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UP Board Class 11th Smanya Hindi Paper 2026 F Code

कक्षा 11वीं · हिंदी · 2026 · बोर्ड परीक्षा

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प्रश्न 1(क).

'सरस्वती' पत्रिका के प्रथम सम्पादक हैं—

(अ) महावीर प्रसाद द्विवेदी

(ब) श्यामसुन्दर दास

(स) जयशंकर प्रसाद

(द) हरिशंकर परसाई

उत्तर:

(ब) श्यामसुन्दर दास

व्याख्या: 'सरस्वती' पत्रिका का प्रकाशन वर्ष 1900 ई. में प्रारम्भ हुआ था और इसके प्रथम सम्पादक बाबू श्यामसुन्दर दास थे।

प्रश्न 1(ख).

'आनन्द कादम्बिनी' पत्रिका के सम्पादक थे—

(अ) बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन'

(ब) प्रतापनारायण मिश्र

(स) बालकृष्ण भट्ट

(द) सरदार पूर्ण सिंह

उत्तर:

(अ) बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन'

व्याख्या: 'आनन्द कादम्बिनी' मासिक पत्रिका का सम्पादन मिर्जापुर से बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' करते थे।

प्रश्न 1(ग).

'प्रजा हितैषी' समाचार-पत्र के सम्पादक थे—

(अ) राजा शिवप्रसाद 'सितारेहिन्द'

(ब) राजा लक्ष्मण सिंह

(स) अज्ञेय

(द) लल्लू लाल

उत्तर:

(ब) राजा लक्ष्मण सिंह

व्याख्या: 'प्रजा हितैषी' समाचार-पत्र का सम्पादन राजा लक्ष्मण सिंह द्वारा वर्ष 1855 ई. में आगरा से किया गया था।

प्रश्न 1(घ).

'सत्यार्थ प्रकाश' रचना है—

(अ) स्वामी दयानन्द सरस्वती की

(ब) स्वामी विवेकानन्द की

(स) राजा राममोहन राय की

(द) रामकृष्ण परमहंस की

उत्तर:

(अ) स्वामी दयानन्द सरस्वती की

व्याख्या: 'सत्यार्थ प्रकाश' आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती का प्रसिद्ध ग्रन्थ है।

प्रश्न 1(ङ).

'मेरी असफलताएँ' किस विधा की रचना है?

(अ) निबन्ध

(ब) आत्मकथा

(स) संस्मरण

(द) रेखाचित्र

उत्तर:

(ब) आत्मकथा

व्याख्या: 'मेरी असफलताएँ' बाबू गुलाबराय की प्रसिद्ध आत्मकथात्मक कृति है।

प्रश्न 2 (क).

हिन्दी साहित्य का प्रथम कवि माना जाता है—

(अ) सरहपा को

(ब) चन्दबरदाई को

(स) कबीर को

(द) भूषण को

उत्तर:

(अ) सरहपा को

व्याख्या: राहुल सांकृत्यायन तथा अधिकांश विद्वानों ने सरहपा को हिन्दी का प्रथम कवि माना है।

प्रश्न 2 (ख).

'पृथ्वीराज रासो' किसकी रचना है?

(अ) नरपति नाल्ह

(ब) चन्दबरदाई

(स) जगनिक

(द) दलपति विजय

उत्तर:

(ब) चन्दबरदाई

व्याख्या: 'पृथ्वीराज रासो' आदिकाल के महाकवि चन्दबरदाई द्वारा रचित प्रसिद्ध महाकाव्य है।

प्रश्न 2 (ग).

'भक्तिकाल' की समय-सीमा मानी जाती है—

(अ) संवत् 1050 से 1375 तक

(ब) संवत् 1375 से 1700 तक

(स) संवत् 1700 से 1900 तक

(द) संवत् 1900 से अब तक

उत्तर:

(ब) संवत् 1375 से 1700 तक

व्याख्या: आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार भक्तिकाल की समयावधि संवत् 1375 से 1700 तक मानी गई है।

प्रश्न 2 (घ).

'कबीरदास' किस धारा के कवि हैं?

(अ) ज्ञानमार्गी शाखा

(ब) प्रेममार्गी शाखा

(स) रामभक्ति शाखा

(द) कृष्णभक्ति शाखा

उत्तर:

(अ) ज्ञानमार्गी शाखा

व्याख्या: कबीरदास निर्गुण भक्तिधारा की ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं।

प्रश्न 2 (ङ).

'बिहारी सतसई' किस काल की रचना है?

(अ) आदिकाल

(ब) भक्तिकाल

(स) रीतिकाल

(द) आधुनिक काल

उत्तर:

(स) रीतिकाल

व्याख्या: 'बिहारी सतसई' रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि बिहारी लाल द्वारा रचित रचना है।

प्रश्न 3.

निम्नलिखित कथनों में से कोई एक कथन सही है, उसे पहचानकर लिखिए—

(अ) 'पुरस्कार' कहानी के लेखक जयशंकर प्रसाद हैं।

(ब) 'गबन' प्रेमचन्द का प्रसिद्ध नाटक है।

(स) 'चिन्तामणि' आचार्य रामचंद्र शुक्ल का काव्य-ग्रन्थ है।

(द) 'तितली' महादेवी वर्मा की रचना है।

उत्तर:

(अ) 'पुरस्कार' कहानी के लेखक जयशंकर प्रसाद हैं।

व्याख्या: 'पुरस्कार' जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कहानी है, जबकि 'गबन' उपन्यास है, 'चिन्तामणि' निबंध-संग्रह है तथा 'तितली' जयशंकर प्रसाद का उपन्यास है।

प्रश्न 4.

दिये गये गद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–

विद्या-कला-कविता साहित्य, धन और राजत्व से भी आचरण की सभ्यता अधिक ज्योतिष्मती है। आचरण की सभ्यता को प्राप्त करके एक कंगाल आदमी राजाओं के दिलों पर भी अपना प्रभुत्व जमा सकता है। इस सभ्यता के दर्शन से कला, साहित्य और संगीत को अद्भुत सिद्धि प्राप्त होती है।

(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(iii) आचरण की सभ्यता का संसार के सभी ज्ञान और धन-ऐश्वर्यों में क्या स्थान है?

(iv) संसार में सभी प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति का एकमात्र साधन क्या है?

(v) गद्यांश की भाषा-शैली व्यक्त कीजिए।

उत्तर:

(i) सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के गद्य-भाग में संकलित 'आचरण की सभ्यता' नामक पाठ से उद्धृत है। इसके लेखक सरदार पूर्ण सिंह हैं।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या:

रेखांकित अंश: विद्या-कला-कविता साहित्य, धन और राजत्व से भी आचरण की सभ्यता अधिक ज्योतिष्मती है।

व्याख्या: लेखक का कथन है कि संसार में विद्या, कला, काव्य, साहित्य, धन-दौलत और राज-सत्ता की तुलना में श्रेष्ठ आचरण अत्यधिक गरिमामय, प्रभावकारी और प्रकाशमान होता है। व्यक्ति का उत्तम आचरण ही उसके व्यक्तित्व को सच्चा उत्कर्ष और सम्मान प्रदान करता है।

(iii) आचरण की सभ्यता का संसार के समस्त ज्ञान, धन, ऐश्वर्य, विद्या, कला और राजत्व से भी उच्च तथा अधिक ज्योतिष्मती (प्रकाशमान) स्थान है।

(iv) संसार में कला, साहित्य, संगीत तथा अन्य सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करने का एकमात्र साधन आचरण की सभ्यता है।

(v) गद्यांश की भाषा परिमार्जित, तत्समप्रधान एवं भावानुकूल हिंदी है। शैली विचारात्मक, प्रवाहात्मक तथा प्रभावपूर्ण है।

अथवा

प्रश्न 4.

संयमन का उपदेश हमारे ऋषि-मुनि देते आए हैं, किन्तु इसके बुरे नतीजे भी हमारे सामने हैं—बड़े-बड़े तपस्वियों की लम्बी-लम्बी तपस्याएँ एक रम्भा, एक मेनका, एक उर्वशी की मुस्कान पर स्खलित हो गईं। आज भी देखिए। गाँधी जी के तीस वर्ष के उपदेशों और आदेशों पर चलने वाले हम तपस्वी किस तरह दिन-दिन नीचे गिरते जा रहे हैं। इसलिए उपाय एकमात्र है—वृत्तियों के उन्नयन का।

(i) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(iii) प्रस्तुत गद्यांश किस प्रसंग पर आधारित है?

(iv) गाँधी जी के आदर्शों और उनके अनुयायियों के सन्दर्भ में लेखक क्या कहते हैं?

(v) इन्द्रियों के संयमन के विषय में लेखक ने क्या कहा है?

उत्तर:

(i) पाठ का शीर्षक: गेहूँ बनाम गुलाब

लेखक का नाम: रामवृक्ष बेनीपुरी

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या:

रेखांकित अंश: इसलिए उपाय एकमात्र है—वृत्तियों के उन्नयन का।

व्याख्या: लेखक कहते हैं कि केवल इन्द्रियों का कठोरतापूर्वक दमन करने से मनुष्य का नैतिक पतन हो सकता है। अतः मानव जीवन को श्रेष्ठता की ओर ले जाने का एकमात्र उपाय यह है कि उसकी निम्नगामी मनोवृत्तियों का उदात्तीकरण (उन्नयन) करके उन्हें उच्च एवं सृजनात्मक दिशा की ओर मोड़ा जाए।

(iii) प्रस्तुत गद्यांश केवल इन्द्रिय-संयम एवं दमन के दुष्परिणामों तथा मानव की मनोवृत्तियों के उन्नयन (उदात्तीकरण) की आवश्यकता के प्रसंग पर आधारित है।

(iv) गाँधी जी के आदर्शों और अनुयायियों के सन्दर्भ में लेखक कहते हैं कि गाँधी जी के तीस वर्षों के उपदेशों और आदेशों पर चलने वाले अनुयायी भी सच्चे आत्म-साक्षात्कार के बिना दिन-प्रतिदिन अपने नैतिक मूल्यों से नीचे गिरते जा रहे हैं।

(v) इन्द्रियों के संयमन के विषय में लेखक ने कहा है कि केवल बलपूर्वक संयम रखने के दुष्परिणाम सामने आते हैं, जिससे बड़े-बड़े तपस्वियों की तपस्या भी स्खलित हो जाती है। इसलिए केवल संयम के स्थान पर वृत्तियों का उन्नयन करना ही सही मार्ग है।

प्रश्न 5(i).

कविता का शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।

उत्तर:

कविता का शीर्षक: शिवाजी शौर्य

कवि का नाम: महाकवि भूषण

प्रश्न 5(ii).

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर:

व्याख्या: महाकवि भूषण छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना के प्रस्थान का ओजस्वी वर्णन करते हुए कहते हैं कि जब शिवाजी महाराज की विशाल चतुरंगिणी सेना युद्ध जीतने के उद्देश्य से प्रस्थान करती है, तो सेना द्वारा उड़ाई गई अत्यधिक धूल से संपूर्ण आकाश आच्छादित हो जाता है और सूर्य एक छोटे तारे के समान धुँधला दिखाई देने लगता है। इसके साथ ही, विशाल सेना के चलने से पृथ्वी में ऐसा कम्पन होता है कि समुद्र इस प्रकार हिलने-डुलने लगता है जैसे किसी थाली में रखा हुआ पारा हिल रहा हो।

प्रश्न 5(iii).

'गजन की ठैलपैल सैल उलसत हैं' में कौन-सा अलंकार है?

उत्तर:

इस पंक्ति में अनुप्रास अलंकार तथा अतिशयोक्ति अलंकार है।

प्रश्न 5(iv).

युद्ध के लिए शिवाजी के प्रस्थान के समय किसका पद किस प्रकार का था?

उत्तर:

युद्ध के लिए शिवाजी के प्रस्थान के समय उनकी चतुरंगिणी सेना अत्यंत उत्साह और उमंग से परिपूर्ण थी। नगाड़ों का भीषण गर्जन हो रहा था, हाथियों के गण्डस्थल से बहने वाले मद से नदी-नाले भर गए थे तथा सर्वत्र खलबली और कम्पन व्याप्त था।

प्रश्न 6(क).

निम्नलिखित में से किसी एक लेखक का साहित्यिक-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए— (शब्द सीमा 80 शब्द)

(i) राहुल सांकृत्यायन

(ii) सरदार पूर्ण सिंह

(iii) रामवृक्ष बेनीपुरी

उत्तर:

(i) राहुल सांकृत्यायन

साहित्यिक परिचय:

महापंडित राहुल सांकृत्यायन हिंदी के महान विद्वान, यात्रा-साहित्यकार और बहुभाषाविद थे। उन्होंने यात्रा-साहित्य, उपन्यास, कहानी, जीवनी और इतिहास-दर्शन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के कारण उन्होंने व्यापक देश-विदेश की यात्राएँ कीं और अपने जीवंत अनुभवों को साहित्य में ढाला। उनकी रचनाओं में प्रगतिशील दृष्टि और इतिहास की गहरी समझ दिखाई देती है।

प्रमुख कृतियाँ:

यात्रा-साहित्य: मेरी तिब्बत यात्रा, मेरी लद्दाख यात्रा, घुमक्कड़ शास्त्र, रूस में पच्चीस मास।

उपन्यास: वोल्गा से गंगा, सिंह सेनापति, जय यौधेय, मधुर स्वप्न।

आत्मकथा: मेरी जीवन यात्रा।

(ii) सरदार पूर्ण सिंह

साहित्यिक परिचय:

सरदार पूर्ण सिंह हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार और विचारवंत थे। उन्होंने मात्र छह हिंदी निबंध लिखकर साहित्य जगत में स्थायी ख्याति अर्जित की। उनके निबंधों में भावात्मकता, विचारात्मकता और आचरण की पवित्रता का सुंदर समावेश है। वे मानव-मूल्यों, नैतिक सिद्धांतों और श्रम के महान समर्थक थे। उनकी भाषा-शैली विचारोत्तेजक और शैलीगत वैशिष्ट्य से परिपूर्ण है।

प्रमुख कृतियाँ:

निबंध: आचरण की सभ्यता, मजदूरी और प्रेम, सच्ची वीरता, पवित्रता, कन्यादान, अमेरिका का मस्त योगी वाल्ट व्हिटमैन।

(iii) रामवृक्ष बेनीपुरी

साहित्यिक परिचय:

रामवृक्ष बेनीपुरी हिंदी के प्रमुख रेखाचित्रकार, निबंधकार और शैलीकार थे। उन्हें 'कलम का जादूगर' कहा जाता है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेते हुए ओजस्वी साहित्य का सृजन किया। उनकी रचनाओं में भावुकता, चित्रात्मकता और गद्यात्मक काव्य का अनूठा संगम मिलता है। उनकी भाषा में अद्भुत प्रवाह और सम्मोहन है।

प्रमुख कृतियाँ:

रेखाचित्र व संस्मरण: माटी की मूरतें, गेहूं और गुलाब, लाल तारा, मील के पत्थर।

नाटक: अम्बपाली, सीता की माँ, रामराज्य।

यात्रा-साहित्य: पैरों में पंख बाँधकर, उड़ते चलो उड़ते चलो।

प्रश्न 6(ख).

निम्नलिखित में से किसी एक कवि का साहित्यिक-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए— (शब्द सीमा 80 शब्द)

(i) सूरदास

(ii) कबीरदास

(iii) महाकवि भूषण

उत्तर:

(i) सूरदास

साहित्यिक परिचय:

सूरदास भक्ति काल की सगुण भक्तिधारा के कृष्णभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। वे अष्टछाप के प्रमुख कवियों में सर्वोपरि हैं। सूरदास को वात्सल्य और श्रृंगार रस का सम्राट माना जाता है। उन्होंने श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं, रूप-सौंदर्य और गोपियों के विरह का अत्यंत सजीव, सूक्ष्म एवं मार्मिक चित्रण किया है। इनकी रचनाएँ शुद्ध एवं साहित्यिक ब्रजभाषा में हैं।

प्रमुख कृतियाँ:

सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य-लहरी।

(ii) कबीरदास

साहित्यिक परिचय:

कबीरदास भक्ति काल की ज्ञानाश्रयी निर्गुण शाखा के प्रतिनिधि कवि और महान समाज-सुधारक थे। उन्होंने धार्मिक कुरीतियों, बाह्याचारों, जाति-पाति और अंधविश्वासों का कड़ा विरोध किया। वे निर्गुण-निराकार ब्रह्म के उपासक थे और गुरु-महिमा तथा संत-संगति पर अत्यधिक बल देते थे। उनकी भाषा सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी कहलाती है।

प्रमुख कृतियाँ:

कबीर की रचनाओं का संग्रह 'बीजक' नाम से प्रसिद्ध है, जिसके तीन भाग हैं:

1. साखी

2. सबद

3. रमैनी

(iii) महाकवि भूषण

साहित्यिक परिचय:

महाकवि भूषण रीति काल के अद्वितीय वीर रस के कवि हैं। रीति काल की श्रृंगारिक धारा के विपरीत उन्होंने छत्रपति शिवाजी और छत्रसाल बुंदेला के पराक्रम, शौर्य तथा धर्म-रक्षा का ओजस्वी वर्णन किया। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना और जातीय स्वाभिमान की झलक मिलती है। इनकी काव्य-भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा है, जिसमें ओज गुण की प्रधानता है।

प्रमुख कृतियाँ:

शिवराज भूषण, शिवा बावनी, छत्रसाल दशक।

प्रश्न 7.

'प्रायश्चित' कहानी की नायिका 'रामू की बहू' का चरित्र-चित्रण कीजिए— (शब्द सीमा 80 शब्द)

अथवा

'आकाशदीप' कहानी की समीक्षा कीजिए।

उत्तर:

'प्रायश्चित' कहानी की नायिका 'रामू की बहू' का चरित्र-चित्रण:

भगवतीचरण वर्मा द्वारा रचित 'प्रायश्चित' कहानी की मुख्य पात्र रामू की बहू एक नववधू है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

1. अनुभवहीन एवं कामचोर: चौदह वर्ष की रामू की बहू गृहकार्य में अनुभवहीन है। उसे घर की जिम्मेदारियों का ठीक से ज्ञान नहीं है।

2. बिल्ली से परेशान और क्रोधी: घर में कबरी बिल्ली द्वारा दूध-मलाई चट कर जाने से वह अत्यधिक क्रोधित हो जाती है और उसे मारने की योजना बनाती है।

3. अविवेकी: बिल्ली पर पाटा फेंककर मारने के कारण वह संकट में पड़ जाती है, क्योंकि पंडित जी इसे 'गोहत्या' के समान पाप घोषित कर देते हैं।

अथवा

'आकाशदीप' कहानी की समीक्षा:

जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित 'आकाशदीप' एक ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक कहानी है।

1. कथानक: कहानी की नायिका चम्पा और नायक बुद्धगुप्त जलपोत पर बंदी हैं। मुक्त होने के बाद दोनों में प्रेम पनपता है, परंतु पिता के हत्यारे बुद्धगुप्त को समझने के कारण चम्पा का मन कर्तव्य और प्रेम के द्वंद्व में फँस जाता है।

2. पात्र एवं चरित्र-चित्रण: चम्पा एक स्वाभिमानी, कर्तव्यनिष्ठ और त्यागी नारी है, जबकि बुद्धगुप्त एक पराक्रमी पोत-नायक है।

3. उद्देश्य: इसमें व्यक्तिगत प्रेम से ऊपर उठकर जन-सेवा, आत्म-त्याग और कर्तव्य-पालन की महानता को दर्शाया गया है।

4. भाषा-शैली: कहानी की भाषा तत्समप्रधान, अलंकृत तथा भावात्मक है।

प्रश्न 8.

स्वपठित खण्डकाव्य के 'तृतीय अंक' का कथानक अपने शब्दों में लिखिए— (शब्द सीमा 80 शब्द)

अथवा

स्वपठित खण्डकाव्य की 'नायिका' का चरित्र-चित्रण लिखिए।

उत्तर:

स्वपठित खण्डकाव्य (सूत-पुत्र) के तृतीय अंक का कथानक:

'सूत-पुत्र' खण्डकाव्य के तृतीय अंक में कर्ण के त्याग और दानवीरता का वर्णन है। इन्द्र कुरुक्षेत्र युद्ध में अर्जुन की रक्षा हेतु ब्राह्मण का रूप धारण कर कर्ण के पास आते हैं। वे कर्ण से उसके अभेद्य कवच और कुण्डल दान में माँगते हैं। कर्ण जानता है कि कवच-कुण्डल के बिना उसका जीवन संकट में पड़ जाएगा, फिर भी वह अपने दानी स्वभाव के कारण सहर्ष अपना कवच और कुण्डल काटकर इन्द्र को दान दे देता है। इन्द्र कर्ण की इस निस्वार्थ दानवीरता से अत्यधिक प्रभावित होते हैं।

अथवा

स्वपठित खण्डकाव्य (सूत-पुत्र) की नायिका 'कुन्ती' का चरित्र-चित्रण:

1. ममतामयी माता: कुन्ती पांडवों और कर्ण दोनों की माता है। वह अपने पुत्रों से अत्यधिक स्नेह करती है।

2. विवश और लज्जाशील नारी: लोक-लाज के भय से अविवाहित अवस्था में उत्पन्न कर्ण को नदी में बहा देने के कारण वह जीवन भर पश्चाताप की अग्नि में जलती रहती है।

3. दूरदर्शी एवं कर्तव्यनिष्ठ: वह युद्ध को रोकने और पांडवों की रक्षा के लिए कर्ण के पास जाकर उसे सत्य बताती है और उनसे अभयदान की याचना करती है।

प्रश्न 9 (क).

दिये गये संस्कृत गद्यांशों में से किसी एक का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए—

स आह-कुत्र तव कङ्कणम्? व्याघ्रो हस्तं प्रसार्य दर्शयति। पान्थोऽवदत्-कथं मारत्मके त्वयि विश्वासः, व्याघ्रः उवाच-शृणु रे पान्थ। प्रागेव यौवन दशायामहम् अतीव दुर्वृत्तम् आसम्। अनेक गोमानुषाणां वधान्मे पुत्राः मृताः दाराश्च मृताः वंशहीनश्चाहम्। ततः केनचिद् धार्मिकेणाहमादिष्टः—दानधर्मािदकं चस्तु भवान्।

अथवा

भारतदेशस्य सुविस्तृतायाम् उत्तरस्यां दिशि स्थितो गिरिः पर्वतराजो हिमालय इति नाम्नाभिधीयते जनैः। अस्य महोच्चानि शिखराणि जगतः सर्वाणपि पर्वतान् जयन्ति। अतएव लोका एवं पर्वतराजं कथयन्ति।

उत्तर:

प्रथम गद्यांश का सन्दर्भ एवं अनुवाद:

सन्दर्भ: प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सामान्य हिन्दी' के संस्कृत-खण्ड के 'व्याघ्र-पथिक कथा' पाठ से उद्धृत है।

अनुवाद: उसने (राही ने) कहा—तुम्हारा कंगन कहाँ है? बाघ ने हाथ फैलाकर दिखाया। पथिक ने कहा—हिंसक स्वभाव वाले तुम पर कैसे विश्वास किया जाए? बाघ ने कहा—हे राही! सुनो। पहले अपनी युवावस्था में मैं अत्यंत दुराचारी था। अनेक गायों और मनुष्यों को मारने के कारण मेरे पुत्र मर गए और पत्नी भी मर गई, तथा मैं वंशहीन हो गया। उसके बाद किसी धार्मिक व्यक्ति ने मुझे उपदेश दिया कि आप दान-धर्म आदि का आचरण करें।

अथवा

द्वितीय गद्यांश का सन्दर्भ एवं अनुवाद:

सन्दर्भ: प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सामान्य हिन्दी' के संस्कृत-खण्ड के 'हिमालयः' नामक पाठ से उद्धृत है।

अनुवाद: भारत देश की अत्यधिक विस्तृत उत्तर दिशा में स्थित पर्वत लोगों द्वारा 'पर्वतराज हिमालय' इस नाम से पुकारा जाता है। इसकी अत्यंत ऊँची चोटियाँ संसार के सभी पर्वतों को जीतती हैं (अर्थात् उनसे ऊँची हैं)। इसीलिए लोग इसे पर्वतों का राजा (पर्वतराज) कहते हैं।

प्रश्न 9 (ख).

दिये गये संस्कृत पद्यांशों में से किसी एक का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए—

अकीर्तिं विनयो हन्ति हन्त्यनर्थं पराक्रमः।

हन्ति नित्यं क्षमा क्रोधमाचारो हन्त्यलक्षणम्॥

अथवा

मरुस्थल्यां यथा वृष्टिः क्षुधार्ते भोजनम् तथा।

दरिद्रे दीयते दानं सफलं पाण्डुनन्दनः॥

उत्तर:

प्रथम पद्यांश का सन्दर्भ एवं अनुवाद:

सन्दर्भ: प्रस्तुत संस्कृत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सामान्य हिन्दी' के संस्कृत-खण्ड के 'सदाचारः' पाठ से उद्धृत है।

अनुवाद: विनय (नम्रता) अपयश (अकीर्ति) का नाश करती है, पराक्रम अनर्थ को नष्ट करता है, क्षमा सदा क्रोध का नाश करती है, और अच्छा आचरण (सदाचार) कुलक्षणों (बुरे लक्षणों) को नष्ट करता है।

अथवा

द्वितीय पद्यांश का सन्दर्भ एवं अनुवाद:

सन्दर्भ: प्रस्तुत संस्कृत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'सामान्य हिन्दी' के संस्कृत-खण्ड के 'नीति-वचनानि' पाठ से उद्धृत है।

अनुवाद: हे युधिष्ठिर (पाण्डुनन्दन)! मरुभूमि (रेगिस्तान) में वर्षा होना और भूखे व्यक्ति को भोजन मिलना जिस प्रकार सार्थक होता है, उसी प्रकार दरिद्र (निर्धन) व्यक्ति को दिया गया दान ही सफल होता है।

प्रश्न 10.

निम्नलिखित मुहावरों और लोकोक्तियों में से किसी एक का अर्थ लिखते हुए उनका वाक्य में प्रयोग कीजिए—

(क) कुत्ते की मौत मरना

(ख) कूपमण्डूक होना

(ग) सिर माथे पर लेना

(घ) घी के दिये जलाना

उत्तर:

(क) कुत्ते की मौत मरना

अर्थ: बहुत बुरी अथवा दर्दनाक मौत मरना।

वाक्य प्रयोग: समाज में आतंक फैलाने वाले अपराधी अंततः पुलिस की गोली से कुत्ते की मौत मरते हैं।

(ख) कूपमण्डूक होना

अर्थ: सीमित ज्ञान होना या बाहरी दुनिया से अनभिज्ञ होना।

वाक्य प्रयोग: केवल गाँव के भीतर सीमित रहने के कारण रामू कूपमण्डूक बनकर रह गया है।

(ग) सिर माथे पर लेना

अर्थ: सहर्ष स्वीकार करना या अत्यधिक सम्मान देना।

वाक्य प्रयोग: पिता जी के प्रत्येक आदेश को सोहन सिर माथे पर लेता है।

(घ) घी के दिये जलाना

अर्थ: अत्यधिक प्रसन्नता मनाना या खुशियाँ मनाना।

वाक्य प्रयोग: श्री राम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने पर नगरवासियों ने घी के दिये जलाए।

प्रश्न 11.

(क) (i)

'भावकः' का सन्धि-विच्छेद है—

(अ) भाव + अकः

(ब) भा + वकः

(स) भौ + अकः

(द) भौ + वकः

उत्तर:

(स) भौ + अकः

व्याख्या: अयादि सन्धि के नियमानुसार 'औ' और 'अ' के मेल से 'आव्' बनता है, अतः 'भौ + अकः' मिलकर 'भावकः' बनता है।

प्रश्न 11.

(क) (ii)

'महेशः' का सन्धि-विच्छेद है—

(अ) मह + एशः

(ब) महा + ईशः

(स) महे + एशः

(द) महे + शः

उत्तर:

(ब) महा + ईशः

व्याख्या: गुण सन्धि के नियमानुसार 'आ' और 'ई' के मेल से 'ए' बनता है, अतः 'महा + ईशः' मिलकर 'महेशः' बनता है।

प्रश्न 11.

(क) (iii)

'पवित्रम्' का सन्धि-विच्छेद है—

(अ) पव + इत्रम्

(ब) पो + इत्रम्

(स) पउ + इत्रम्

(द) प + वित्रम्

उत्तर:

(ब) पो + इत्रम्

व्याख्या: अयादि सन्धि के नियमानुसार 'ओ' और 'इ' के मेल से 'अवि' बनता है, अतः 'पो + इत्रम्' मिलकर 'पवित्रम्' बनता है।

प्रश्न 11.

(ख) (i)

'आत्मन्' का द्वितीया विभक्ति द्विवचन में रूप होगा—

(अ) आत्मानम्

(ब) आत्मने

(स) आत्मनि

(द) आत्मानौ

उत्तर:

(द) आत्मानौ

व्याख्या: 'आत्मन्' (नकारान्त पुल्लिंग) शब्द के प्रथमा तथा द्वितीया विभक्ति के द्विवचन का रूप 'आत्मानौ' होता है।

प्रश्न 11.

(ख) (ii)

षष्ठी, एकवचन में 'नामन्' का रूप होता है—

(अ) नाम्नोः

(ब) नाम्नः

(स) नामनि

(द) नामाानि

उत्तर:

(ब) नाम्नः

व्याख्या: 'नामन्' (नकारान्त नपुंसकलिंग) शब्द के पञ्चमी तथा षष्ठी विभक्ति के एकवचन में 'नाम्नः' रूप बनता है।

प्रश्न 12(क).

(i).

12. (क) (i) 'अब्ज-अब्द'

(अ) कमल और वर्ष

(ब) वर्ष और कमल

(स) वृद्ध और जीर्ण

(द) चन्दर और सूर्य

उत्तर:

(अ) कमल और वर्ष

व्याख्या: 'अब्ज' का अर्थ 'कमल' तथा 'अब्द' का अर्थ 'वर्ष' होता है।

प्रश्न 12(क).

(ii).

12. (क) (ii) 'वृत्त-वित्त'

(अ) चरित्र और धन

(ब) धन और दौलत

(स) गिरोह और घर

(द) गाँव और घर

उत्तर:

(अ) चरित्र और धन

व्याख्या: 'वृत्त' का अर्थ 'चरित्र' तथा 'वित्त' का अर्थ 'धन' होता है।

प्रश्न 12(ख).

(i).

12. (ख) (i) 'अधर' का अर्थ नहीं है—

(अ) बीच

(ब) उन्माद

(स) ओंठ

(द) शून्य

उत्तर:

(ब) उन्माद

व्याख्या: 'अधर' के अर्थ ओंठ, बीच तथा शून्य होते हैं; 'उन्माद' इसका अर्थ नहीं है।

प्रश्न 12(ख).

(ii).

12. (ख) (ii) 'जड़' का सही अर्थ है—

(अ) तपस्या

(ब) भाग्य

(स) अचेतन

(द) बुद्धिमान

उत्तर:

(स) अचेतन

व्याख्या: 'जड़' का अर्थ अचेतन अथवा चेतनाहीन होता है।

प्रश्न 12(ग).

(i).

12. (ग) (i) जीवित रहने की उत्कट इच्छा—

(अ) जीवन

(ब) जिजीविषा

(स) उत्साह

(द) सर्वोच्च

उत्तर:

(ब) जिजीविषा

व्याख्या: जीवेषण या जीवित रहने की तीव्र इच्छा के लिए एक शब्द 'जिजीविषा' है।

प्रश्न 12(ग).

(ii).

12. (ग) (ii) सेना के ठहरने का स्थान—

(अ) टुकड़ी

(ब) छावनी

(स) शिविर

(द) सेनाघर

उत्तर:

(ब) छावनी

व्याख्या: सेना के रहने या ठहरने के स्थान को 'छावनी' कहते हैं।

प्रश्न 12(घ).

(i).

12. (घ) (i) 'मैं स्वामी जी का दर्शन करूँगा' वाक्य का शुद्ध रूप है—

(अ) मैं दर्शन करूँगा स्वामी जी का।

(ब) दर्शन स्वामी के करूँगा मैं।

(स) स्वामी जी के दर्शन करूँगा मैं।

(द) मैं स्वामी जी के दर्शन करूँगा।

उत्तर:

(द) मैं स्वामी जी के दर्शन करूँगा।

व्याख्या: हिंदी में 'दर्शन' शब्द आदरसूचक होने के कारण सदैव बहुवचन में प्रयुक्त होता है, अतः 'का' के स्थान पर 'के' का प्रयोग शुद्ध है।

प्रश्न 12(घ).

(ii).

12. (घ) (ii) शुद्ध वाक्य है—

(अ) साकेत उच्च कोटि का काव्य है।

(ब) उच्चकोटि का काव्य है साकेत।

(स) साकेत उच्चकोटि का एक काव्य है।

(द) साकेत एक उच्चकोटि का काव्य है।

उत्तर:

(द) साकेत एक उच्चकोटि का काव्य है।

व्याख्या: वाक्य की सही व्याकरणिक संरचना एवं पदक्रम के अनुसार 'साकेत एक उच्चकोटि का काव्य है' शुद्ध रूप है।

प्रश्न 13 (क).

'वीर रस' अथवा 'करुण रस' के स्थायीभाव के साथ उसकी परिभाषा और उदाहरण लिखिए।

उत्तर:

1. वीर रस

स्थायी भाव: उत्साह

परिभाषा: युद्ध अथवा किसी कठिन कार्य को करने के लिए हृदय में स्थित 'उत्साह' नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से परिपुष्ट होता है, तब वीर रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण:

बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी।

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

2. करुण रस

स्थायी भाव: शोक

परिभाषा: प्रिय वस्तु के विनाश, अनिष्ट की प्राप्ति अथवा प्रिय जन के चिर-वियोग से हृदय में उत्पन्न 'शोक' नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से व्यक्त होता है, तब करुण रस की निष्पत्ति होती है।

उदाहरण:

हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी।

तुम देखी सीता मृगनैनी॥

प्रश्न 13 (ख).

'श्लेष' अथवा 'रूपक' अलंकार का लक्षण अथवा उदाहरण लिखिए।

उत्तर:

1. श्लेष अलंकार

लक्षण: जहाँ काव्य में कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हुआ हो, किन्तु उसके एक से अधिक अर्थ निकलते हों, वहाँ श्लेष अलंकार होता है।

उदाहरण:

रहमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥

स्पष्टीकरण: यहाँ 'पानी' शब्द का प्रयोग तीन अर्थों में हुआ है—मोती के पक्ष में चमक, मनुष्य के पक्ष में प्रतिष्ठा (इज्जत), और चून (आटे) के पक्ष में जल।

2. रूपक अलंकार

लक्षण: जहाँ उपमेय में उपमान का भेद-रहित आरोप किया जाए, अर्थात् उपमेय और उपमान में कोई भिन्नता न दिखाई जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है।

उदाहरण:

चरण कमल बँदौ हरि राई।

स्पष्टीकरण: यहाँ हरि के चरणों (उपमेय) पर कमल (उपमान) का अभेद आरोप किया गया है।

प्रश्न 13 (ग).

'चौपाई' अथवा 'सोरठा' छन्द का मात्रा सहित लक्षण अथवा उदाहरण लिखिए।

उत्तर:

1. चौपाई छन्द

लक्षण: यह एक सम-मात्रिक छन्द है। इसके चार चरण होते हैं तथा इसके प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अन्त में जगण (ISI) और तगण (SSI) का प्रयोग वर्जित माना जाता है।

उदाहरण तथा मात्रा-गणना:

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर (16 मात्राएँ)

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर (16 मात्राएँ)

राम दूत अतुलित बल धामा (16 मात्राएँ)

अंजनि पुत्र पवनसुत नामा (16 मात्राएँ)

2. सोरठा छन्द

लक्षण: यह अर्द्धसम-मात्रिक छन्द है। यह दोहा छन्द का ठीक उल्टा होता है। इसके प्रथम और तृतीय (विषम) चरणों में 11-11 मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ (सम) चरणों में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विषम चरणों के अन्त में तुक मिलती है।

उदाहरण तथा मात्रा-गणना:

जो सुमिरत सिधि होइ (11 मात्राएँ)

गनानायक करिबर बदन (13 मात्राएँ)

करहु अनुग्रह सोइ (11 मात्राएँ)

बुद्धि रासि शुभ गुन सदन (13 मात्राएँ)

प्रश्न 14.

किसी बैंक के प्रबन्धक को चिकित्सा शिक्षा हेतु 'शिक्षा ऋण' की प्राप्ति के लिए एक आवेदन-पत्र लिखिए।

अथवा

मतदान में हुई गड़बड़ी के सम्बन्ध में जिला निर्वाचन अधिकारी को शिकायती पत्र लिखिए।

उत्तर:

(मुख्य प्रश्न)

शिक्षा ऋण हेतु आवेदन-पत्र:

सेवा में,

शाखा प्रबन्धक,

भारतीय स्टेट बैंक,

मुख्य शाखा, मेरठ (उत्तर प्रदेश)।

विषय: चिकित्सा शिक्षा हेतु शिक्षा ऋण प्राप्ति के लिए आवेदन-पत्र।

महोदय,

सविनय निवेदन है कि मैंने इस वर्ष उत्तर प्रदेश राज्य स्तरीय नीट (NEET) परीक्षा उत्तीर्ण की है तथा मुझे जी.एस.वी.एम. मेडिकल कॉलेज, कानपुर में एम.बी.बी.एस. (MBBS) पाठ्यक्रम में प्रवेश प्राप्त हुआ है। मेरे अध्ययन की अवधि 4.5 वर्ष है और इस हेतु कुल शिक्षण शुल्क एवं अन्य व्यय लगभग 5,00,000 (पाँच लाख) रुपये हैं।

मेरे पिता जी एक साधारण कृषक हैं तथा उनकी वार्षिक आय सीमित है, जिसके कारण वे मेरी उच्च चिकित्सा शिक्षा का सम्पूर्ण व्यय वहन करने में असमर्थ हैं। मैं अपनी शिक्षा सुचारु रूप से जारी रखना चाहता हूँ।

अतः आपसे नम्र निवेदन है कि मुझे चिकित्सा शिक्षा पूर्ण करने हेतु 5,00,000 रुपये का शिक्षा ऋण स्वीकृत करने की कृपा करें। आवश्यक अभिलेख एवं प्रवेश सम्बन्धी पत्र इस आवेदन के साथ संलग्न हैं।

पाठ्यक्रम पूर्ण होने तथा रोजगार प्राप्त होने के उपरान्त मैं ऋण की किस्तों का भुगतान नियमानुसार समय पर कर दूँगा।

संलग्नक:

1. नीट अंक-तालिका एवं आवंटन पत्र की छायाप्रति।

2. शैक्षणिक प्रमाण-पत्रों की छायाप्रति।

3. कॉलेज द्वारा निर्गत शुल्क विवरण।

4. आय प्रमाण-पत्र एवं आधार कार्ड।

दिनांक: 15 मार्च 2026

भवदीय,

रमेश कुमार

निवासी: सिविल लाइन्स, मेरठ।

(अथवा विकल्प)

मतदान में हुई गड़बड़ी के सम्बन्ध में शिकायती पत्र:

सेवा में,

जिला निर्वाचन अधिकारी / जिलाधिकारी,

जनपद- लखनऊ (उत्तर प्रदेश)।

विषय: मतदान केन्द्र संख्या-42 पर मतदान में हुई गड़बड़ी के सम्बन्ध में शिकायती पत्र।

महोदय,

मैं आपका ध्यान विधानसभा चुनाव के दौरान दिनांक 14 मार्च 2026 को मतदान केन्द्र संख्या-42 (प्राथमिक विद्यालय, आलमबाग, लखनऊ) पर हुई गम्भीर अनियमितताओं की ओर आकृष्ट कराना चाहता हूँ।

उक्त मतदान केन्द्र पर दोपहर के समय कुछ असामाजिक तत्त्वों द्वारा मतदाताओं को डराने-धमकाने तथा अवैध रूप से मतदान को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। सुरक्षा प्रबन्धों में ढिलाई के कारण अनेक वैध मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग किए बिना वापस लौटने पर विवश हुए। इसके अतिरिक्त कुछ समय के लिए मतदान प्रक्रिया में अनुचित बाधा भी उत्पन्न की गई।

यह स्थिति निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव व्यवस्था के सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है।

अतः आपसे निवेदन है कि इस विषय की त्वरित एवं निष्पक्ष जाँच कराकर दोषी व्यक्तियों तथा लापरवाह कर्मियों के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई करने की कृपा करें तथा आवश्यकतानुसार उक्त बूथ पर पुनः मतदान कराने हेतु उचित आदेश निर्गत करें।

दिनांक: 15 मार्च 2026

भवदीय,

अजय सिंह

निवासी: आलमबाग, लखनऊ।

प्रश्न 15.

निम्नलिखित विषयों में से किसी एक पर अपनी भाषा-शैली में निबन्ध लिखिए—

(क) विज्ञान : वरदान या अभिशाप

(ख) आतंकवाद एक चुनौती

(ग) सुरक्षित यातायात

(घ) बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ।

उत्तर:

(क) विज्ञान : वरदान या अभिशाप

1. प्रस्तावना:

आधुनिक युग विज्ञान का युग है। मानव जीवन का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ विज्ञान का प्रभाव न हो। विज्ञान ने हमारी दिनचर्या, सोच और जीवन-शैली में अभूतपूर्व परिवर्तन किया है।

2. विज्ञान : एक वरदान के रूप में:

विज्ञान ने असम्भव को सम्भव बना दिया है:

अ. यातायात व संचार: रेल, वायुयान, कार, मोबाइल तथा इंटरनेट ने दुनिया को एक वैश्विक गाँव बना दिया है।

ब. चिकित्सा क्षेत्र: असाध्य रोगों के इलाज, आधुनिक शल्य-चिकित्सा और जीवन रक्षक टीकों से अकाल मृत्यु पर रोक लगी है।

स. कृषि व उद्योग: उन्नत तकनीकों से खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि हुई है।

3. विज्ञान : एक अभिशाप के रूप में:

विज्ञान का दुरुपयोग विनाशकारी है। परमाणु बम, जैविक हथियार तथा तीव्र औद्योगिकीकरण से बढ़ा प्रदूषण सम्पूर्ण मानव सभ्यता के लिए खतरा बन गया है।

4. उपसंहार:

विज्ञान स्वयं में न वरदान है और न अभिशाप। यह मनुष्य के प्रयोग करने के ढंग पर निर्भर करता है। यदि इसका उपयोग जनकल्याण के लिए हो तो यह वरदान है, और यदि विनाश के लिए हो तो अभिशाप।

(ख) आतंकवाद एक चुनौती

1. प्रस्तावना:

आतंकवाद आज विश्वव्यापी गम्भीर समस्या बन चुका है। अपनी अमानवीय और असंगत माँगों को मनवाने के लिए हिंसा और भय का वातावरण निर्मित करना ही आतंकवाद है।

2. आतंकवाद के मुख्य कारण:

धार्मिक कट्टरता, बेरोजगारी, अशिक्षा, आर्थिक विषमता तथा पड़ोसी देशों द्वारा प्रायोजित नीतियाँ आतंकवाद को बढ़ावा देती हैं।

3. आतंकवाद का कुप्रभाव:

आतंकवाद से निर्दोष लोगों की जान जाती है, देश की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है और सामाजिक समरसता छिन्न-भिन्न हो जाती है।

4. समाधान के उपाय:

आतंकवाद को समाप्त करने के लिए कड़े कानून, चुस्त सैन्य एवं खुफिया तंत्र, अंतरराष्ट्रीय सहयोग तथा युवाओं को रोजगार व उचित मार्गदर्शन देना अति आवश्यक है।

5. उपसंहार:

आतंकवाद मानवता का सबसे बड़ा शत्रु है। इसका समूल नाश करने के लिए सभी देशों और नागरिकों को एकजुट होकर दृढ संकल्प लेना होगा।

(ग) सुरक्षित यातायात

1. प्रस्तावना:

आधुनिक समय में वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण मार्ग दुर्घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है। अतः सुरक्षित यातायात आज की प्राथमिक आवश्यकता है।

2. दुर्घटनाओं के कारण:

यातायात नियमों की अनदेखी, अनियंत्रित गति, नशे में वाहन चलाना, बिना हेलमेट या सीटबेल्ट के यात्रा करना और वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोग दुर्घटनाओं के मुख्य कारण हैं।

3. सुरक्षित यातायात के नियम:

अ. हमेशा निर्धारित गति सीमा में वाहन चलाएँ।

ब. दुपहिया वाहन चालक हेलमेट तथा चार पहिया वाहन चालक सीटबेल्ट का प्रयोग अनिवार्य रूप से करें।

स. शराब पीकर वाहन कभी न चलाएँ।

द. पैदल यात्री जेब्रा क्रॉसिंग का ही उपयोग करें।

4. उपसंहार:

सुरक्षित यातायात से ही अमूल्य मानव जीवन की रक्षा सम्भव है। "सावधानी हटी, दुर्घटना घटी" के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

(घ) बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ

1. प्रस्तावना:

'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' भारत सरकार का एक अत्यन्त महत्त्वकांक्षी अभियान है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में लिंगानुपात के असंतुलन को दूर करना तथा बेटियों को सशक्त बनाना है।

2. अभियान की आवश्यकता:

समाज में फैली कतिपय कुरीतियों, कन्या भ्रूण हत्या और बाल विवाह के कारण बालिकाओं की संख्या में गिरावट आई थी। इस खाई को समाप्त करने के लिए इस योजना की शुरुआत की गई।

3. योजना के लाभ एवं प्रभाव:

इस अभियान से जन-जागरूकता बढ़ी है। बेटियाँ आज शिक्षा, खेल, विज्ञान, राजनीति और सेना में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर देश का नाम रोशन कर रही हैं।

4. उपसंहार:

बेटियाँ परिवार और समाज की आधारशिला हैं। जब बेटियाँ पढ़ेंगी और आगे बढ़ेंगी, तभी एक समृद्ध और सशक्त भारत का निर्माण होगा।