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UP Board Class 10th Science Board Paper 2026 824(GO)

कक्षा 10वीं · विज्ञान · 2026 · बोर्ड परीक्षा

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प्रश्न 1.

(i) अवतल दर्पण से किसी वस्तु का आभासी प्रतिबिम्ब बनने का किरण आरेख बनाइए।

(ii) 20 सेमी फोकस दूरी वाले उत्तल लेंस से 30 सेमी की दूरी पर वस्तु स्थित है। वस्तु के प्रतिबिम्ब की स्थिति ज्ञात कीजिए।

उत्तर:

(i) अवतल दर्पण द्वारा आभासी प्रतिबिम्ब का किरण आरेख:

जब वस्तु को अवतल दर्पण के ध्रुव (P) तथा मुख्य फोकस (F) के बीच रखा जाता है, तो वस्तु का आभासी, सीधा तथा बड़ा प्रतिबिम्ब दर्पण के पीछे बनता है।

चित्र का विवरण:

1. अवतल दर्पण: दाईं ओर धँसा हुआ परावर्तक पृष्ठ तथा बाईं ओर पॉलिशदार भाग।

2. मुख्य अक्ष: दर्पण के ध्रुव (P), फोकस (F) तथा वक्रता केंद्र (C) से गुजरने वाली सीधी रेखा।

3. वस्तु (AB): ध्रुव (P) और फोकस (F) के मध्य मुख्य अक्ष पर लंबवत स्थित एक तीर।

4. प्रथम किरण: वस्तु के शीर्ष (A) से मुख्य अक्ष के समानांतर चलती हुई दर्पण से परावर्तन के पश्चात मुख्य फोकस (F) से होकर गुजरती है।

5. द्वितीय किरण: वस्तु के शीर्ष (A) से वक्रता केंद्र (C) की दिशा में जाकर दर्पण पर टकराती है और उसी मार्ग पर वापस लौटती है।

6. प्रतिबिम्ब (A'B'): दोनों परावर्तित किरणों को दर्पण के पीछे की ओर बढ़ाने पर वे बिंदु (A') पर मिलती हुई प्रतीत होती हैं, जहाँ आभासी तथा सीधा प्रतिबिम्ब A'B' बनता है।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

(ii) संख्यात्मक हल:

दिया है:

उत्तल लेंस की फोकस दूरी (f) = +20 सेमी

वस्तु की दूरी (u) = -30 सेमी

ज्ञात सूत्र:

1/f = 1/v - 1/u

हल:

1/20 = 1/v - 1/(-30)

1/20 = 1/v + 1/30

1/v = 1/20 - 1/30

1/v = (3 - 2) / 60

1/v = 1/60

v = +60 सेमी

अतः उत्तर:

प्रतिबिम्ब लेंस के दूसरी ओर (बाईं से दाईं ओर) 60 सेमी की दूरी पर वास्तविक तथा उल्टा बनेगा।

प्रश्न 2.

विलंबित सूर्यास्त क्या है ? इसका सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर:

वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण सूर्यास्त होने (सूर्य के वास्तविक रूप से क्षितिज से नीचे चले जाने) के बाद भी सूर्य लगभग 2 मिनट तक दिखाई देता रहता है, इसे ही विलंबित सूर्यास्त कहते हैं।

प्रक्रिया तथा विवरण:

1. जब सूर्य क्षितिज से थोड़ा नीचे चला जाता है, तब उससे आने वाला प्रकाश वायुमंडल में प्रवेश करता है।

2. पृथ्वी का वायुमंडल ऊपर विरल तथा नीचे (सतह के पास) अधिक सघन होता है।

3. प्रकाश की किरणें लगातार विरल से सघन माध्यम में जाने के कारण अभिलंब की ओर झुकती जाती हैं।

4. इस निरन्तर अपवर्तन के कारण किरणें मुड़कर प्रेक्षक की आँख तक पहुँचती हैं।

5. प्रेक्षक को प्रकाश किरणें सीधी रेखा में आती हुई प्रतीत होती हैं, जिससे सूर्य अपनी वास्तविक स्थिति से थोड़ा ऊपर (क्षितिज से ऊपर) दिखाई देता है।

6. इसी अपवर्तन के कारण सूर्यास्त के बाद भी सूर्य लगभग 2 मिनट तक दिखाई देता रहता है। इसी प्रकार सूर्योदय भी 2 मिनट पूर्व ही दिखाई देने लगता है।

चित्र का विवरण:

1. पृथ्वी तथा वायुमंडल: केंद्र में पृथ्वी की सतह और उसके चारों ओर वायुमंडल की विभिन्न परतें।

2. क्षितिज रेखा: प्रेक्षक की आँख के समांतर खींची गई सीधी क्षैतिज रेखा।

3. वास्तविक सूर्य: क्षितिज रेखा के नीचे स्थित सूर्य।

4. अपवर्तित किरण का मार्ग: सूर्य से निकलकर वायुमंडल में मुड़ती हुई प्रेक्षक की आँख तक पहुँचती किरण।

5. आभासी सूर्य: अपवर्तित किरण को पीछे बढ़ाने पर क्षितिज रेखा से ऊपर दिखाई देने वाला सूर्य।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

प्रश्न 3.

धारावाही परिनालिका के चारों ओर उत्पन्न चुम्बकीय बल रेखाओं का चित्र बनाइए। धारा की दिशा बदलने पर क्या परिवर्तन होगा ?

उत्तर:

धारावाही परिनालिका:

बेलन के आकार में पास-पास लपेटे गए विद्युतरोधी तांबे के तार के अनेक फेरों वाली कुंडली को परिनालिका कहते हैं। जब इसमें विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो यह एक छड़ चुम्बक की भाँति व्यवहार करती है।

चित्र का विवरण:

1. परिनालिका: एक क्षैतिज बेलनाकार नली जिस पर तांबे के तार के फेरे लिपटे हुए हैं।

2. विद्युत स्रोत: परिनालिका के दोनों सिरे बैटरी, कुंजी और धारा नियंत्रक से जुड़े हैं।

3. चुम्बकीय ध्रुव: जिस सिरे पर धारा की दिशा वामावर्त (Counter-clockwise) होती है वह उत्तरी ध्रुव (N) तथा जहाँ दक्षिणावर्त (Clockwise) होती है वह दक्षिणी ध्रुव (S) बनता है।

4. बाह्य चुम्बकीय बल रेखाएँ: परिनालिका के बाहर चुम्बकीय बल रेखाएँ उत्तरी ध्रुव (N) से निकलकर दक्षिणी ध्रुव (S) में प्रवेश करती हैं और बंद वक्र बनाती हैं।

5. आंतरिक चुम्बकीय बल रेखाएँ: परिनालिका के भीतर चुम्बकीय बल रेखाएँ दक्षिणी ध्रुव (S) से उत्तरी ध्रुव (N) की ओर परस्पर समानांतर तथा समदूरस्थ होती हैं, जो एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र प्रदर्शित करती हैं।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

धारा की दिशा बदलने पर परिवर्तन:

यदि परिनालिका में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा बदल दी जाए (उलट दी जाए), तो उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा भी उलट जाएगी। परिनालिका के चुम्बकीय ध्रुव आपस में बदल जाएँगे (उत्तरी ध्रुव दक्षिणी ध्रुव बन जाएगा तथा दक्षिणी ध्रुव उत्तरी ध्रुव बन जाएगा) और परिनालिका के चारों ओर चुम्बकीय बल रेखाओं की दिशा विपरीत हो जाएगी।

प्रश्न 4.

(i) चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित विद्युत धारावाही चालक पर लगने वाले बल की दिशा जानने के लिये उपयुक्त फ्लेमिंग के बायें हाथ के नियम की स्पष्ट व्याख्या कीजिए।

(ii) विद्युत शक्ति का अर्थ क्या है ? इसका उपयुक्त सूत्र V तथा R के पदों में लिखिए।

अथवा

घरेलू विद्युत परिपथ का संक्षिप्त वर्णन उपयुक्त चित्र सहित कीजिए।

उत्तर:

(i) फ्लेमिंग के बायें हाथ का नियम:

यदि हम अपने बायें हाथ की तर्जनी (index finger), मध्यमा (middle finger) तथा अंगूठे को इस प्रकार फैलाएँ कि ये तीनों एक-दूसरे के परस्पर लंबवत रहें, तो:

- तर्जनी उंगली: चुम्बकीय क्षेत्र (B) की दिशा को दर्शाती है।

- मध्यमा उंगली: चालक में प्रवाहित विद्युत धारा (I) की दिशा को दर्शाती है।

- अंगूठा: चालक पर लगने वाले बल (F) की दिशा या चालक की गति की दिशा को व्यक्त करता है।

यह नियम चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित धारावाही चालक पर लगने वाले बल की दिशा ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

(ii) विद्युत शक्ति:

किसी विद्युत परिपथ में विद्युत ऊर्जा के व्यय (उपभोग) होने की दर को विद्युत शक्ति कहते हैं।

इसे P से प्रदर्शित करते हैं।

विद्युत शक्ति (P) = कार्य (W) / समय (t)

इसका SI मात्रक वाट (Watt) है।

विभवांतर (V) तथा प्रतिरोध (R) के पदों में सूत्र:

P = V² / R

अथवा

घरेलू विद्युत परिपथ का संक्षिप्त वर्णन:

हमारे घरों में विद्युत आपूर्ति मुख्य तारों (मेंस) द्वारा की जाती है। घरेलू विद्युत परिपथ में मुख्यतः तीन प्रकार के तार उपयोग किए जाते हैं:

1. विद्युन्मय तार (Live Wire): यह लाल रंग के प्लास्टिक रोधन वाला तार होता है, जो 220 V के धनात्मक विभव पर होता है।

2. उदासीन तार (Neutral Wire): यह काले रंग के रोधन वाला तार होता है, जो शून्य विभव पर होता है। विद्युन्मय और उदासीन तार के बीच 220 V का विभवांतर होता है।

3. भू-संपर्क तार (Earth Wire): यह हरे रंग के रोधन वाला तार होता है, जिसे घर के पास गहराई में धातु की प्लेट से जोड़ा जाता है। यह उपकरण के धात्विक निकाय से जुड़ा होता है और धारा क्षरण के समय विद्युत आघात (झटके) से सुरक्षा प्रदान करता है।

परिपथ का संयोजन:

- खंभे से आने वाले तार विद्युत कम्पनी के मुख्य फ्यूज से होते हुए विद्युत मीटर से जुड़ते हैं।

- इसके बाद मुख्य स्विच द्वारा धारा को घरेलू परिपथ में भेजा जाता है।

- घर के सभी उपकरण (बल्ब, पंखा, सॉकेट आदि) मुख्य परिपथ में समानांतर क्रम में जोड़े जाते हैं, ताकि सभी को समान विभवांतर (220 V) प्राप्त हो और एक उपकरण बंद होने पर अन्य उपकरण प्रभावित न हों।

- प्रत्येक उपकरण के श्रेणीक्रम में एक स्विच तथा सुरक्षा के लिए फ्यूज या MCB लगाया जाता है।

चित्र का विवरण:

1. मुख्य आपूर्ति तार: विद्युन्मय तार (लाल) और उदासीन तार (काला) खंभे से प्रवेश करते हुए।

2. पोल फ्यूज तथा विद्युत मीटर: तार मुख्य फ्यूज से होकर विद्युत मीटर में जाते हैं।

3. मुख्य स्विच: विद्युत मीटर के बाद मुख्य स्विच और वितरण बॉक्स।

4. समानांतर शाखाएँ: वितरण बॉक्स से अलग-अलग कमरों के लिए निकली समानांतर शाखाएँ।

5. उपकरण व सॉकेट: प्रत्येक शाखा में उपकरण और सॉकेट समानांतर क्रम में जुड़े हुए।

6. भू-संपर्क तार: हरे रंग का सुरक्षा तार जो उपकरणों के धात्विक शरीर से होकर भूमिगत तांबे की प्लेट से जुड़ा है।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

प्रश्न 5.

(i) विकृतगंधिता क्या है ? इसे कैसे रोका जा सकता है ?

(ii) निम्नलिखित यौगिकों के संरचना सूत्र लिखिए :

(a) ब्यूटेनोइक अम्ल

(b) पेन्टेन

उत्तर:

(i) विकृतगंधिता:

वसायुक्त अथवा तेलयुक्त खाद्य पदार्थ जब लंबे समय तक वायु (ऑक्सीजन) के संपर्क में रहते हैं, तो उपचयित (oxidised) हो जाते हैं। उपचयन के कारण उनके स्वाद तथा गंध में परिवर्तन आ जाता है और वे खराब हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को विकृतगंधिता कहते हैं।

रोकने के उपाय:

1. प्रति-ऑक्सीकारक (Antioxidants) का प्रयोग: वसायुक्त खाद्य पदार्थों में BHA या BHT जैसे प्रति-ऑक्सीकारक मिलाकर उपचयन रोका जाता है।

2. नाइट्रोजन गैस का उपयोग: चिप्स आदि की थैलियों से ऑक्सीजन निकालकर निष्क्रिय नाइट्रोजन गैस भरी जाती है।

3. वायुरुद्ध बर्तनों में भंडारण: भोजन को एयरटाइट डिब्बों में रखने से उपचयन की दर धीमी हो जाती है।

4. प्रशीतन (Refrigeration): खाद्य पदार्थों को कम ताप पर फ्रिज में रखकर विकृतगंधिता से बचाया जा सकता है।

(ii) संरचना सूत्र:

(a) ब्यूटेनोइक अम्ल (C₃H₇COOH):

H H H O

//

H - C - C - C - C - O - H

H H H

संगठित संरचना सूत्र: CH₃-CH₂-CH₂-COOH

(b) पेन्टेन (C₅H₁₂):

H H H H H

H - C - C - C - C - C - H

H H H H H

संगठित संरचना सूत्र: CH₃-CH₂-CH₂-CH₂-CH₃

प्रश्न 6.

(i) अवक्षेपण अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।

(ii) निस्तापन और भर्जन को उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर:

(i) अवक्षेपण अभिक्रिया:

वह रासायनिक अभिक्रिया जिसमें दो विलयनों के आपस में अभिक्रिया करने पर एक जल में अघुलनशील (अविलेय) ठोस पदार्थ प्राप्त होता है, उसे अवक्षेपण अभिक्रिया कहते हैं। प्राप्त होने वाले अविलेय ठोस पदार्थ को 'अवक्षेप' कहते हैं।

उदाहरण:

सोडियम सल्फेट (Na₂SO₄) के जलीय विलयन में बेरियम क्लोराइड (BaCl₂) का जलीय विलयन मिलाने पर बेरियम सल्फेट (BaSO₄) का सफेद अवक्षेप प्राप्त होता है।

रासायनिक समीकरण:

Na₂SO₄(aq) + BaCl₂(aq) -> BaSO₄(s) + 2NaCl(aq)

(ii) निस्तापन और भर्जन:

1. निस्तापन:

कार्बोनेट अयस्क को वायु की सीमित मात्रा या अनुपस्थिति में उसके गलनांक से कम ताप पर उच्च ताप तक गर्म करके ऑक्साइड में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को निस्तापन कहते हैं। इस प्रक्रिया में नमी, जल तथा कार्बन डाइऑक्साइड जैसी वाष्पशील अशुद्धियाँ बाहर निकल जाती हैं।

उदाहरण:

जिंक कार्बोनेट (ZnCO₃) को वायु की अनुपस्थिति में गर्म करने पर जिंक ऑक्साइड (ZnO) तथा कार्बन डाइऑक्साइड गैस प्राप्त होती है।

रासायनिक समीकरण:

ZnCO₃(s) -> ZnO(s) + CO₂(g)

2. भर्जन:

सल्फाइड अयस्क को वायु की पर्याप्त/अधिकता की उपस्थिति में उसके गलनांक से कम ताप पर तीव्रता से गर्म करके ऑक्साइड में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को भर्जन कहते हैं। इस प्रक्रिया में सल्फर तथा आर्सेनिक जैसी अशुद्धियाँ गैसों के रूप में बाहर निकल जाती हैं।

उदाहरण:

जिंक सल्फाइड (ZnS) को वायु (O₂) की उपस्थिति में गर्म करने पर जिंक ऑक्साइड (ZnO) तथा सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) गैस बनती है।

रासायनिक समीकरण:

2ZnS(s) + 3O₂(g) -> 2ZnO(s) + 2SO₂(g)

प्रश्न 7.

किसी विद्युत धारावाही चालक के चारों ओर उत्पन्न होने वाले चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने के लिए किस नियम का सहयोग लेना होगा ?

(A) ओम का नियम

(B) दाहिने हाथ के अंगूठे का नियम

(C) फ्लेमिंग के बायें हाथ का नियम

(D) फ्लेमिंग के दाहिने हाथ का नियम

उत्तर:

(B) दाहिने हाथ के अंगूठे का नियम

व्याख्या: किसी धारावाही चालक में प्रवाहित विद्युत धारा के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा दाहिने हाथ के अंगूठे के नियम द्वारा ज्ञात की जाती है।

प्रश्न 8.

एथेनाल में उपस्थित क्रियात्मक समूह है

(A) −CHO

(B) −OH

(C) −COOH

(D) −CO−

उत्तर:

(B) −OH

व्याख्या: एथेनाल (C2H5OH) में ऐल्कोहॉली क्रियात्मक समूह (-OH) उपस्थित होता है।

प्रश्न 9.

जब असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों का Ni/Pd उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजनीकरण किया जाता है, तो इस प्रक्रिया को क्या कहते हैं?

(A) प्रतिस्थापन

(B) हाइड्रोजनीकरण

(C) ऑक्सीकरण

(D) सैपोनिफिकेशन

उत्तर:

(B) हाइड्रोजनीकरण

व्याख्या: असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों में हाइड्रोजन का जुड़कर संतृप्त हाइड्रोकार्बन में बदलना हाइड्रोजनीकरण कहलाता है।

प्रश्न 10.

कार्बन का कौन-सा एलोट्रोप फुटबॉल जैसी संरचना रखता है ?

(A) हीरा

(B) ग्रेफाइट

(C) बकमिनस्टरफुलरीन (C-60)

(D) कोयला

उत्तर:

(C) बकमिनस्टरफुलरीन (C-60)

व्याख्या: बकमिनस्टरफुलरीन (C-60) में कार्बन के 60 परमाणु परस्पर जुड़कर एक फुटबॉल (बकीबॉल) जैसी संरचना बनाते हैं।

प्रश्न 11.

लोह और भाप की अभिक्रिया का संतुलित समीकरण कौन-सा है ?

(A) Fe(s) + H2O(v) -> FeO(s) + H2(g)

(B) 2Fe(s) + 2H2O(v) -> 2FeO(s) + 2H2(g)

(C) 3Fe(s) + 4H2O(v) -> Fe3O4(s) + 4H2(g)

(D) Fe(s) + 2H2O(v) -> FeO2(s) + 2H2(g)

उत्तर:

(C) 3Fe(s) + 4H2O(v) -> Fe3O4(s) + 4H2(g)

व्याख्या: लाल तप्त लोहे पर भाप प्रवाहित करने पर आयरन(II,III) ऑक्साइड (Fe3O4) तथा हाइड्रोजन गैस का निर्माण होता है।

प्रश्न 12.

जब प्लास्टर ऑफ पेरिस (CaSO4 · 1/2 H2O) को जल के साथ मिलाया जाता है, तो यह पुनः जिप्सम बन जाता है। यह किस प्रकार का परिवर्तन है ?

(A) ऊष्माक्षेपी रासायनिक अभिक्रिया

(B) ऊष्माक्षेपी भौतिक परिवर्तन

(C) उत्क्रमणीय ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया

(D) अनुत्क्रमणीय ऊष्माशोषी अभिक्रिया

उत्तर:

(A) ऊष्माक्षेपी रासायनिक अभिक्रिया

व्याख्या: प्लास्टर ऑफ पेरिस जल से क्रिया करके जिप्सम का कठोर ठोस द्रव्यमान बनाता है, जो एक ऊष्माक्षेपी रासायनिक परिवर्तन है जिसमें ऊष्मा उत्सर्जित होती है।

प्रश्न 7.

क्या होता है जब —

(i) एथेनाल का क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट में ऑक्सीकरण किया जाता है ?

(ii) एथेनोइक अम्ल की अभिक्रिया सोडियम हाइड्रॉक्साइड से कराई जाती है ?

(iii) एथेनोइक अम्ल की अभिक्रिया एथेनाल से सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में कराई जाती है ?

(iv) असंतृप्त हाइड्रोकार्बन का हाइड्रोजनीकरण Ni उत्प्रेरक की उपस्थिति में किया जाता है ?

(v) साबुन को कठोर जल में डाला जाता है ?

(vi) सोडियम कार्बोनेट की अभिक्रिया एथेनोइक अम्ल से कराई जाती है ?

उत्तर:

(i) जब एथेनाल (C2H5OH) को क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO4) के साथ गर्म किया जाता है, तो वह ऑक्सीकृत होकर एथेनोइक अम्ल (CH3COOH) बनाता है।

समीकरण: C2H5OH + 2[O] (क्षारीय KMnO4 / ऊष्मा) -> CH3COOH + H2O

(ii) जब एथेनोइक अम्ल (CH3COOH) की अभिक्रिया सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) से होती है, तो सोडियम एथेनोएट (सोडियम एसिटेट) और जल बनता है।

समीकरण: CH3COOH + NaOH -> CH3COONa + H2O

(iii) जब एथेनोइक अम्ल (CH3COOH) की अभिक्रिया सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में एथेनाल (C2H5OH) से कराई जाती है, तो मीठी गंध वाला एस्टर (एथिल एथेनोएट) बनता है। इस प्रक्रिया को एस्टरीकरण कहते हैं।

समीकरण: CH3COOH + C2H5OH (सांद्र H2SO4) -> CH3COOCH2CH3 + H2O

(iv) जब असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (जैसे एथीन) का निकेल (Ni) उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजनीकरण किया जाता है, तो संतृप्त हाइड्रोकार्बन (एथेन) प्राप्त होता है।

समीकरण: C2H4 + H2 (Ni, ऊष्मा) -> C2H6

(v) जब साबुन को कठोर जल में डाला जाता है, तो वह कठोर जल में उपस्थित कैल्शियम (Ca2+) और मैग्नीशियम (Mg2+) आयनों के साथ अभिक्रिया करके अघुलनशील अवक्षेप (स्कम) बनाता है, जिससे साबुन आसानी से झाग नहीं देता।

(vi) जब एथेनोइक अम्ल (CH3COOH) की अभिक्रिया सोडियम कार्बोनेट (Na2CO3) से कराई जाती है, तो सोडियम एथेनोएट, जल तथा तीव्र बुदबुदाहट के साथ कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनती है।

समीकरण: 2CH3COOH + Na2CO3 -> 2CH3COONa + H2O + CO2

अथवा

निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए :

(i) उदासीनीकरण अभिक्रिया

(ii) pH पैमाना

(iii) जंग

उत्तर:

(i) उदासीनीकरण अभिक्रिया:

अम्ल तथा क्षारक की परस्पर अभिक्रिया से लवण तथा जल बनने की रासायनिक प्रक्रिया को उदासीनीकरण अभिक्रिया कहते हैं। इस अभिक्रिया में अम्ल का H+ आयन क्षारक के OH- आयन के साथ मिलकर जल बनाता है।

उदाहरण: HCl + NaOH -> NaCl + H2O

(ii) pH पैमाना:

किसी विलयन में उपस्थित हाइड्रोजन आयन (H+) की सांद्रता को मापने के लिए विकसित किए गए पैमाने को pH पैमाना कहते हैं। इसका मान 0 से 14 तक होता है।

- यदि pH का मान 7 से कम है, तो विलयन अम्लीय होता है।

- यदि pH का मान 7 के बराबर है, तो विलयन उदासीन होता है।

- यदि pH का मान 7 से अधिक है, तो विलयन क्षारीय होता है।

(iii) जंग (Rusting):

जब लोहे की वस्तुएँ नम वायु (ऑक्सीजन और नमी) के लंबे समय तक संपर्क में रहती हैं, तो उनकी सतह पर लाल-भूरे रंग की जलयोजित आयरन(III) ऑक्साइड की परत जम जाती है। इसे जंग कहते हैं तथा इस प्रक्रिया को लोहे का संक्षारण कहते हैं।

जंग का रासायनिक सूत्र: Fe2O3 · xH2O

प्रश्न 8.

लिंग निर्धारण क्या है ? मानव में लिंग निर्धारण प्रक्रिया का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर:

लिंग निर्धारण: वह प्रक्रिया जिसके द्वारा यह सुनिश्चित होता है कि उत्पन्न होने वाली संतान नर (लड़का) होगी या मादा (लड़की), लिंग निर्धारण कहलाती है।

मानव में लिंग निर्धारण की प्रक्रिया:

मानव की प्रत्येक कोशिका में 23 जोड़े (46) गुणसूत्र होते हैं। इनमें से 22 जोड़े कायिक गुणसूत्र होते हैं तथा 23वाँ जोड़ा लिंग गुणसूत्र होता है।

- पुरुषों में लिंग गुणसूत्र XY होते हैं। अतः पुरुषों में दो प्रकार के शुक्राणु बनते हैं: 50% शुक्राणु X गुणसूत्र वाले तथा 50% शुक्राणु Y गुणसूत्र वाले।

- स्त्रियों में लिंग गुणसूत्र XX होते हैं। अतः स्त्रियों के सभी अंडाणु केवल X गुणसूत्र वाले होते हैं।

निषेचन के समय संभावना:

1. यदि X गुणसूत्र वाला शुक्राणु, X गुणसूत्र वाले अंडाणु को निषेचित करता है, तो बनने वाला युग्मनज XX गुणसूत्र वाला होता है, जिससे बालिका (पुत्री) का जन्म होता है।

2. यदि Y गुणसूत्र वाला शुक्राणु, X गुणसूत्र वाले अंडाणु को निषेचित करता है, तो बनने वाला युग्मनज XY गुणसूत्र वाला होता है, जिससे बालक (पुत्र) का जन्म होता है।

अतः मानव में लिंग निर्धारण पूर्णतः पिता के शुक्राणु में उपस्थित लिंग गुणसूत्र (X या Y) द्वारा ही होता है।

चित्र की क्रमवार संरचना एवं आरेख विवरण:

- शीर्ष भाग (जनक): बाएँ ओर 'पिता (नर, XY)' तथा दाएँ ओर 'माता (मादा, XX)' दर्शाया जाता है।

- मध्य-ऊपरी भाग (युग्मक): पिता से दो अलग-अलग गोले बनते हैं - एक में 'X' और दूसरे में 'Y' (शुक्राणु)। माता से दो गोले बनते हैं - दोनों में 'X' और 'X' (अंडाणु)।

- मध्य भाग (निषेचन रेखाएँ):

- पिता के 'X' शुक्राणु से रेखा निकलकर माता के प्रथम 'X' अंडाणु से मिलती है -> परिणाम 'XX' (पुत्री)।

- पिता के 'X' शुक्राणु से रेखा निकलकर माता के द्वितीय 'X' अंडाणु से मिलती है -> परिणाम 'XX' (पुत्री)।

- पिता के 'Y' शुक्राणु से रेखा निकलकर माता के प्रथम 'X' अंडाणु से मिलती है -> परिणाम 'XY' (पुत्र)।

- पिता के 'Y' शुक्राणु से रेखा निकलकर माता के द्वितीय 'X' अंडाणु से मिलती है -> परिणाम 'XY' (पुत्र)।

- निचला भाग (संतति): अंतिम पंक्ति में स्पष्ट रूप से 50% पुत्री (XX) तथा 50% पुत्र (XY) का परिणाम अंकित होता है।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

प्रश्न 9.

निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए :

(a) गुरुत्वानुवर्तन

(b) अधिवृक्क ग्रंथ व उसके हार्मोन।

उत्तर:

(a) गुरुत्वानुवर्तन (Geotropism):

पौधों के अंगों की पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल की दिशा में या उसके विपरीत दिशा में होने वाली वृद्धि गति को गुरुत्वानुवर्तन कहते हैं।

- धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन: पौधे की जड़ें सदैव गुरुत्वाकर्षण बल की दिशा में नीचे मिट्टी की ओर वृद्धि करती हैं।

- ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्तन: पौधे का तना (प्ररोह) गुरुत्वाकर्षण बल के विपरीत ऊपर वायु की ओर वृद्धि करता है।

(b) अधिवृक्क ग्रंथि व उसके हार्मोन (Adrenal Gland and its Hormones):

अधिवृक्क (एड्रिनल) ग्रंथि मानव शरीर में प्रत्येक वृक्क (किडनी) के ऊपरी सिरे पर स्थित अंतःस्रावी ग्रंथि है।

इसके प्रमुख हार्मोन एवं उनके कार्य:

1. एड्रीनलीन (Adrenaline): इसे 'आपातकालीन हार्मोन' या 'लड़ो या उड़ो' (Fight or Flight) हार्मोन कहते हैं। डर, क्रोध, मानसिक तनाव या संकट की स्थिति में यह हार्मोन स्रावित होकर हृदय की धड़कन, सांस की दर तथा रक्तदाब बढ़ा देता है, जिससे शरीर आपात स्थिति का सामना करने के लिए तैयार होता है।

2. कोर्टिकोस्टेरॉयड हार्मोन (जैसे एल्डोस्टेरोन एवं कोर्टिसोल): यह हार्मोन शरीर में जल और लवणों (सोडियम-पोटैशियम) के संतुलन तथा कार्बोहाइड्रेट, वसा व प्रोटीन के उपापचय को नियंत्रित करते हैं।

प्रश्न 10.

(i) पारितंत्र के जैविक घटकों का वर्णन कीजिए।

(ii) खाद्य जाल का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर:

(i) पारितंत्र के जैविक घटक:

पारितंत्र में उपस्थित सभी सजीव जीव जैविक घटक कहलाते हैं। पोषण की विधि के आधार पर इन्हें तीन श्रेणियों में बाँटा गया है:

1. उत्पादक (Producers): ये स्वपोषी जीव हैं जो सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की सहायता से प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। उदाहरण: हरे पौधे तथा नील-हरित शैवाल।

2. उपभोक्ता (Consumers): ये वे जीव हैं जो अपने भोजन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर रहते हैं। इन्हें तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है:

- प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी): जैसे गाय, हिरण, टिड्डा।

- द्वितीयक उपभोक्ता (मांसाहारी): जैसे मेढक, लोमड़ी।

- तृतीयक/शीर्ष उपभोक्ता: जैसे शेर, बाज।

3. अपघटक (Decomposers): ये सूक्ष्मजीव (जीवाणु एवं कवक) हैं जो मृत जीव-जंतुओं तथा पादप अवशेषों के जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में अपघटित करके मिट्टी में मिला देते हैं।

(ii) खाद्य जाल का सचित्र वर्णन:

खाद्य जाल (Food Web): किसी पारितंत्र में पाई जाने वाली विभिन्न आहार श्रृंखलाएँ सीधी न होकर आपस में एक-दूसरे से जाल के रूप में जुड़ी होती हैं। जीवों के इन परस्पर जुड़े हुए आहार संबंधों के जटिल नेटवर्क को 'खाद्य जाल' कहते हैं।

चित्र की क्रमवार संरचना एवं आरेख विवरण:

- आधार (सबसे निचला भाग): उत्पादक दर्शाए जाते हैं (जैसे हरी घास और पौधे)।

- मध्य भाग (उपभोक्ता वर्ग):

- बाईं ओर: घास को खाने वाला टिड्डा -> टिड्डे को खाने वाला मेढक -> मेढक को खाने वाला सांप।

- बीच में: घास को खाने वाला खरगोश -> खरगोश को खाने वाली लोमड़ी।

- दाहिनी ओर: घास को खाने वाला चूहा -> चूहे को खाने वाला सांप या बाज।

- शीर्ष भाग: बाज अथवा शेर, जो सांप, मेढक, खरगोश आदि कई जीवों का शिकार कर सकता है।

- अंतर्संबंध (तीर के निशान): उत्पादक से विभिन्न शाकाहारियों की ओर तथा शाकाहारियों से विभिन्न मांसाहारियों की ओर तीर के निशान एक-दूसरे को काटते हुए क्रॉस दिशाओं में जुड़े होते हैं, जिससे एक स्पष्ट जालीदार संरचना का निर्माण होता है।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

प्रश्न 11.

हॉर्मोन्स क्या हैं ? मानव की अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा स्रावित होने वाले हॉर्मोन्स के कार्यों का विस्तार में वर्णन कीजिए।

उत्तर:

हॉर्मोन (Hormones): हॉर्मोन अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा सीधे रक्त में स्रावित होने वाले विशिष्ट जैव-रासायनिक संदेशवाहक हैं, जो शरीर की विभिन्न उपापचयी क्रियाओं, शारीरिक वृद्धि, विकास तथा पुनरुत्पादन का नियंत्रण और समन्वय करते हैं।

मानव की अंतःस्रावी ग्रंथियाँ, स्रावित हॉर्मोन तथा उनके कार्य:

1. पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland):

- स्रावित हॉर्मोन: वृद्धि हॉर्मोन (GH)।

- कार्य: यह शरीर की हड्डियों तथा ऊतकों की सामान्य वृद्धि और विकास का नियंत्रण करता है। इसे 'मास्टर ग्रंथि' कहते हैं क्योंकि यह अन्य ग्रंथियों के स्रावण को भी नियंत्रित करती है।

2. अवटू ग्रंथि / थायराइड ग्रंथि (Thyroid Gland):

- स्रावित हॉर्मोन: थायरोक्सिन (Thyroxine)।

- कार्य: यह कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन के उपापचय को नियंत्रित करता है जिससे शरीर का संतुलित विकास होता है। इसके निर्माण के लिए भोजन में आयोडीन आवश्यक है।

3. अग्न्याशय (Pancreas):

- स्रावित हॉर्मोन: इंसुलिन (Insulin)।

- कार्य: यह रक्त में शर्करा (ग्लूकोज) के स्तर को नियंत्रित करता है। इसकी कमी से मधुमेह (Diabetes) रोग होता है।

4. अधिवृक्क ग्रंथि / एड्रिनल ग्रंथि (Adrenal Gland):

- स्रावित हॉर्मोन: एड्रीनलीन (Adrenaline)।

- कार्य: यह आपातकालीन स्थितियों (भय, चिंता, तनाव) में हृदय गति, श्वसन दर और रक्तदाब को नियंत्रित कर शरीर को संतुलित रखता है।

5. वृषण (Testes - नर अंतःस्रावी ग्रंथि):

- स्रावित हॉर्मोन: टेस्टोस्टेरोन (Testosterone)।

- कार्य: यह लड़कों में यौवनावस्था के द्वितीयक लैंगिक लक्षणों (जैसे दाढ़ी-मूंछ का आना, आवाज का भारी होना) तथा शुक्राणु निर्माण का नियंत्रण करता है।

6. अंडाशय (Ovary - मादा अंतःस्रावी ग्रंथि):

- स्रावित हॉर्मोन: एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरोन (Estrogen and Progesterone)।

- कार्य: यह लड़कियों में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का विकास, मासिक चक्र का नियमन तथा गर्भावस्था के रखरखाव में सहायक होते हैं।

अथवा

निम्नलिखित में कॉलम-A तथा कॉलम-B को सही सुमेलित कीजिए :

कॉलम - A

I. कूटपाद

II. प्रकाश संश्लेषण

III. जठर ग्रंथियां

IV. वृक्क

V. ऊर्जा मुद्रा

VI. छुई मुई का पौधा

कॉलम - B

(A) उद्दीपन

(B) आमाशय

(C) ए०टी०पी०

(D) अमीबा

(E) क्लोरोफिल

(F) उत्सर्जन

उत्तर:

कॉलम - A और कॉलम - B का सही सुमेलन निम्नलिखित है:

I. कूटपाद -> (D) अमीबा

II. प्रकाश संश्लेषण -> (E) क्लोरोफिल

III. जठर ग्रंथियां -> (B) आमाशय

IV. वृक्क -> (F) उत्सर्जन

V. ऊर्जा मुद्रा -> (C) ए०टी०पी०

VI. छुई मुई का पौधा -> (A) उद्दीपन

प्रश्न 13.

लोहे को जंग लगने से बचाने की प्रक्रिया गैल्वनाइजेशन कहलाती है। इसमें क्या किया जाता है ?

(A) लोहे पर क्रोमियम की परत चढ़ाना

(B) लोहे पर जस्ता की परत चढ़ाना

(C) तांबे पर टिन की परत चढ़ाना

(D) एल्युमिनियम पर निकेल की परत चढ़ाना

उत्तर:

(B) लोहे पर जस्ता की परत चढ़ाना

व्याख्या: गैल्वनाइजेशन (यशद लेपन) की प्रक्रिया में लोहे को जंग से सुरक्षित रखने के लिए उस पर जस्ते (जिंक) की पतली परत चढ़ाई जाती है।

प्रश्न 14.

मानव आहारनाल का सबसे लंबा भाग है

(A) आमाशय

(B) बृहदांत्र

(C) क्षुद्रांत्र

(D) यकृत

उत्तर:

(C) क्षुद्रांत्र

व्याख्या: मानव आहारनाल का सबसे लंबा भाग क्षुद्रांत्र (छोटी आँत) होता है, जिसकी लंबाई लगभग 6 से 7 मीटर होती है।

प्रश्न 15.

पौधों में जाइलम का मुख्य कार्य होता है

(A) भोज्य पदार्थों का स्थानान्तरण

(B) वाष्पोत्सर्जन क्रिया में सहायता करना

(C) जल व खनिज पदार्थों का परिवहन

(D) पौधों की वृद्धि में सहायता करना

उत्तर:

(C) जल व खनिज पदार्थों का परिवहन

व्याख्या: जाइलम ऊतक जड़ों द्वारा अवशोषित जल और खनिज लवणों को पौधे के ऊपरी भागों तक पहुँचाने का कार्य करता है।

प्रश्न 16.

पौधों में साइटोकाइिनन हार्मोन का मुख्य कार्य होता है

(A) कोशिका विभाजन को प्रेरित करना

(B) पादप वृद्धि का संदमन (रोकना)

(C) शीर्ष भाग की वृद्धि को प्रेरित करना

(D) पुष्पन में सहायता करना

उत्तर:

(A) कोशिका विभाजन को प्रेरित करना

व्याख्या: साइटोकाइिनन पादप हार्मोन का मुख्य कार्य कोशिका विभाजन की दर को बढ़ाना तथा उसे प्रेरित करना है।

प्रश्न 17.

निम्न में से कौन लैंगिक संचरण रोग नहीं है ?

(A) हैजा

(B) सिफिलिस

(C) गोनेरिया

(D) इनमें से सभी

उत्तर:

(A) हैजा

व्याख्या: सिफिलिस और गोनेरिया लैंगिक संपर्क से फैलने वाले रोग हैं, जबकि हैजा दूषित जल एवं भोजन के सेवन से फैलता है।

प्रश्न 18.

पुनरुद्भवन क्रिया होती है

(A) ब्रायोफिल्म में

(B) प्लाज्मोडियम में

(C) राइजोपस में

(D) प्लेनेरिया में

उत्तर:

(D) प्लेनेरिया में

व्याख्या: प्लेनेरिया में पुनरुद्भवन की उच्च क्षमता होती है, जिससे इसके शरीर का प्रत्येक कटा हुआ भाग विकसित होकर नया जीव बना लेता है।

प्रश्न 19.

मानव की विभिन्न अनैच्छिक क्रियाएं जैसे मुँह में लार का आना, मस्तिष्क के किस भाग द्वारा नियंत्रित होती है ?

(A) मध्य मस्तिष्क

(B) अग्र मस्तिष्क

(C) मेडुला

(D) हाइपोथैलेमस

उत्तर:

सही विकल्प: (C) मेडुला

व्याख्या: लार का आना, रक्तचाप, उल्टी आदि अनैच्छिक क्रियाओं का नियंत्रण पश्च मस्तिष्क में स्थित मेडुला (ऑब्लांगेटा) द्वारा होता है।

प्रश्न 20.

निम्न आहार श्रृंखला में से कौन घास के मैदान के पारितंत्र से संबंधित है ?

(A) वृक्ष -> हिरण -> बाघ

(B) पादप प्लवक -> कीड़े -> मछली -> सारस

(C) घास -> टिड्डा -> मेढक -> सर्प -> बाज

(D) इनमें से सभी

उत्तर:

सही विकल्प: (C) घास -> टिड्डा -> मेढक -> सर्प -> बाज

व्याख्या: यह आहार श्रृंखला घास के मैदान के पारितंत्र को निरूपित करती है जिसमें घास उत्पादक है, टिड्डा प्राथमिक उपभोक्ता है, मेढक द्वितीयक उपभोक्ता है, सर्प तृतीयक उपभोक्ता है और बाज शीर्ष उपभोक्ता है।

प्रश्न 1 (i).

अवतल दर्पण से किसी वस्तु का आभासी प्रतिबिंब बनने का किरण आरेख बनाइए।

उत्तर:

जब किसी वस्तु को अवतल दर्पण के ध्रुव (P) तथा मुख्य फोकस (F) के बीच रखा जाता है, तो वस्तु का आभासी, सीधा तथा बड़ा प्रतिबिंब दर्पण के पीछे बनता है।

किरण आरेख का विवरण:

- आकृति एवं रूपरेखा: अवतल दर्पण का ध्रुव P, मुख्य फोकस F तथा वक्रता केंद्र C मुख्य अक्ष पर स्थित हैं। दर्पण के सामने P और F के मध्य एक वस्तु AB स्थित है।

- प्रथम आपतित किरण: वस्तु के शीर्ष A से मुख्य अक्ष के समानांतर चलने वाली किरण दर्पण से परावर्तित होकर मुख्य फोकस F से होकर जाती है।

- द्वितीय आपतित किरण: वस्तु के शीर्ष A से वक्रता केंद्र C की सीध में आपतित किरण दर्पण से परावर्तन के पश्चात उसी मार्ग से C की ओर वापस लौटती है।

- परावर्तित किरणों की स्थिति: दर्पण के सामने ये परावर्तित किरणें परस्पर फैलती (अपसारित) जाती हैं।

- आभासी प्रतिबिंब का निर्माण: जब इन दोनों परावर्तित किरणों को दर्पण के पीछे बढ़ाया जाता है, तो वे बिंदु A' पर मिलती हुई प्रतीत होती हैं। बिंदु A' से मुख्य अक्ष पर लंब A'B' खींचने पर वस्तु AB का आभासी, सीधा तथा आवर्धित प्रतिबिंब प्राप्त होता है।

- प्रतिबिंब की स्थिति: दर्पण के पीछे।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

प्रश्न 1 (ii).

20 सेमी फोकस दूरी वाले उत्तल लेंस से 30 सेमी की दूरी पर वस्तु स्थित है। वस्तु के प्रतिबिंब की स्थिति ज्ञात कीजिए।

उत्तर:

दिया है:

उत्तल लेंस की फोकस दूरी (f) = +20 सेमी

वस्तु की दूरी (u) = -30 सेमी

ज्ञात सूत्र:

लेंस सूत्र: 1/f = 1/v - 1/u

हल:

1/v = 1/f + 1/u

1/v = 1/20 + 1/(-30)

1/v = 1/20 - 1/30

20 और 30 का ल०स० (LCM) = 60

1/v = (3 - 2) / 60

1/v = 1 / 60

v = +60 सेमी

अतः उत्तर:

प्रतिबिंब लेंस के दूसरी ओर 60 सेमी की दूरी पर बनता है। यह प्रतिबिंब वास्तविक तथा उल्टा होगा।

प्रश्न 2.

विलंबित सूर्यास्त क्या है ? इसका सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर:

सूर्यास्त के समय जब सूर्य क्षितिज के नीचे चला जाता है, तब भी वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण सूर्य हमें लगभग 2 मिनट तक दिखाई देता रहता है। इस परिघटना को विलंबित सूर्यास्त कहते हैं।

कारण एवं व्याख्या:

जब सूर्य क्षितिज के ठीक नीचे स्थित होता है, तो उससे आने वाली प्रकाश किरणें अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करती हैं। वायुमंडल की परतों में नीचे जाने पर वायु का घनत्व बढ़ता जाता है (माध्यम सघन होता जाता है)। इसके कारण प्रकाश किरणें निरंतर अभिलंब की ओर अपवर्तित (मुड़ती) होती जाती हैं। जब ये अपवर्तित किरणें प्रेक्षक की आँख तक पहुँचती हैं, तो प्रेक्षक को सूर्य अपनी वास्तविक स्थिति से थोड़ा ऊपर, क्षितिज के ऊपर आभासी स्थिति में दिखाई देता है।

चित्र का विवरण:

- आकृति एवं रूपरेखा: केंद्र में गोल पृथ्वी और उसके चारों ओर वायुमंडल की परतें प्रदर्शित हैं।

- प्रेक्षक एवं क्षितिज रेखा: पृथ्वी की सतह पर खड़ा प्रेक्षक और उसकी आँख के समानांतर क्षैतिज रेखा (क्षितिज)।

- सूर्य की वास्तविक स्थिति: क्षितिज रेखा के नीचे सूर्य का वास्तविक गोला दर्शाया गया है।

- प्रकाश का अपवर्तन मार्ग: वास्तविक सूर्य से निकलने वाली प्रकाश किरण वायुमंडल में प्रवेश कर वक्राकार होकर प्रेक्षक की आँख तक पहुँचती है।

- सूर्य की आभासी स्थिति: आँख से सीधी रेखा में क्षितिज के ऊपर सूर्य की आभासी स्थिति दिखाई देती है।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

प्रश्न 3.

धारावाही परिनालिका के चारों ओर उत्पन्न चुम्बकीय बल रेखाओं का चित्र बनाइए। धारा की दिशा बदलने पर क्या परिवर्तन होगा ?

उत्तर:

धारावाही परिनालिका:

विद्युत-रोधी तांबे के तार को पास-पास लपेटकर बनाई गई बेलनाकार कुंडली को परिनालिका कहते हैं। जब इसमें विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो यह एक छड़ चुंबक की तरह व्यवहार करती है।

चुम्बकीय बल रेखाओं का विवरण:

- परिनालिका के अंदर: चुंबकीय बल रेखाएं एक-दूसरे के समानांतर तथा सीधी रेखाओं के रूप में होती हैं, जो यह दर्शाती हैं कि परिनालिका के भीतर चुंबकीय क्षेत्र सभी बिंदुओं पर एकसमान होता है।

- परिनालिका के बाहर: चुंबकीय बल रेखाएं वक्राकार बंद पाश बनाती हैं, जो एक सिरे से निकलकर दूसरे सिरे में प्रवेश करती हैं।

- चुंबकीय ध्रुव: जिस सिरे से बल रेखाएं बाहर निकलती हैं, वह उत्तरी ध्रुव (N) तथा जिस सिरे में प्रवेश करती हैं, वह दक्षिणी ध्रुव (S) कहलाता है।

धारा की दिशा बदलने पर परिवर्तन:

यदि परिनालिका में प्रवाहित धारा की दिशा को उलट दिया जाए, तो:

1. परिनालिका के चुंबकीय ध्रुवों की स्थिति बदल जाती है (अर्थात उत्तरी ध्रुव दक्षिणी ध्रुव बन जाता है और दक्षिणी ध्रुव उत्तरी ध्रुव बन जाता है)।

2. चुंबकीय बल रेखाओं की दिशा भी पूरी तरह से विपरीत हो जाती है।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

प्रश्न 4.

(i)

चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित विद्युत धारावाही चालक पर लगने वाले बल की दिशा जानने के लिये उपयुक्त फ्लेमिंग के बायें हाथ के नियम की स्पष्ट व्याख्या कीजिए।

उत्तर:

फ्लेमिंग का बाएँ हाथ का नियम:

यदि हम अपने बाएँ हाथ के अंगूठे, तर्जनी (index finger) तथा मध्यमा (middle finger) को इस प्रकार फैलाएँ कि तीनों परस्पर एक-दूसरे के लंबवत रहें, तो:

1. तर्जनी अंगुली चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को दर्शाती है।

2. मध्यमा अंगुली चालक में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा को दर्शाती है।

3. अंगूठा चालक पर लगने वाले बल की दिशा (चालक की गति की दिशा) को व्यक्त करता है।

उपयोग: इस नियम का उपयोग चुम्बकीय क्षेत्र में रखे धारावाही चालक पर उत्पन्न बल की दिशा ज्ञात करने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 4.

(ii)

विद्युत शक्ति का अर्थ क्या है ? इसका उपयुक्त सूत्र V तथा R के पदों में लिखिए।

उत्तर:

विद्युत शक्ति का अर्थ:

किसी विद्युत परिपथ में विद्युत ऊर्जा के व्यय (उपभोग) होने की दर को विद्युत शक्ति कहते हैं। इसे P द्वारा निरूपित किया जाता है। इसका SI मात्रक वाट (Watt) होता है।

विद्युत शक्ति = कार्य / समय (P = W / t)

V तथा R के पदों में सूत्र:

हम जानते हैं कि P = V × I

तथा ओम के नियम के अनुसार, I = V / R

I का मान शक्ति के सूत्र में रखने पर:

P = V × (V / R)

P = V² / R

अतः उत्तर: P = V² / R (जहाँ P = विद्युत शक्ति, V = विभवांतर, R = प्रतिरोध)।

प्रश्न 4.

(अथवा)

घरेलू विद्युत परिपथ का संक्षिप्त वर्णन उपयुक्त चित्र सहित कीजिए।

उत्तर:

घरेलू विद्युत परिपथ का संक्षिप्त वर्णन:

1. मुख्य आपूर्ति तार: बाहरी खंभों से मुख्य आपूर्ति तारों द्वारा विद्युत घर तक पहुँचती है। इसमें दो मुख्य तार होते हैं:

- विद्युन्मय तार (Live wire): लाल रंग के रोधन वाला तार जो 220 V के विभव पर होता है।

- उदासीन तार (Neutral wire): काले रंग के रोधन वाला तार जो 0 V विभव पर होता है।

इन दोनों तारों के मध्य 220 V का विभवांतर होता है।

2. भूसंपर्क तार (Earth wire): हरे रंग के रोधन आवरण वाला तार जो घर के समीप भूमि में गढ़ी धातु की प्लेट से जुड़ा होता है। यह धातु के आवरण वाले विद्युतीय उपकरणों (जैसे फ्रिज, प्रेस) से विद्युत धारा के क्षरण होने पर सुरक्षा प्रदान करता है।

3. विद्युत मीटर एवं मुख्य फ्यूज: परिपथ में सबसे पहले विद्युन्मय तार में श्रेणीक्रम में मुख्य फ्यूज लगाया जाता है। इसके बाद धारा विद्युत मीटर में जाती है, जो उपभुक्त ऊर्जा को यूनिट (kWh) में मापता है।

4. वितरण बोर्ड और परिपथ: विद्युत मीटर के पश्चात् मुख्य स्विच से होती हुई धारा वितरण बोर्ड तक पहुँचती है। यहाँ से घर के विभिन्न कमरों के लिए पृथक परिपथ बनाए जाते हैं।

5. समानांतर क्रम संयोजन: घरेलू परिपथ में सभी उपकरणों (बल्ब, पंखे, सॉकेट आदि) को समानांतर क्रम (Parallel combination) में जोड़ा जाता है। इससे प्रत्येक उपकरण को बराबर 220 V का विभवांतर प्राप्त होता है और एक उपकरण खराब होने पर अन्य उपकरण प्रभावित नहीं होते हैं।

चित्र का विवरण:

- आकृति/रूपरेखा: मुख्य आपूर्ति लाइन से आ रहे तीन तार (भूसंपर्क, विद्युन्मय, उदासीन) जो बाएँ से दाएँ क्रमशः मुख्य फ्यूज, विद्युत मीटर, मुख्य स्विच, वितरण बोर्ड और अंत में घरेलू उपकरणों से जुड़े हैं।

- मुख्य भाग (Labels):

1. भूसंपर्क तार (हरा) - सबसे ऊपर की रेखा

2. विद्युन्मय तार (लाल) - मध्य की रेखा

3. उदासीन तार (काला) - नीचे की रेखा

4. मुख्य फ्यूज - विद्युन्मय तार पर स्थित

5. विद्युत मीटर - फ्यूज के आगे स्थित आयताकार बॉक्स

6. मुख्य स्विच - मीटर के आगे स्थित स्विच बॉक्स

7. वितरण बोर्ड - परिपथों को विभाजित करने वाला बॉक्स

8. उपकरण एवं सॉकेट - समानांतर क्रम में जुड़ी शाखाएँ

- सापेक्ष स्थिति: बाएँ सिरे पर खंभे से आने वाली आपूर्ति, मध्य में फ्यूज, मीटर व मुख्य स्विच, तथा दाएँ सिरे पर समानांतर क्रम में जुड़े घरेलू उपकरण।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

प्रश्न 5.

(i)

विकृतगंधिता क्या है ? इसे कैसे रोका जा सकता है ?

उत्तर:

विकृतगंधिता (Rancidity):

जब वसायुक्त अथवा तैलीय खाद्य पदार्थों को लंबे समय तक वायु (ऑक्सीजन) के संपर्क में खुला रखा जाता है, तो उनका उपचयन (ऑक्सीकरण) हो जाता है। उपचयन के कारण उनके स्वाद और गंध में परिवर्तन आ जाता है तथा वे खराब हो जाते हैं। इस परिघटना को विकृतगंधिता कहते हैं।

इसे रोकने के उपाय:

1. प्रति-ऑक्सीकारक (Antioxidants) का उपयोग करना।

2. चिप्स तथा अन्य खाद्य सामग्रियों के पैकेटों में से ऑक्सीजन हटाकर अक्रिय नाइट्रोजन गैस भरना।

3. खाद्य पदार्थों को वायुरोधी (Air-tight) बर्तनों में रखना।

4. खाद्य पदार्थों को कम ताप पर रेफ्रिजरेटर में रखना।

प्रश्न 5.

(ii) (a)

निम्नलिखित यौगिकों के संरचना सूत्र लिखिए :

(a) ब्यूटेनोइक अम्ल

उत्तर:

ब्यूटेनोइक अम्ल (Butanoic acid):

रासायनिक सूत्र: C₃H₇COOH

संरचना सूत्र:

H H H O

H - C - C - C - C - O - H

H H H

संक्षिप्त संरचना सूत्र: CH₃-CH₂-CH₂-COOH

प्रश्न 5.

(ii) (b)

निम्नलिखित यौगिकों के संरचना सूत्र लिखिए :

(b) पेन्टेन

उत्तर:

पेन्टेन (Pentane):

रासायनिक सूत्र: C₅H₁₂

संरचना सूत्र:

H H H H H

H - C - C - C - C - C - H

H H H H H

संक्षिप्त संरचना सूत्र: CH₃-CH₂-CH₂-CH₂-CH₃

प्रश्न 6.

(i)

अवक्षेपण अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर:

अवक्षेपण अभिक्रिया (Precipitation Reaction):

वह रासायनिक अभिक्रिया जिसमें दो जलीय विलयनों को आपस में मिलाने पर एक जल में अघुलनशील (अविलेय) ठोस पदार्थ का निर्माण होता है, उसे अवक्षेपण अभिक्रिया कहते हैं। इस प्रकार बनने वाले अघुलनशील ठोस को 'अवक्षेप' कहते हैं।

उदाहरण:

जब सोडियम सल्फेट (Na₂SO₄) के जलीय विलयन में बेरियम क्लोराइड (BaCl₂) का जलीय विलयन मिलाया जाता है, तो बेरियम सल्फेट (BaSO₄) का सफेद रंग का अवक्षेप प्राप्त होता है।

रासायनिक समीकरण:

Na₂SO₄(aq) + BaCl₂(aq) -> BaSO₄(s) + 2NaCl(aq)

(यहाँ BaSO₄ सफेद अवक्षेप है।)

प्रश्न 6.

(ii)

निस्तापन और भर्जन को उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर:

1. निस्तापन (Calcination):

सांद्रित अयस्क को उसके गलनांक से कम ताप पर, वायु की अनुपस्थिति या सीमित उपस्थिति में उच्च ताप पर गर्म करके ऑक्साइड में बदलने की प्रक्रिया निस्तापन कहलाती है।

यह प्रक्रिया मुख्य रूप से कार्बोनेट अयस्कों के लिए अपनाई जाती है। इससे अयस्क में उपस्थित नमी तथा वाष्पशील अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं।

उदाहरण:

कैल्शियम कार्बोनेट (चुना पत्थर) को गर्म करने पर कैल्शियम ऑक्साइड प्राप्त होता है।

CaCO₃(s) -> CaO(s) + CO₂(g)

जिंक कार्बोनेट (कैलामाइन) अयस्क का निस्तापन:

ZnCO₃(s) -> ZnO(s) + CO₂(g)

2. भर्जन (Roasting):

सांद्रित अयस्क को उसके गलनांक से कम ताप पर, वायु की नियंत्रित एवं पर्याप्त उपस्थिति में तेजी से गर्म करने की प्रक्रिया भर्जन कहलाती है।

यह प्रक्रिया मुख्य रूप से सल्फाइड अयस्कों के लिए अपनाई जाती है। इससे सल्फर तथा आर्सेनिक जैसी अशुद्धियाँ ऑक्साइड के रूप में वाष्पित होकर पृथक हो जाती हैं।

उदाहरण:

जिंक सल्फाइड (जिंक ब्लेन्ड) अयस्क को वायु की उपस्थिति में गर्म करने पर जिंक ऑक्साइड बनता है।

2ZnS(s) + 3O₂(g) -> 2ZnO(s) + 2SO₂(g)

प्रश्न 7.

क्या होता है जब —

(i) एथेनाल का क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट में ऑक्सीकरण किया जाता है ?

(ii) एथेनोइक अम्ल की अभिक्रिया सोडियम हाइड्रॉक्साइड से कराई जाती है ?

(iii) एथेनोइक अम्ल की अभिक्रिया एथेनाल से सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में कराई जाती है ?

(iv) असंतृप्त हाइड्रोकार्बन का हाइड्रोजनीकरण Ni उत्प्रेरक की उपस्थिति में किया जाता है ?

(v) साबुन को कठोर जल में डाला जाता है ?

(vi) सोडियम कार्बोनेट की अभिक्रिया एथेनोइक अम्ल से कराई जाती है ?

अथवा

निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए :

(i) उदासीनीकरण अभिक्रिया

(ii) pH पैमाना

(iii) जंग

उत्तर:

(i) जब एथेनाल को क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO4) के साथ गर्म करके ऑक्सीकृत किया जाता है, तो यह एथेनोइक अम्ल (एसिटिक अम्ल) में परिवर्तित हो जाता है।

रासायनिक समीकरण:

CH3CH2OH + 2[O] (क्षारीय KMnO4 + ऊष्मा) -> CH3COOH + H2O

(ii) जब एथेनोइक अम्ल की अभिक्रिया सोडियम हाइड्रॉक्साइड से कराई जाती है, तो सोडियम एथेनोएट (सोडियम एसिटेट) और जल बनता है।

रासायनिक समीकरण:

CH3COOH + NaOH -> CH3COONa + H2O

(iii) जब एथेनोइक अम्ल सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) की उपस्थिति में एथेनाल के साथ अभिक्रिया करता है, तो मीठी गंध वाला एस्टर (एथिल एथेनोएट) और जल बनता है। इस अभिक्रिया को एस्टरीकरण कहते हैं।

रासायनिक समीकरण:

CH3COOH + C2H5OH (सांद्र H2SO4) -> CH3COOC2H5 + H2O

(iv) जब निकेल (Ni) उत्प्रेरक की उपस्थिति में असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (जैसे एथीन) का हाइड्रोजनीकरण कराया जाता है, तो वह संतृप्त हाइड्रोकार्बन (जैसे एथेन) में बदल जाता है।

रासायनिक समीकरण:

CH2=CH2 + H2 (Ni उत्प्रेरक) -> CH3-CH3

(v) जब साबुन को कठोर जल में डाला जाता है, तो साबुन कठोर जल में उपस्थित कैल्शियम (Ca2+) और मैग्नीशियम (Mg2+) आयनों के साथ अभिक्रिया करके एक अघुलनशील अवक्षेप (स्कम) बनाता है, जिससे झाग आसानी से नहीं बनता।

रासायनिक समीकरण:

2C17H35COONa + CaCl2 -> (C17H35COO)2Ca + 2NaCl

(vi) जब सोडियम कार्बोनेट की अभिक्रिया एथेनोइक अम्ल से कराई जाती है, तो सोडियम एथेनोएट, जल और कार्बन डाइऑक्साइड गैस तेज बुदबुदाहट के साथ निकलती है।

रासायनिक समीकरण:

2CH3COOH + Na2CO3 -> 2CH3COONa + H2O + CO2

अथवा विकल्प का उत्तर:

(i) उदासीनीकरण अभिक्रिया:

जब कोई अम्ल किसी क्षारक के साथ अभिक्रिया करता है, तो लवण और जल का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया को उदासीनीकरण अभिक्रिया कहते हैं। इस अभिक्रिया में अम्ल और क्षारक एक-दूसरे के प्रभाव को समाप्त कर देते हैं।

उदाहरण:

HCl + NaOH -> NaCl + H2O

(ii) pH पैमाना:

किसी विलयन में उपस्थित हाइड्रोजन आयन (H+) की सांद्रता मापने के लिए प्रयुक्त पैमाने को pH पैमाना कहते हैं।

- इस पैमाने पर pH मान 0 से 14 तक होता है।

- उदासीन विलयन का pH मान 7 होता है।

- अम्लीय विलयन का pH मान 7 से कम होता है।

- क्षारीय विलयन का pH मान 7 से अधिक होता है।

(iii) जंग:

जब लोहे से बनी वस्तुओं को नम वायु (ऑक्सीजन और नमी) में खुला छोड़ दिया जाता है, तो लोहे की सतह पर भूरे रंग की परत जमा हो जाती है। इस प्रक्रिया को जंग लगना (संक्षारण) कहते हैं।

जंग का रासायनिक नाम जलयोजित फेरिक ऑक्साइड होता है।

रासायनिक समीकरण:

4Fe + 3O2 + 2xH2O -> 2Fe2O3.xH2O

प्रश्न 8.

लिंग निर्धारण क्या है ? मानव में लिंग निर्धारण प्रक्रिया का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर:

लिंग निर्धारण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा यह निश्चित होता है कि जन्मा शिशु नर (लड़का) होगा या मादा (लड़की)।

मानव में लिंग निर्धारण प्रक्रिया:

मानव की प्रत्येक कोशिका में 23 जोड़े (कुल 46) गुणसूत्र होते हैं। इनमें से 22 जोड़े गुणसूत्र कायिक गुणसूत्र (ऑटोसोम) कहलाते हैं, जो दोनों लिंगों में समान होते हैं। 23वाँ जोड़ा लिंग गुणसूत्र कहलाता है, जो लिंग निर्धारण का कार्य करता है।

1. स्त्रियों में लिंग गुणसूत्र का जोड़ा समान होता है, जिसे XX द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। अतः स्त्रियाँ केवल एक ही प्रकार के अंडाणु (X गुणसूत्र वाले) बनाती हैं।

2. पुरुषों में लिंग गुणसूत्र का जोड़ा विषम होता है, जिसे XY द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। अतः पुरुष दो प्रकार के शुक्राणु बनाते हैं - 50 प्रतिशत X गुणसूत्र वाले और 50 प्रतिशत Y गुणसूत्र वाले।

निषेचन के समय:

- यदि X गुणसूत्र वाला शुक्राणु अंडाणु (X) को निषेचित करता है, तो बनने वाला युग्मनज XX होता है और संतति बालिका (लड़की) बनती है।

- यदि Y गुणसूत्र वाला शुक्राणु अंडाणु (X) को निषेचित करता है, तो बनने वाला युग्मनज XY होता है और संतति बालक (लड़का) बनता है।

अतः स्पष्ट है कि मानव में लिंग निर्धारण पिता के शुक्राणु के प्रकार पर निर्भर करता है।

चित्र का विवरण:

- आकृति/रूपरेखा: मानव में लिंग निर्धारण का आरेख जिसमें जनक, उनके द्वारा उत्पन्न युग्मक और निषेचन से प्राप्त होने वाली संतति को दर्शाया गया है।

- भाग का नाम और उनकी स्थिति:

- सबसे ऊपर: बाईं ओर जनक पिता (XY) तथा दाईं ओर जनक माता (XX)।

- मध्य रेखा में: पिता से बने दो प्रकार के शुक्राणु (X और Y) तथा माता से बने दो अंडाणु (X और X)।

- निचली रेखा में: निषेचन के चार संभावित संयोजन:

- पहला संयोजन: पिता का X + माता का X = XX (लड़की)

- दूसरा संयोजन: पिता का X + माता का X = XX (लड़की)

- तीसरा संयोजन: पिता का Y + माता का X = XY (लड़का)

- चौथा संयोजन: पिता का Y + माता का X = XY (लड़का)

- अनुपात: 50 प्रतिशत लड़की तथा 50 प्रतिशत लड़का।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

प्रश्न 9(a).

गुरुत्वानुवर्तन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर:

गुरुत्वानुवर्तन:

गुरुत्वाकर्षण बल की दिशा में या उसके विपरीत पौधे के अंगों में होने वाली अनुक्रिया या वृद्धि गति को गुरुत्वानुवर्तन कहते हैं।

1. धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन: पौधे की जड़ें सदैव गुरुत्वाकर्षण बल की दिशा में (नीचे मिट्टी की ओर) वृद्धि करती हैं। इसे धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन कहते हैं।

2. ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्तन: पौधे का प्ररोह (तनाव एवं पत्तियाँ) गुरुत्वाकर्षण बल के विपरीत (ऊपर वायु में) वृद्धि करता है। इसे ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्तन कहते हैं।

यह गति पौधों में ऑक्सिन हार्मोन के असमान वितरण के कारण होती है और यह पौधे को स्थिर रखने, जल अवशोषण तथा प्रकाश प्राप्त करने में सहायता करती है।

प्रश्न 9(b).

अधिवृक्क ग्रंथि व उसके हार्मोन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर:

अधिवृक्क ग्रंथि व उसके हार्मोन:

अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal Gland) मानव शरीर में दोनों वृक्कों के ऊपरी सिरे पर टोपी की तरह स्थित एक महत्वपूर्ण अंतःस्रावी ग्रंथि है।

1. स्रावित हार्मोन: यह ग्रंथि मुख्य रूप से एड्रिनेलिन (Adrenaline) और कॉर्टिकोस्टेरॉयड हार्मोन का स्राव करती है।

2. एड्रिनेलिन हार्मोन के कार्य:

- इसे आपात्कालीन हार्मोन या 'लड़ो या भागो' (Fight or Flight) हार्मोन भी कहते हैं।

- यह हार्मोन अत्यधिक भय, गुस्सा, चिंता या आपातकालीन परिस्थितियों में स्रावित होता है।

- यह हृदय की धड़कन, श्वसन दर तथा रक्तचाप को बढ़ा देता है जिससे शरीर को अधिक ऑक्सीजन और ऊर्जा मिलती है।

- यह यकृत में संगृहीत ग्लाइकोजन को ग्लूकोज में बदलने में मदद करता है ताकि शरीर संकट का सामना कर सके।

प्रश्न 10(i).

पारितंत्र के जैविक घटकों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

पारितंत्र के जैविक घटक:

पारितंत्र में पाए जाने वाले सभी सजीव जीवों को जैविक घटक कहते हैं। पोषण प्राप्त करने की विधि के आधार पर इन्हें तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

1. उत्पादक:

ये स्वपोषी जीव होते हैं जो सूर्य के प्रकाश, जल तथा कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपने भोजन (कार्बनिक पदार्थों) का स्वयं निर्माण करते हैं।

उदाहरण: सभी हरे पौधे, शैवाल तथा प्रकाश संश्लेषी जीवाणु।

2. उपभोक्ता:

ये विषमपोषी जीव होते हैं जो अपने भोजन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर करते हैं। इन्हें तीन स्तरों में बाँटा गया है:

- प्राथमिक उपभोक्ता: शाकाहारी जीव जो सीधे पौधों को खाते हैं (जैसे - हिरण, गाय, टिड्डा)।

- द्वितीयक उपभोक्ता: माँसाहारी जीव जो शाकाहारी जीवों का भक्षण करते हैं (जैसे - मेढक, लोमड़ी)।

- तृतीयक उपभोक्ता: उच्च माँसाहारी जीव जो अन्य माँसाहारियों को खाते हैं (जैसे - शेर, बाज)।

3. अपघटक:

ये सूक्ष्मजीव मृत पौधों एवं जन्तुओं के जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में तोड़ देते हैं, जिससे ये तत्व पुनः मिट्टी में मिल जाते हैं।

उदाहरण: जीवाणु और कवक।

प्रश्न 10(ii).

खाद्य जाल का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर:

खाद्य जाल:

किसी पारितंत्र में अनेक खाद्य शृंखलाएँ स्वतंत्र न होकर आपस में एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। इन खाद्य शृंखलाओं के परस्पर जुड़ने से बने जटिल नेटवर्क को खाद्य जाल कहते हैं।

प्रकृति में कोई भी जीव केवल एक ही प्रकार के जीव पर निर्भर नहीं रहता। एक प्राथमिक उपभोक्ता कई प्रकार के पौधों को खा सकता है और स्वयं भी कई द्वितीयक उपभोक्ताओं का भोजन बन सकता है। खाद्य जाल पारितंत्र की स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक है।

चित्र का विवरण:

- आकृति/रूपरेखा: एक जाल-नुमा आरेख जो विभिन्न खाद्य शृंखलाओं के अंतर्संबंधों को दर्शाता है।

- भाग का नाम और उनकी स्थिति:

- सबसे नीचे: प्राथमिक उत्पादक (घास, पौधे)।

- मध्य भाग में: प्राथमिक उपभोक्ता (खरगोश, टिड्डा, चूहा) जो पौधों से जुड़े हैं।

- मध्य से ऊपर: द्वितीयक उपभोक्ता (मेढक, सांप, छिपकली) जो टिड्डे और चूहे से जुड़े हैं।

- सबसे ऊपर: शीर्ष उपभोक्ता (बाज, चील) जो चूहे, सांप और मेढक सभी से तीरों द्वारा जुड़े हैं।

- तीर का सिरा भोजन खाने वाले जीव की ओर संकेत करता है।

परीक्षा में इसे एक साधारण, स्पष्ट रूप से लेबल किया हुआ चित्र बनाकर उत्तर दें।

प्रश्न 11.

हॉर्मोन्स क्या हैं ? मानव की अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा स्रावित होने वाले हॉर्मोन्स के कार्यों का विस्तार में वर्णन कीजिए।

उत्तर:

हॉर्मोन्स:

हॉर्मोन अंतःस्रावी ग्रंथियों (नलिकारहित ग्रंथियों) द्वारा स्रावित होने वाले जैव-रासायनिक संदेशवाहक होते हैं। ये सीधे रक्त में स्रावित होकर शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचते हैं तथा विभिन्न शारीरिक क्रियाओं, वृद्धि और उपापचय का नियंत्रण एवं नियमन करते हैं।

मानव की अंतःस्रावी ग्रंथियाँ एवं स्रावित हॉर्मोन्स के कार्य:

1. पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland):

- इसे मास्टर ग्रंथि भी कहते हैं।

- स्रावित हार्मोन: वृद्धि हार्मोन (GH)।

- कार्य: यह हड्डियों एवं मांसपेशियों की वृद्धि तथा शरीर के विकास का नियंत्रण करता है।

2. थाइरॉइड ग्रंथि (Thyroid Gland):

- स्रावित हार्मोन: थाइरॉक्सिन।

- कार्य: यह कार्बोहाइड्रेट, वसा तथा प्रोटीन के उपापचय को नियंत्रित करता है। इसके निर्माण के लिए आयोडीन आवश्यक है।

3. अग्न्याशय (Pancreas):

- स्रावित हार्मोन: इंसुलिन तथा ग्लुकागॉन।

- कार्य: इंसुलिन रक्त में शर्करा (ग्लूकोज) के स्तर को नियंत्रित करता है। इसकी कमी से मधुमेह (डायबिटीज) रोग होता है।

4. अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal Gland):

- स्रावित हार्मोन: एड्रिनेलिन।

- कार्य: यह आपातकालीन परिस्थितियों में हृदय स्पंदन दर तथा श्वसन दर बढ़ाकर शरीर को तनाव से निपटने में मदद करता है।

5. वृषण (Testes):

- स्रावित हार्मोन: टेस्टोस्टेरोन।

- कार्य: यह पुरुषों में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों (जैसे दाढ़ी-मूँछ आना) के विकास तथा शुक्राणु निर्माण को प्रेरित करता है।

6. अंडाशय (Ovary):

- स्रावित हार्मोन: एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरोन।

- कार्य: यह स्त्रियों में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों, मासिक धर्म चक्र तथा गर्भावस्था का नियंत्रण करते हैं।

प्रश्न 11 (अथवा).

निम्नलिखित में कॉलम-A तथा कॉलम-B को सही सुमेलित कीजिए :

कॉलम - A

I. कूटपाद

II. प्रकाश संश्लेषण

III. जठर ग्रंथियां

IV. वृक्क

V. ऊर्जा मुद्रा

VI. छुई मुई का पौधा

कॉलम - B

(A) उद्दीपन

(B) आमाशय

(C) ए०टी०पी०

(D) अमीबा

(E) क्लोरोफिल

(F) उत्सर्जन

उत्तर:

कॉलम-A तथा कॉलम-B का सही सुमेल इस प्रकार है:

I. कूटपाद ---> (D) अमीबा

II. प्रकाश संश्लेषण ---> (E) क्लोरोफिल

III. जठर ग्रंथियां ---> (B) आमाशय

IV. वृक्क ---> (F) उत्सर्जन

V. ऊर्जा मुद्रा ---> (C) ए०टी०पी०

VI. छुई मुई का पौधा ---> (A) उद्दीपन