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UP Board Class 11th Biology Annual Paper 2026 SET 4

कक्षा 11वीं · जीव विज्ञान · 2026 · बोर्ड परीक्षा

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प्रश्न 1.

1. द्विनाम पद्धति किसने प्रतिपादित की थी -

(अ) कैरोलस लिनियस

(ब) राबर्ट हुक

(स) स्ट्रॉस बर्गर

(द) राबर्ट ब्राउन

उत्तर:

सही विकल्प: (अ) कैरोलस लिनियस

व्याख्या: कैरोलस लिनियस ने जीवों के वैज्ञानिक नामकरण हेतु द्विनाम पद्धति का प्रतिपादन किया था।

प्रश्न 2.

2. वर्गीकरण की सबसे बड़ी इकाई है।

(अ) Phylum

(ब) Kingdom

(स) Genus

(द) Family

उत्तर:

सही विकल्प: (ब) Kingdom

व्याख्या: जीव वर्गीकरण की पदानुक्रमित व्यवस्था में जगत (Kingdom) सबसे सर्वोच्च एवं बड़ी इकाई होती है।

प्रश्न 3.

3. प्रिऑन में पाये जाते हैं -

(अ) असामान्य प्रोटीन

(ब) आनुवंशिक पदार्थ

(स) कार्बोहाइड्रेट

(द) DNA

उत्तर:

सही विकल्प: (अ) असामान्य प्रोटीन

व्याख्या: प्रिऑन संक्रामक कारक होते हैं जो केवल असामान्य रूप से मुड़े हुए प्रोटीन से बने होते हैं तथा इनमें न्यूक्लिक अम्ल अनुपस्थित होता है।

प्रश्न 4.

4. जन्तुओं की आँत में प्रायः मिलने वाले जीवाणु -

(अ) E. Coli

(ब) Rhizobium

(स) Cyanobacteria

(द) Virions

उत्तर:

सही विकल्प: (अ) E. Coli

व्याख्या: एस्चेरिचिया कोलाइ (E. Coli) जीवाणु मनुष्य तथा अन्य जन्तुओं की आँत में सामान्य सहभोजी के रूप में पाया जाता है।

प्रश्न 5.

5. स्ट्रेप्टोमाइसीन किससे प्राप्त होती है -

(अ) S. वेनेजुएली

(ब) S. ग्रिसियस

(स) S. फ्रेडियम

(द) सभी

उत्तर:

सही विकल्प: (ब) S. ग्रिसियस

व्याख्या: स्ट्रेप्टोमाइसीन नामक प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक) औषध स्ट्रेप्टोमाइसिस ग्रिसियस (S. griseus) जीवाणु से प्राप्त की जाती है।

प्रश्न 6.

6. पौधों में क्राउन गाल नामक बीमारी किस जीवाणु द्वारा होता है।

(अ) एन्टेरोबैक्टर

(ब) एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमिफैशिएन्स

(स) स्यूडोमोनास

(द) A राइजोजेन्स

उत्तर:

सही विकल्प: (ब) एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमिफैशिएन्स

व्याख्या: एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमिफैशिएन्स जीवाणु पौधों की कोशिकाओं में ट्यूमर प्रेरित कर क्राउन गाल रोग उत्पन्न करता है।

प्रश्न 7.

जीवाणुओं को पूर्णतः समाप्त करने की क्रिया कहलाती है।

(अ) निर्जमीकरण (ब) पाश्चुरीकरण (स) Freezing (द) Sterilization

उत्तर:

सही विकल्प: (अ) निर्जमीकरण

व्याख्या: जीवाणुओं एवं अन्य सभी सूक्ष्मजीवों को पूर्णतः नष्ट करने की क्रिया को निर्जमीकरण (Sterilization) कहते हैं।

प्रश्न 8.

जीवाणु में माइटोकान्ड्रिया के समवृत्ति अंग को कहते हैं -

(अ) राइबोसोम (ब) माइकोप्लाज्म (स) मीजोसोम (द) एपोसोम

उत्तर:

सही विकल्प: (स) मीजोसोम

व्याख्या: जीवाणुओं में माइटोकान्ड्रिया अनुपस्थित होता है, अतः श्वसन एंजाइम कोशिका कला के अंतर्वलन से बने मीजोसोम में पाए जाते हैं।

प्रश्न 9.

प्रोटोजोआ का कौन-सा समूह पूर्णतः परजीवी है -

(अ) सिलिएटा (ब) मैस्टिगोफोरा (स) स्पोरोजोआ (द) सार्कोडीना

उत्तर:

सही विकल्प: (स) स्पोरोजोआ

व्याख्या: स्पोरोजोआ समूह के सभी सदस्य (जैसे प्लाज्मोडियम) अंतःपरजीवी होते हैं।

प्रश्न 10.

EMP में ATP निर्मित होती है -

(अ) 24 ATP (ब) 8 ATP (स) 38 ATP (द) 6 ATP

उत्तर:

सही विकल्प: (ब) 8 ATP

व्याख्या: EMP पथ (ग्लाइकोलाइसिस) की पूरी प्रक्रिया में कुल 8 ATP अणुओं का शुद्ध लाभ होता है।

प्रश्न 11.

पौधों में परॉक्सीसोम का संबंध होता है -

(अ) प्रकाश संश्लेषण (ब) प्रकाश श्वसन (स) प्रदीप्तकालिकता (द) जलअनुवर्तन

उत्तर:

सही विकल्प: (ब) प्रकाश श्वसन

व्याख्या: परॉक्सीसोम कोशिकांग पौधों में प्रकाश श्वसन (Photorespiration) चक्र का प्रमुख भाग होता है।

प्रश्न 12.

किण्वन है -

(अ) अवायवीय श्वसन (ब) संपूर्ण अवायवीय श्वसन (स) श्वसन की प्रक्रिया (द) सभी

उत्तर:

सही विकल्प: (अ) अवायवीय श्वसन

व्याख्या: किण्वन (Fermentation) वह प्रक्रिया है जो ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में अवायवीय जीवों में संपन्न होती है।

प्रश्न 1.

13. फूलिश सीडलिंग नामक बीमारी धान में होती है -

(अ) IAA (ब)] जिबरेलिन (स)] इथलीन (द)] ऑक्सिन

उत्तर:

सही विकल्प: (ब) जिबरेलिन

व्याख्या: धान में मूर्ख अंकुरित (फूलिश सीडलिंग या बकाने) बीमारी जिबरेलिन हार्मोन के अत्यधिक प्रभाव के कारण होती है।

प्रश्न 2.

14. बहुत कम ताप पुष्पन को प्रभावित करने की प्रक्रिया कहलाती है।

(अ) वर्नेलाइजेशन (ब)] थर्मोट्रॉपी (स)] फोटोपीरियडिज्म (द)] क्रायोसजरी

उत्तर:

सही विकल्प: (अ) वर्नेलाइजेशन

व्याख्या: कम तापमान उपचार द्वारा पौधों में पुष्पन की प्रक्रिया को प्रेरित व त्वरित करना वर्नेलाइजेशन (बसंतीकरण) कहलाता है।

प्रश्न 3.

15. जिबरेलिन नामक हार्मोन प्राप्त होता है -

(अ) गेहूं से (ब)] मक्का से (स)] कवक से (द)] धान से

उत्तर:

सही विकल्प: (स) कवक से

व्याख्या: जिबरेलिन हार्मोन सर्वप्रथम जिबरेला फ्यूजीकुरोई (Gibberella fujikuroi) नामक कवक से प्राप्त किया गया था।

प्रश्न 4.

1. वृद्धि किसे कहते हैं?

उत्तर:

जीवों के आकार, आयतन, शुष्क भार तथा कोशिकाओं की संख्या में होने वाली स्थायी एवं अपरिवर्तनीय बढ़ोतरी को वृद्धि कहते हैं। यह सजीवों का एक मूलभूत लक्षण है।

प्रश्न 5.

2. ऑक्सिन हार्मोन की खोज किसने की थी तथा इसका मुख्य कार्य क्या है?

उत्तर:

खोज: ऑक्सिन हार्मोन की खोज चार्ल्स डार्विन तथा उनके पुत्र फ्रांसिस डार्विन ने की थी एवं एफ. डब्ल्यू. वेन्ट ने इसे जई के प्रांकुर चोल से पृथक किया था।

मुख्य कार्य: ऑक्सिन का मुख्य कार्य कोशिका दीर्घीकरण (Cell elongation) को बढ़ावा देना तथा शीर्ष प्रभाविता (Apical dominance) को बनाए रखना है।

प्रश्न 6.

3. किन्हीं दो दुग्ध हार्मोन का नाम बताइए।

उत्तर:

दो मुख्य दुग्ध हार्मोन निम्नलिखित हैं:

1. प्रोलेक्टिन (Prolactin) - यह स्तन ग्रंथियों में दुग्ध के संश्लेषण एवं निर्माण को प्रेरित करता है।

2. ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) - यह स्तन ग्रंथियों से दुग्ध के निष्कासन (Milk ejection) को प्रेरित करता है।

प्रश्न 4.

मानव में किस प्रकार का अंकुरण पाया जाता है?

उत्तर:

मानव में पौधों की भाँति अंकुरण (Germination) नहीं होता है। मानव एक जरायुज (Viviparous) प्राणी है, जिसमें निषेचित अण्ड (युग्मनज) का मादा के गर्भाशय में रोपण (Implantation) होता है तथा आंतरिक भ्रूणीय विकास (Internal embryonic development) के द्वारा शिशु का जन्म होता है।

प्रश्न 5.

लैंगरहैंस की द्वीपिकाएँ शरीर में कहाँ पायी जाती हैं?

उत्तर:

लैंगरहैंस की द्वीपिकाएँ (Islets of Langerhans) मानव शरीर के अग्न्याशय (Pancreas) नामक ग्रंथि में पायी जाती हैं। यह अग्न्याशय का अंतःस्रावी भाग होती हैं, जो मुख्य रूप से इंसुलिन (Insulin) तथा ग्लुकागॉन (Glucagon) हार्मोनों का स्राव करती हैं।

प्रश्न 1.

हार्मोन की परिभाषा लिखिए एवं इसके गुणों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर:

हार्मोन की परिभाषा:

हार्मोन अंतःस्रावी ग्रंथियों (Endocrine glands) द्वारा स्रावित होने वाले वे सूक्ष्म जैविक-रासायनिक संदेशवाहक (Chemical messengers) हैं जो सीधे रुधिर में मुक्त होते हैं तथा शरीर के विशिष्ट अंगों या ऊतकों (लक्ष्य कोशिकाओं) में पहुँचकर उनकी उपापचयी एवं कार्यिकीय गतिविधियों का नियमन करते हैं।

हार्मोन के प्रमुख गुण:

1. ये विशिष्ट नलिकाविहीन ग्रंथियों द्वारा स्रावित होकर सीधे रक्त में प्रवाहित होते हैं।

2. इनकी अत्यंत सूक्ष्म मात्रा ही जैविक क्रियाओं को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त होती है।

3. ये अपने उत्पत्ति स्थल से दूर स्थित लक्ष्य अंगों (Target organs) पर कार्य करते हैं।

4. रासायनिक प्रकृति से ये प्रोटीन, पॉलीपेप्टाइड, एमीनो अम्ल व्युत्पन्न या स्टेराइड प्रकार के होते हैं।

5. ये शरीर में संचित नहीं होते हैं तथा कार्य संपादन के पश्चात यकृत या वृक्क द्वारा नष्ट कर दिए जाते हैं।

प्रश्न 2.

आनुवंशिक तौर पर बौने पौधे को लम्बा करने वाले हार्मोन का नाम तथा प्रभाव लिखिए।

उत्तर:

हार्मोन का नाम:

जिबरेलिन (Gibberellin), मुख्य रूप से जिबरेलिक अम्ल (GA₃)।

जिबरेलिन हार्मोन के प्रमुख प्रभाव:

1. पर्व-दीर्घीकरण: यह बौने पौधों की पर्व संधियों (Internodes) के बीच की कोशिकाओं के विभाजन एवं दीर्घीकरण को प्रेरित करके उन्हें आनुवंशिक रूप से लम्बा बना देता है।

2. वोल्टिंग प्रभाव: यह रोसेट पौधों में पुष्प निकलने से पूर्व तने की लम्बाई में तीव्र वृद्धि उत्पन्न करता है।

3. बीज अंकुरण: यह बीजों की सुप्तावस्था को समाप्त करके अंकुरण की प्रक्रिया को बढ़ाता है।

4. अनिषेकफलन: यह बिना निषेचन के बीजरहित फल बनने की प्रक्रिया को प्रेरित करता है।

प्रश्न 3.

श्वसन की परिभाषा एवं प्रकार बताइए।

उत्तर:

श्वसन की परिभाषा:

श्वसन वह जैविक-रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें जीवधारी कोशिकाओं के अंदर जटिल कार्बनिक पदार्थों (जैसे ग्लूकोज) का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा (ATP) मुक्त करते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) एवं जल उत्पन्न करते हैं।

श्वसन के प्रकार:

श्वसन मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है:

1. वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration):

यह श्वसन ऑक्सीजन (O₂) की उपस्थिति में होता है। इसमें ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होकर कार्बन डाइऑक्साइड, जल तथा अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा (38 ATP) उत्पन्न होती है।

समीकरण: C₆H₁₂O₆ + 6O₂ -> 6CO₂ + 6H₂O + ऊर्जा (38 ATP)

2. अवायवीय श्वसन (Anaerobic Respiration):

यह श्वसन ऑक्सीजन (O₂) की अनुपस्थिति में होता है। इसमें ग्लूकोज का अपूर्ण ऑक्सीकरण होता है, जिससे एथिल एल्कोहल या लैक्टिक अम्ल तथा कम मात्रा में ऊर्जा (2 ATP) बनती है।

समीकरण: C₆H₁₂O₆ -> 2C₂H₅OH + 2CO₂ + ऊर्जा (2 ATP)

प्रश्न 4.

पतझड़ के मौसम में पत्तियाँ क्यों टूट जाती हैं? कारण बताइए।

उत्तर:

पतझड़ के मौसम में पत्तियों के पौधे से अलग होकर गिरने का मुख्य कारण पर्णवृंत (Petiole) के आधार पर 'विलगन परत' (Abscission layer) का निर्माण होना है।

मुख्य कारण एवं प्रक्रिया:

1. विलगन परत का बनना: पतझड़ के समय पर्णवृंत के आधार की मृदुतकीय कोशिकाएं रूपांतरित होकर एक पतली विलगन परत का निर्माण करती हैं।

2. हार्मोनल असंतुलन: इस मौसम में पत्तियों में ऑक्सिन (Auxin) का स्तर घट जाता है जबकि वृद्धि-रोधक हार्मोन एब्सीसिक अम्ल (ABA) एवं एथिलीन की सांद्रता बढ़ जाती है।

3. जल एवं पोषक तत्वों की रुकावट: विलगन परत बनने से तने से पत्ती को मिलने वाले जल तथा पोषक तत्वों का संवहन रुक जाता है।

4. मध्य पटलिका का घुलना: पेक्टिनेज और सैलुलेज एंजाइमों के प्रभाव से विलगन परत की कोशिकाओं की मध्य पटलिका घुल जाती है, जिससे पत्ती केवल संवहन ऊतकों के सहारे कमजोर होकर लटकती है और हवा या गुरुत्वाकर्षण से टूटकर गिर जाती है।

प्रश्न 1.

TCA Cycle बनाइए enzyme सहित।

उत्तर:

टी.सी.ए. चक्र (ट्राईकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र या क्रेब्स चक्र) माइटोकॉन्ड्रिया की मैट्रिक्स में सम्पन्न होने वाली एक चक्रीय प्रतिक्रिया है।

1. चक्रीय पथ के विभिन्न चरण एवं एंजाइम:

प्रारंभिक चरण: एसिटिल-कोएन्जाइम A (2-कार्बन) तथा ऑक्जेलोएसिटिक अम्ल (4-कार्बन) जल की उपस्थिति में साइट्रिक अम्ल (6-कार्बन) बनाते हैं। एंजाइम: साइट्रेट सिन्थेटेज।

द्वितीय चरण: साइट्रिक अम्ल आइसोसाइट्रिक अम्ल (6-कार्बन) में परिवर्तित होता है। एंजाइम: एकोनिटेज।

तृतीय चरण: आइसोसाइट्रिक अम्ल से एक CO₂ अणु तथा NADH निकलता है और अल्फा-कीटोग्लूटैरिक अम्ल (5-कार्बन) बनता है। एंजाइम: आइसोसाइट्रेट डिहाइड्रोजनेज।

चतुर्थ चरण: अल्फा-कीटोग्लूटैरिक अम्ल से CO₂ तथा NADH निकलकर सक्सिनिल-कोएन्जाइम A (4-कार्बन) बनता है। एंजाइम: अल्फा-कीटोग्लूटारेट डिहाइड्रोजनेज।

पंचम चरण: सक्सिनिल-कोएन्जाइम A से GTP (ATP) का निर्माण होता है तथा सक्सिनिक अम्ल (4-कार्बन) बनता है। एंजाइम: सक्सिनिल-CoA सिन्थेटेज।

षष्ठम चरण: सक्सिनिक अम्ल से FADH₂ का निर्माण होकर फ्यूमैरिक अम्ल (4-कार्बन) बनता है। एंजाइम: सक्सिनिक डिहाइड्रोजनेज।

सप्तम चरण: फ्यूमैरिक अम्ल में जल का योग होने से मैलिक अम्ल (4-कार्बन) बनता है। एंजाइम: फ्यूमारेज।

अष्टम चरण: मैलिक अम्ल से NADH का निर्माण होता है और ऑक्जेलोएसिटिक अम्ल (4-कार्बन) पुनः प्राप्त हो जाता है। एंजाइम: मैलेट डिहाइड्रोजनेज।

2. आरेख/चित्र का विवरण:

रूपरेखा: यह चक्र गोल आकृति में प्रदर्शित किया जाता है।

शीर्ष पर: एसिटिल-CoA और ऑक्जेलोएसिटिक अम्ल का संयोजन होकर साइट्रिक अम्ल बनता है।

दाएँ भाग में: साइट्रिक अम्ल से आइसोसाइट्रिक अम्ल और उससे अल्फा-कीटोग्लूटैरिक अम्ल बनता है, जहाँ CO₂ और NADH मुक्त होते हैं।

नीचे के भाग में: सक्सिनिल-CoA से सक्सिनिक अम्ल का निर्माण होता है, जहाँ GTP (ATP) बनता है।

बाएँ भाग में: सक्सिनिक अम्ल से फ्यूमैरिक अम्ल (FADH₂ निर्माण), फ्यूमैरिक अम्ल से मैलिक अम्ल, तथा मैलिक अम्ल से पुनः ऑक्जेलोएसिटिक अम्ल (NADH निर्माण) बनता है।

केन्द्र में: चक्र के प्रत्येक पद से संबंधित एंजाइम दर्शाए जाते हैं।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

प्रश्न 2.

मानव हृदय की आंतरिक संरचना एवं कार्य बनाइए।

उत्तर:

1. मानव हृदय की आंतरिक संरचना:

कोष्ठक: मानव हृदय चार कोष्ठकों में विभाजित होता है। ऊपरी दो पतली भित्ति वाले कोष्ठक दायाँ आलिंद तथा बायाँ आलिंद कहलाते हैं। निचले दो मोटी पेशीय भित्ति वाले कोष्ठक दायाँ निलय तथा बायाँ निलय कहलाते हैं।

पट (Septum): दोनों आलिंदों के बीच अंतरा-आलिंद पट तथा दोनों निलयों के बीच अंतरा-निलय पट पाया जाता है, जो अशुद्ध तथा शुद्ध रक्त को आपस में मिलने से रोकता है।

कपाट (Valves):

दाएँ आलिंद एवं दाएँ निलय के बीच त्रिवलनी कपाट (Tricuspid Valve) होता है।

बाएँ आलिंद एवं बाएँ निलय के बीच द्विवलनी या मिट्रल कपाट (Bicuspid Valve) होता है।

फुफ्फुसीय धमनी तथा महाधमनी के उद्गम स्थल पर अर्धचंद्राकार कपाट (Semilunar Valves) पाए जाते हैं।

मुख्य रक्त वाहिकाएँ: अग्र व पश्च महाशिरा दाएँ आलिंद में खुलती हैं। फुफ्फुसीय सिरा बाएँ आलिंद में खुलती है। फुफ्फुसीय धमनी दाएँ निलय से और महाधमनी बाएँ निलय से निकलती है।

2. चित्र का विवरण:

रूपरेखा: हृदय का आकार शंक्वाकार तथा मुट्ठी के समान होता है।

ऊपरी बाएँ एवं दाएँ भाग: चित्र में ऊपर बाएँ दायाँ आलिंद और ऊपर दाएँ बायाँ आलिंद स्थित होता है।

निचले बाएँ एवं दाएँ भाग: नीचे बाएँ दायाँ निलय और नीचे दाएँ बायाँ निलय स्थित होता है।

मध्य भाग: अंतरा-निलय पट दोनों निलयों को मध्य से पृथक करता है।

ऊपरी नलिकाएँ: दाएँ आलिंद से जुड़ी महाशिराएँ, दाएँ निलय से फुफ्फुसीय धमनी, बाएँ आलिंद से फुफ्फुसीय सिरा, तथा बाएँ निलय से निकलती महाधमनी ऊपर की ओर दर्शायी जाती हैं।

3. हृदय के कार्य:

हृदय शरीर में रक्त परिसंचरण के लिए एक पंप की भांति कार्य करता है।

दायाँ आलिंद संपूर्ण शरीर से विऑक्सीजनित (अशुद्ध) रक्त प्राप्त करता है और इसे दाएँ निलय में भेजता है।

दायाँ निलय इस अशुद्ध रक्त को फुफ्फुसीय धमनी द्वारा फेफड़ों में शुद्धिकरण हेतु भेजता है।

बायाँ आलिंद फेफड़ों से ऑक्सीजनित (शुद्ध) रक्त फुफ्फुसीय सिरा द्वारा प्राप्त करता है और इसे बाएँ निलय में भेजता है।

बायाँ निलय संकुचित होकर शुद्ध रक्त को महाधमनी के माध्यम से संपूर्ण शरीर में वितरित करता है।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

प्रश्न 3.

दोहरा परिसंचरण की व्याख्या कीजिए।

उत्तर:

दोहरा परिसंचरण (Double Circulation):

मानव तथा अन्य उच्च कशेरुकियों में रक्त एक पूर्ण चक्र पूरा करने के लिए हृदय से दो बार होकर गुजरता है। इस प्रकार के परिसंचरण को दोहरा परिसंचरण कहते हैं।

दोहरा परिसंचरण दो मुख्य परिपथों में पूरा होता है:

1. फुफ्फुसीय परिसंचरण (Pulmonary Circulation):

इसमें विऑक्सीजनित (अशुद्ध) रक्त दाएँ निलय से फुफ्फुसीय धमनी द्वारा फेफड़ों में पहुँचता है।

फेफड़ों में कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकल जाती है और ऑक्सीजन रक्त में घुल जाती है।

ऑक्सीजनित (शुद्ध) रक्त फुफ्फुसीय सिराओं द्वारा बाएँ आलिंद में पहुँचता है।

पथ: दायाँ निलय -> फुफ्फुसीय धमनी -> फेफड़े -> फुफ्फुसीय सिरा -> बायाँ आलिंद।

2. दैहिक परिसंचरण (Systemic Circulation):

इसमें ऑक्सीजनित (शुद्ध) रक्त बाएँ निलय से महाधमनी द्वारा शरीर के सभी अंगों एवं ऊतकों तक पहुँचाया जाता है।

ऊतकों में ऑक्सीजन का उपयोग होता है और कार्बन डाइऑक्साइड रक्त में मिल जाती है।

यह अशुद्ध रक्त अग्र तथा पश्च महाशिराओं द्वारा पुनः दाएँ आलिंद में एकत्र होता है।

पथ: बायाँ निलय -> महाधमनी -> शरीर के अंग -> महाशिराएँ -> दायाँ आलिंद।

दोहरा परिसंचरण का महत्व:

ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रक्त एक-दूसरे से पूर्णतः पृथक रहते हैं।

शरीर को उच्च दक्षता के साथ ऑक्सीजन प्राप्त होती है, जिससे उच्च उपापचय दर तथा स्थिर शरीर का ताप (समतापी अवस्था) बना रहता है।

प्रश्न 4.

Glycolysis का केवल चित्र निरूपित कीजिए।

उत्तर:

1. ग्लाइकोलाइसिस आरेखीय निरूपण एवं चरण:

ग्लूकोज (6C) कोशिकाद्रव्य में ATP के उपयोग से ग्लूकोज-6-फॉस्फेट (6C) में बदलता है। (एंजाइम: हेक्सोकाइनेज)

ग्लूकोज-6-फॉस्फेट रूपांतरित होकर फ्रक्टोज-6-फॉस्फेट (6C) बनाता है। (एंजाइम: फॉस्फोग्लूको-आइसोमरेज)

फ्रक्टोज-6-फॉस्फेट एक और ATP का उपयोग करके फ्रक्टोज-1,6-बिसफॉस्फेट (6C) बनाता है। (एंजाइम: फॉस्फोफ्रक्टोकाइनेज)

फ्रक्टोज-1,6-बिसफॉस्फेट टूटकर दो 3-कार्बन वाले अणुओं में बंटता है: 3-फॉस्फोग्लिसरैल्डिहाइड (PGAL) तथा डाइहाइड्रॉक्सीऐसीटोन फॉस्फेट (DHAP)। (एंजाइम: एल्डोलेज)

PGAL से NAD+ के अपचयन द्वारा NADH बनता है और 1,3-बिसफॉस्फोग्लिसरिक अम्ल बनता है। (एंजाइम: PGAL डिहाइड्रोजनेज)

1,3-बिसफॉस्फोग्लिसरिक अम्ल से ATP का निर्माण होता है और 3-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल बनता है। (एंजाइम: फॉस्फोग्लिसरोकाइनेज)

3-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल 2-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल में बदलता है। (एंजाइम: फॉस्फोग्लिसरोम्यूटेज)

2-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल से जल का अणु निकलकर फॉस्फोइनोल पाइरुवेट (PEP) बनता है। (एंजाइम: इनोलेज)

अंतिम पद में PEP से ATP का निर्माण होता है और पाइरुविक अम्ल (3C) के 2 अणु बनते हैं। (एंजाइम: पाइरुवेट काइनेज)

2. चित्र का विवरण:

रूपरेखा: ग्लाइकोलाइसिस एक सीधी, ऊपर से नीचे की ओर जाने वाली 10 पदों की श्रृंखला है।

शीर्ष (प्रारंभ): ग्लूकोज (6-कार्बन) ऊपर लिखा जाता है।

मध्य भाग: शर्करा का फॉस्फोरिलीकरण तथा 3-कार्बन युक्त दो अणुओं (PGAL व DHAP) में विभाजन दिखाया जाता है। ATP और NADH का बनना एवं उपयोग पार्श्व में दर्शाया जाता है।

तल (नीचे): अंत में पाइरुविक अम्ल (3-कार्बन) के दो अणु और ATP निर्माण को सबसे नीचे प्रदर्शित किया जाता है।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

प्रश्न 5.

फाइटोहॉर्मोन किसे कहते हैं? ऑक्सिन, जिबरेलिन व साइटोकाइनिन किन्हीं दो हॉर्मोन के कार्य बताइए।

उत्तर:

1. फाइटोहॉर्मोन (पादप हॉर्मोन) की परिभाषा:

पौधों में प्राकृतिक रूप से अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में संश्लेषित होने वाले जटिल कार्बनिक पदार्थ जो पौधों की वृद्धि, विकास, कोशिका विभाजन एवं अन्य जैविक क्रियाओं का नियंत्रण तथा नियमन करते हैं, फाइटोहॉर्मोन कहलाते हैं।

2. किन्हीं दो फाइटोहॉर्मोन के मुख्य कार्य:

(i) ऑक्सिन (Auxin) के कार्य:

शीर्ष प्रभाविता: ऑक्सिन शीर्ष कलिका की वृद्धि को बढ़ावा देता है और पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि को संदमित (रोकता) करता है।

कोशिका दीर्घीकरण: यह तने तथा जड़ों की कोशिकाओं की लंबाई बढ़ाने में सहायक होता है।

अनिषेकफलन: बिना निषेचन के बीजरहित फलों के निर्माण में मदद करता है।

(ii) जिबरेलिन (Gibberellin) के कार्य:

आनुवंशिक रूप से बौने पौधों को लंबा करना: यह पौधों के पर्वों (Internodes) की लंबाई बढ़ाकर बौने पौधों को लंबा बना देता है।

बीज अंकुरण: यह सुप्त बीजों में अल्फा-एमाइलेज एंजाइम को सक्रिय करके बीज सुप्तावस्था को समाप्त करता है और अंकुरण को प्रेरित करता है।

फलों का आकार बढ़ाना: यह सेब, अंगूर आदि फलों के आकार को बढ़ाने में उपयोगी है।