होता है।
जल के असंगत प्रसार की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सामान्यतः द्रवों को गर्म करने पर उनका प्रसार होता है और घनत्व घटता है। परंतु जल 0°C से 4°C के बीच एक विशेष व्यवहार प्रदर्शित करता है, जिसे जल का असंगत प्रसार कहते हैं।
व्याख्या:
1. जब 0°C के जल को गर्म किया जाता है, तो 4°C तक इसका आयतन घटने लगता है तथा घनत्व बढ़ता है।
2. 4°C ताप पर जल का घनत्व अधिकतम (1000 kg/m³) तथा आयतन न्यूनतम होता है।
3. 4°C से अधिक गर्म करने पर जल सामान्य द्रवों की भाँति व्यवहार करता है अर्थात् इसका आयतन बढ़ता है और घनत्व घटता है।
प्राकृतिक महत्व: अत्यधिक ठंड में नदियों/झीलों के ऊपर बर्फ जम जाने पर भी निचले तल में जल 4°C पर द्रव रूप में बना रहता है, जिससे जलीय जीव सुरक्षित रहते हैं।
रेखी संवेग संरक्षण के नियम को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
रेखीय संवेग संरक्षण का नियम:
यदि किसी निकाय पर कोई बाह्य बल कार्य न कर रहा हो (F_ext = 0), तो उस निकाय का कुल रेखीय संवेग नियत (संरक्षित) रहता है।
स्पष्टीकरण:
न्यूटन के गति के द्वितीय नियमानुसार:
F_ext = dp / dt
यदि F_ext = 0 हो, तो:
dp / dt = 0
अर्थात् p = नियतांक (प्रारम्भिक कुल संवेग = अन्तिम कुल संवेग)।
उदाहरण: रॉकेट की गति, बंदूक से गोली चलाने पर बंदूक का पीछे की ओर हटना।
समय के निम्नलिखित फलनों में से कौन (i) सरल आवर्त गति तथा (ii) आवर्तगति को निरूपित करता है परन्तु सरल आवर्त गति नहीं। प्रत्येक का आवर्तकाल निकालिए।
उत्तर:
(i) फलन f(t) = sin(ωt) - cos(ωt)
यह फलन सरल आवर्त गति (SHM) को निरूपित करता है।
इसे f(t) = √2 sin(ωt - π/4) के रूप में लिखा जा सकता है।
आवर्तकाल T = 2π / ω
(ii) फलन f(t) = sin³(ωt)
यह आवर्त गति को निरूपित करता है परन्तु यह सरल आवर्त गति नहीं है।
त्रिकोणमितीय सूत्र से: sin³(ωt) = (3 sin(ωt) - sin(3ωt)) / 4
आवर्तकाल T = 2π / ω
ऊष्मा गतिकी के द्वितीय नियम की व्याख्या उपयुक्त आरेख की सहायता से कीजिए। ऊष्मा-इंजन, प्रशीतित्र कैसे भिन्न हैं?
उत्तर:
ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम:
यह नियम ऊष्मा के कार्य में परिवर्तन की दिशा व सीमा को निर्धारित करता है। इसके दो प्रमुख कथन हैं:
1. केल्विन-प्लांक का कथन:
कोई भी ऐसा ऊष्मा इंजन बनाना सम्भव नहीं है जो एक चक्र में कार्य करते हुए किसी एक ही स्रोत से ऊष्मा लेकर उसे पूर्णतः कार्य में बदल दे।
2. क्लॉसियस का कथन:
ऐसी कोई स्वतः चालित मशीन सम्भव नहीं है जो बिना किसी बाह्य ऊर्जा के ऊष्मा को ठंडी वस्तु से गर्म वस्तु की ओर प्रवाहित कर सके।
चित्र (आरेख) का विवरण:
- आरेख के ऊपरी भाग में उच्च ताप T1 पर ऊष्मा स्रोत दर्शाया जाता है।
- आरेख के निचले भाग में निम्न ताप T2 पर ऊष्मा सिंक दर्शाया जाता है।
- मध्य भाग में कार्यकारी पदार्थ (इंजन/प्रशीतित्र) स्थित होता है।
- ऊष्मा इंजन में ऊष्मा स्रोत (T1) से Q1 ऊष्मा ली जाती है, कार्य W = Q1 - Q2 प्राप्त होता है तथा शेष ऊष्मा Q2 सिंक को दी जाती है।
- प्रशीतित्र में सिंक (T2) से Q2 ऊष्मा ली जाती है, बाह्य कार्य W किया जाता है तथा कुल ऊष्मा Q1 = Q2 + W स्रोत (T1) को निष्कासित की जाती है।
परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।
अंतर:
1. ऊष्मा इंजन उच्च ताप स्रोत से ऊष्मा लेकर यांत्रिक कार्य प्रदान करता है, जबकि प्रशीतित्र बाह्य कार्य की सहायता से निम्न ताप निकाय से ऊष्मा निकालकर उच्च ताप निकाय को देता है।
2. इंजन की दक्षता η = W / Q1 (सदा 1 से कम) होती है, जबकि प्रशीतित्र का कार्य गुणांक β = Q2 / W होता है।
अथवा
(अथवा)
तरल दाब क्या है? तरल स्तम्भ के कारण दाब का व्यंजक प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
तरल दाब:
किसी तरल द्वारा उसके सम्पर्क में आने वाले किसी पृष्ठ के एकांक क्षेत्रफल पर अभिलम्बवत् आरोपित बल को तरल दाब (P) कहते हैं।
P = F / A
इसका मात्रक न्यूटन/मीटर² (N/m²) या पास्कल (Pa) है।
तरल स्तम्भ के कारण दाब का व्यंजक:
माना d घनत्व का द्रव एक पात्र में भरा है। द्रव की मुक्त सतह से h गहराई पर A अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल वाले एक काल्पनिक बेलनाकार तरल स्तम्भ पर विचार करते हैं।
1. तरल स्तम्भ का आयतन V = A × h
2. तरल स्तम्भ का द्रव्यमान m = V × d = A × h × d
3. तली पर तरल का भार (आरोपित बल) F = m × g = A × h × d × g
4. तरल स्तम्भ के कारण दाब P:
P = F / A
P = (A × h × d × g) / A
P = h d g
अतः उत्तर:
h गहराई पर तरल स्तम्भ के कारण उत्पन्न दाब P = h d g है।
(क) किसी तल की उत्सर्जन क्षमता e की परिभाषा लिखिए।
(ख) विलगित निकाय क्या होता है? इसका द्रव्यमान केन्द्र किस प्रकार गति करता है?
(ग) सामान्य ताप तथा स्थिर दाब 1.0 × 10⁵ न्यूटन/मीटर² पर किसी आदर्श गैस के आयतन में 2.0 सेमी³ की कमी करने के लिए कितना बाह्य कार्य करना होगा?
(घ) सूर्य के परितः पृथ्वी के क्षेत्रीय वेग की दिशा क्या है?
उत्तर:
(क) उत्सर्जन क्षमता e की परिभाषा:
किसी निश्चित ताप पर किसी पृष्ठ के एकांक क्षेत्रफल से प्रति सेकण्ड उत्सर्जित होने वाली ऊष्मीय विकिरण ऊर्जा को उस पृष्ठ की उत्सर्जन क्षमता (e) कहते हैं। इसका SI मात्रक वाट/मीटर² या जूल/(मीटर²-सेकण्ड) होता है।
(ख) विलगित निकाय एवं द्रव्यमान केन्द्र की गति:
वह निकाय जिस पर कोई बाह्य बल कार्य नहीं करता है (F_ext = 0), विलगित निकाय कहलाता है। बाह्य बल की अनुपस्थिति में विलगित निकाय का द्रव्यमान केन्द्र या तो स्थिर रहता है या नियत वेग से एक सरल रेखा में गति करता है।
(ग)
दिया है:
स्थिर दाब P = 1.0 × 10⁵ न्यूटन/मीटर²
आयतन में परिवर्तन ΔV = -2.0 सेमी³ = -2.0 × 10⁻6 मीटर³ (कमी होने के कारण)
ज्ञात सूत्र:
कार्य W = P × ΔV
हल:
W = (1.0 × 10⁵) × (-2.0 × 10⁻6)
W = -0.2 जूल
गैस द्वारा किया गया कार्य -0.2 जूल है, अतः गैस पर किया गया बाह्य कार्य 0.2 जूल होगा।
अतः उत्तर:
आयतन में कमी करने के लिए आवश्यक बाह्य कार्य 0.2 जूल है।
(घ) सूर्य के परितः पृथ्वी के क्षेत्रीय वेग की दिशा:
सूर्य के परितः पृथ्वी के क्षेत्रीय वेग (dA/dt) की दिशा पृथ्वी की कक्षा के तल के लम्बवत् होती है, जो पृथ्वी के कोणीय संवेग की दिशा के अनुदिश होती है।
(क) किसी घन की प्रत्येक भुजा की माप 7.203 मीटर है। उचित सार्थक अंकों तक घन की कुल पृष्ठ क्षेत्रफल एवं आयतन ज्ञात कीजिए।
(ख) एक प्रक्षेप्य का प्रारम्भिक वेग (3î + 4ĵ) मीटर/सेकण्ड है। इसका प्रक्षेपण कोण, उड्डयन काल, महत्तम ऊँचाई तथा क्षैतिज परास ज्ञात कीजिए। (g = 10 मी/से²)
(ग) सिद्ध कीजिए कि कोणीय संवेग के परिवर्तन की समय दर लगाए गए बल-आघूर्ण के बराबर होती है।
(घ) किसी लिफ्ट में लटकाए गए एक सरल लोलक के दोलन के आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ता है जब लिफ्ट एक त्वरण a से ऊपर चढ़ रही है।
उत्तर:
(क)
दिया है:
घन की भुजा a = 7.203 मीटर (4 सार्थक अंक)
ज्ञात सूत्र:
कुल पृष्ठ क्षेत्रफल A = 6 × a²
आयतन V = a³
हल:
1. कुल पृष्ठ क्षेत्रफल:
A = 6 × (7.203)²
A = 6 × 51.883209 = 311.299254 मीटर²
सार्थक अंकों के नियमानुसार परिणाम में 4 सार्थक अंक रखने पर:
A = 311.3 मीटर²
2. आयतन:
V = (7.203)³ = 373.714737 मीटर³
सार्थक अंकों के नियमानुसार परिणाम में 4 सार्थक अंक रखने पर:
V = 373.7 मीटर³
अतः उत्तर:
घन का कुल पृष्ठ क्षेत्रफल 311.3 मीटर² तथा आयतन 373.7 मीटर³ है।
(ख)
दिया है:
प्रारम्भिक वेग vector u = (3î + 4ĵ) मीटर/सेकण्ड
क्षैतिज घटक uₓ = 3 मीटर/सेकण्ड
ऊर्ध्वाधर घटक u_y = 4 मीटर/सेकण्ड
g = 10 मीटर/सेकण्ड²
ज्ञात सूत्र:
1. प्रक्षेपण कोण θ = tan⁻¹(u_y / uₓ)
2. उड्डयन काल T = (2 × u_y) / g
3. महत्तम ऊँचाई H = (u_y)² / (2g)
4. क्षैतिज परास R = (2 × uₓ × u_y) / g
हल:
1. प्रक्षेपण कोण θ:
tan θ = 4 / 3 = 1.333
θ = tan⁻¹(4/3) ≈ 53.13°
2. उड्डयन काल T:
T = (2 × 4) / 10 = 0.8 सेकण्ड
3. महत्तम ऊँचाई H:
H = (4)² / (2 × 10) = 16 / 20 = 0.8 मीटर
4. क्षैतिज परास R:
R = (2 × 3 × 4) / 10 = 24 / 10 = 2.4 मीटर
अतः उत्तर:
प्रक्षेपण कोण tan⁻¹(4/3) या 53.13°, उड्डयन काल 0.8 सेकण्ड, महत्तम ऊँचाई 0.8 मीटर तथा क्षैतिज परास 2.4 मीटर है।
(ग) कोणीय संवेग परिवर्तन की दर एवं बल-आघूर्ण में सम्बन्ध:
किसी कण का कोणीय संवेग L = r × p
जहाँ r स्थिति सदिश तथा p रेखीय संवेग है।
समय t के सापेक्ष अवकलन करने पर:
dL/dt = d/dt (r × p)
dL/dt = (dr/dt × p) + (r × dp/dt)
हम जानते हैं कि dr/dt = v तथा p = m × v
अतः (dr/dt × p) = v × (m × v) = m × (v × v) = 0 (क्योंकि स्व-सदिश गुणन शून्य होता है)।
न्यूटन के द्वितीय नियम से dp/dt = F (बल)।
अतः:
dL/dt = 0 + (r × F)
dL/dt = r × F
चूँकि बल-आघूर्ण τ = r × F होता है, अतः:
dL/dt = τ
अतः सिद्ध हुआ कि कोणीय संवेग के परिवर्तन की समय दर लगाए गए बल-आघूर्ण के बराबर होती है।
(घ) लिफ्ट में सरल लोलक का आवर्तकाल:
विराम अवस्था में आवर्तकाल T = 2π √(l / g) होता है।
जब लिफ्ट त्वरण a से ऊपर की ओर चढ़ती है, तो छद्म बल के कारण लोलक पर प्रभावी गुरुत्वीय त्वरण बढ़ जाता है:
g' = g + a
नया आवर्तकाल T' = 2π √(l / (g + a))
चूँकि g' > g है, अतः T' < T होगा।
अतः उत्तर:
जब लिफ्ट त्वरण a से ऊपर चढ़ती है, तो सरल लोलक का आवर्तकाल घट जाता है।
(क) गैसों के अणुगति सिद्धान्त की मुख्य परिकल्पनाएँ लिखिए।
(ख) Cp > Cv इस कथन को स्पष्ट कीजिए। सभी प्रतीक सामान्य अर्थों में प्रयुक्त हैं।
(ग) जल के असंगत प्रसार की व्याख्या कीजिए।
(घ) रेखी संवेग संरक्षण के नियम को स्पष्ट कीजिए।
(ङ) समय के निम्नलिखित फलनों में से कौन (i) सरल आवर्त गति तथा (ii) आवर्तगति को निरूपित करता है परन्तु सरल आवर्त गति नहीं। प्रत्येक का आवर्तकाल निकालिए।
उत्तर:
(क) गैसों के अणुगति सिद्धान्त की मुख्य परिकल्पनाएँ:
1. प्रत्येक गैस अति सूक्ष्म कणों से मिलकर बनी होती है जिन्हें अणु कहते हैं।
2. गैस के अणु निरन्तर सभी सम्भव दिशाओं में सीधी रेखाओं में तीव्र गति करते हैं।
3. गैस के अणुओं का वास्तविक आयतन बर्तन के कुल आयतन की तुलना में नगण्य होता है।
4. अणुओं के मध्य कोई आकर्षण या प्रतिकर्षण बल कार्य नहीं करता है।
5. अणुओं की परस्पर एवं बर्तन की दीवारों से होने वाली टक्करें पूर्णतः प्रत्यास्थ होती हैं।
(ख) Cp > Cv का स्पष्टीकरण:
जब गैस को स्थिर आयतन पर ऊष्मा दी जाती है, तो आयतन में परिवर्तन शून्य होने के कारण गैस कोई बाह्य कार्य नहीं करती (W = 0)। दी गई सम्पूर्ण ऊष्मा केवल गैस के ताप तथा आंतरिक ऊर्जा को बढ़ाने में व्यय होती है।
जब गैस को स्थिर दाब पर ऊष्मा दी जाती है, तो ताप बढ़ाने के साथ-साथ गैस का प्रसार भी होता है जिससे बाह्य दाब के विरुद्ध कार्य भी करना पड़ता है।
समान ताप वृद्धि के लिए स्थिर दाब पर अधिक ऊष्मा की आवश्यकता होती है। अतः Cp सदैव Cv से बड़ा होता है (Cp > Cv)। इनका अंतर Cp - Cv = R होता है।
(ग) जल का असंगत प्रसार:
सामान्यतः गर्म करने पर पदार्थों का आयतन बढ़ता है तथा घनत्व घटता है। परन्तु जल को 0°C से 4°C तक गर्म करने पर इसका आयतन घटने लगता है और घनत्व बढ़ता है। 4°C पर जल का घनत्व अधिकतम (1000 किग्रा/मीटर³) होता है। 4°C के पश्चात् गर्म करने पर जल सामान्य पदार्थों की भांति फैलने लगता है। जल के इस असामान्य आचरण को जल का असंगत प्रसार कहते हैं।
(घ) रेखीय संवेग संरक्षण का नियम:
यदि किसी निकाय पर कार्य करने वाला बाह्य परिणामी बल शून्य हो (F_ext = 0), तो उस निकाय का कुल रेखीय संवेग नियत (संरक्षित) रहता है।
F_ext = dp/dt = 0 का अर्थ है p = नियत।
उदाहरण: बंदूक से गोली चलाने पर गोली का आगे की ओर संवेग बंदूक के पीछे की ओर संवेग के बराबर एवं विपरीत होता है, जिससे कुल संवेग शून्य ही बना रहता है।
(ङ) फलनों की विवेचना एवं आवर्तकाल:
(i) सरल आवर्त गति को निरूपित करने वाला फलन y(t) = A sin(ωt + φ) के रूप का होता है। इसका आवर्तकाल T = 2π/ω होता है।
(ii) आवर्ती गति (जो सरल आवर्त गति नहीं है) अनेक ज्यावक्रीय फलनों का संयोजन होती है जैसे sin(ωt) + sin(2ωt)। इसका आवर्तकाल मूलभूत कोणीय आवृत्ति के संगत T = 2π/ω होता है।
संगामी बलों से क्या तात्पर्य है? संगामी बलों के सन्तुलन की विवेचना कीजिए।
अथवा
किसी माध्यम (गैस) में अनुदैर्घ्य तरंगों की चाल के लिए न्यूटन का सूत्र लिखिए। आदर्श गैस के लिए लाप्लास ने इस सूत्र में क्या संशोधित किया और क्यों? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संगामी बल एवं उनका सन्तुलन:
यदि किसी वस्तु के एक ही बिन्दु पर दो या दो से अधिक बल कार्य करते हैं या उनकी क्रिया-रेखाएँ एक ही बिन्दु से होकर गुजरती हैं, तो उन्हें संगामी बल कहते हैं।
संगामी बलों के सन्तुलन के लिए बिन्दु पर कार्य करने वाले सभी बलों का सदिश योग शून्य होना चाहिए:
vector F1 + vector F2 + vector F3 + ... = 0
घटकों के रूप में:
sum Fx = 0
sum Fy = 0
sum Fz = 0
यदि तीन संगामी बल सन्तुलन में हों, तो लमी की प्रमेय के अनुसार:
F1 / sin α = F2 / sin β = F3 / sin γ
चित्र का विवरण:
- एक समतल में एक केन्द्रीय बिन्दु O है।
- बिन्दु O से तीन अलग-अलग दिशाओं में बल F1, F2 तथा F3 के तीर बने हैं।
- बल F1 के विपरीत कोण α, बल F2 के विपरीत कोण β तथा बल F3 के विपरीत कोण γ अंकित है।
- तीनों बलों की क्रिया-रेखाएँ बिन्दु O पर मिलती हैं।
परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।
अथवा
न्यूटन का सूत्र एवं लाप्लास का संशोधन:
न्यूटन के अनुसार गैसीय माध्यम में अनुदैर्घ्य तरंगों की चाल v = √(E / ρ) होती है।
न्यूटन ने माना कि ध्वनि संचरण एक समतापी प्रक्रम है, जिसके लिए आयतन प्रत्यास्थता E = P (दाब) होता है।
अतः न्यूटन का सूत्र:
v = √(P / ρ)
NTP पर वायु में दाब तथा घनत्व का मान रखने पर v = 280 मीटर/सेकण्ड आता है, जो प्रयोगात्मक मान (332 मीटर/सेकण्ड) से काफी कम था।
लाप्लास का संशोधन:
लाप्लास ने बताया कि ध्वनि संचरण इतना तीव्र होता है कि ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं हो पाता, अतः यह एक रुद्धोष्म प्रक्रम है।
रुद्धोष्म प्रक्रम के लिए आयतन प्रत्यास्थता E = γP होती है (जहाँ γ = Cp/Cv)।
लाप्लास का संशोधित सूत्र:
v = √((γP) / ρ)
वायु के लिए γ = 1.41 रखने पर v = 331.3 मीटर/सेकण्ड प्राप्त होता है, जो वास्तविक मान के अत्यंत निकट है।
स्वातन्त्र्य कोटियों एवं रुद्धोष्म स्थिरांक (γ) में सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
अथवा
एक कण सरल आवर्त गति कर रहा है। यदि मध्य स्थिति से x1 तथा x2 दूरियों पर कण के वेग क्रमशः u1 तथा u2 हैं, तो सिद्ध कीजिए कि इसका आवर्तकाल T = 2π √((x2² - x1²) / (u1² - u2²)) होगा।
उत्तर:
स्वातन्त्र्य कोटियों एवं रुद्धोष्म स्थिरांक (γ) में सम्बन्ध:
माना कि किसी गैस के एक अणु की स्वातन्त्र्य कोटियों की संख्या f है।
ऊर्जा के समविभाजन नियम से प्रति अणु औसत गतिज ऊर्जा = (f / 2) k T
1 मोल गैस की कुल आंतरिक ऊर्जा U = N_A × (f / 2) k T = (f / 2) R T
स्थिर आयतन पर मोलर विशिष्ट ऊष्मा Cv:
Cv = dU / dT = (f / 2) R
मेयर के सूत्र से स्थिर दाब पर मोलर विशिष्ट ऊष्मा Cp:
Cp = Cv + R = (f / 2) R + R = (1 + f / 2) R
रुद्धोष्म स्थिरांक γ = Cp / Cv:
γ = [(1 + f / 2) R] / [(f / 2) R]
γ = 1 + (2 / f)
अतः स्वातन्त्र्य कोटियों f तथा रुद्धोष्म स्थिरांक γ में सम्बन्ध γ = 1 + (2 / f) है।
अथवा
सरल आवर्त गति में आवर्तकाल का सूत्र सिद्ध करना:
विस्थापन x पर सरल आवर्त गति कर रहे कण का वेग v = ω √(A² - x²) होता है।
दी गई स्थितियों के लिए:
u1 = ω √(A² - x1²)
u2 = ω √(A² - x2²)
दोनों का वर्ग करने पर:
u1² = ω² (A² - x1²) अर्थात् u1² / ω² = A² - x1² ... (1)
u2² = ω² (A² - x2²) अर्थात् u2² / ω² = A² - x2² ... (2)
समीकरण (1) में से समीकरण (2) घटाने पर:
(u1² - u2²) / ω² = (A² - x1²) - (A² - x2²)
(u1² - u2²) / ω² = x2² - x1²
ω² = (u1² - u2²) / (x2² - x1²)
ω = √((u1² - u2²) / (x2² - x1²))
आवर्तकाल T = 2π / ω
T = 2π / √((u1² - u2²) / (x2² - x1²))
T = 2π √((x2² - x1²) / (u1² - u2²))
अतः सिद्ध हुआ।
ऊष्मा गतिकी के द्वितीय नियम की व्याख्या उपयुक्त आरेख की सहायता से कीजिए। ऊष्मा-इंजन, प्रशीतित्र कैसे भिन्न हैं?
अथवा
तरल दाब क्या है? तरल स्तम्भ के कारण दाब का व्यंजक प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
ऊष्मा गतिकी का द्वितीय नियम एवं उपकरण:
1. केल्विन-प्लांक का कथन: ऐसा कोई ऊष्मा इंजन संभव नहीं है जो किसी चक्र में कार्य करते हुए किसी ऊष्मा स्रोत से ऊष्मा लेकर उसे पूर्णतः यांत्रिक कार्य में बदल दे बिना किसी अन्य भाग में परिवर्तन किए।
2. क्लॉसियस का कथन: बिना किसी बाह्य कार्य की सहायता के ऊष्मा को निम्न ताप की वस्तु से उच्च ताप की वस्तु की ओर प्रवाहित करना सम्भव नहीं है।
चित्र का विवरण:
- बाएँ आरेख (ऊष्मा इंजन): ऊपर उच्च ताप T1 का स्रोत है, बीच में इंजन है और नीचे निम्न ताप T2 का सिंक है। ऊष्मा Q1 स्रोत से इंजन में आती है, कार्य W बाहर निकलता है और शेष Q2 सिंक में जाती है।
- दाएँ आरेख (प्रशीतित्र): नीचे निम्न ताप T2 का सिंक है, बीच में प्रशीतित्र है और ऊपर उच्च ताप T1 का स्रोत है। प्रशीतित्र पर बाहर से कार्य W किया जाता है, जिससे वह निम्न ताप से Q2 ऊष्मा लेकर उच्च ताप पर Q1 = Q2 + W ऊष्मा निष्कासित करता है।
परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।
अंतर:
ऊष्मा-इंजन उच्च ताप से ऊष्मा लेकर कार्य उत्पन्न करता है, जबकि प्रशीतित्र बाह्य कार्य की सहायता से निम्न ताप से ऊष्मा खींचकर उच्च ताप की ओर भेजता है।
अथवा
तरल दाब एवं तरल स्तम्भ के कारण दाब का व्यंजक:
किसी तरल द्वारा पात्र की पेंदी या दीवार के एकांक क्षेत्रफल पर लगाए गए अभिलम्बवत् बल को तरल दाब कहते हैं।
दाब P = F / A
व्यंजक का निगमन:
माना ρ घनत्व के द्रव में द्रव के पृष्ठ से h गहराई पर A क्षेत्रफल का एक क्षैतिज पृष्ठ है।
इस पृष्ठ के ऊपर स्थित द्रव-स्तम्भ का आयतन V = A × h
द्रव-स्तम्भ का द्रव्यमान m = V × ρ = A × h × ρ
द्रव-स्तम्भ का भार F = m × g = A × h × ρ × g
तले पर दाब P = F / A
P = (A × h × ρ × g) / A
P = h ρ g
वायुमण्डलीय दाब P0 को शामिल करने पर कुल दाब P_total = P0 + h ρ g होता है।
चित्र का विवरण:
- पात्र में द्रव भरा है जिसकी ऊपरी सतह खुली है।
- द्रव के भीतर h ऊँचाई और A आधार क्षेत्रफल का एक बेलनाकार द्रव-स्तम्भ दर्शाया गया है।
- बेलन के आधार पर द्रव का दाब P = h ρ g प्रदर्शित है।
परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।