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UP Board Class 10th Half Yearly Paper 2026

कक्षा 10वीं · हिंदी · 2026 · अर्धवार्षिक

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प्रश्न 1.

(बहुविकल्पीय)

'प्रायश्चित' किसकी रचना है?

(A) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

(B) रामधारी सिंह 'दिनकर'

(C) जयशंकर प्रसाद

(D) भगवती चरण वर्मा

उत्तर:

(D) भगवती चरण वर्मा

व्याख्या: 'प्रायश्चित' भगवती चरण वर्मा द्वारा रचित एक प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्यात्मक कहानी है।

प्रश्न 2.

(बहुविकल्पीय)

हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ निबन्धकार, आलोचक एवं इतिहासकार के रूप में जाने जाते हैं–

(A) बालकृष्ण भट्ट

(B) रामचन्द्र शुक्ल

(C) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

(D) इनमें से कोई नहीं

उत्तर:

(B) रामचन्द्र शुक्ल

व्याख्या: आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ निबंधकार, आलोचक तथा 'हिंदी साहित्य का इतिहास' के लेखक के रूप में जाने जाते हैं।

प्रश्न 3.

(बहुविकल्पीय)

'सागर की लहरों पर' किस विधा की रचना है?

(A) निबन्ध

(B) यात्रावृत्त

(C) आलोचना

(D) संस्मरण

उत्तर:

(B) यात्रावृत्त

व्याख्या: 'सागर की लहरों पर' डॉ. भगवतशरण उपाध्याय द्वारा लिखित प्रसिद्ध यात्रावृत्त है।

प्रश्न 4.

(बहुविकल्पीय)

महादेवी वर्मा द्वारा रचित निबन्ध है–

(A) रेती के फूल

(B) क्षणदा

(C) हंस

(D) उर्वशी

उत्तर:

(B) क्षणदा

व्याख्या: 'क्षणदा' महादेवी वर्मा जी का प्रसिद्ध ललित निबंध-संग्रह है।

प्रश्न 5.

(बहुविकल्पीय)

'धर्मयुग' के सम्पादक कौन थे?

(A) श्रीराम शर्मा

(B) प्रेमचन्द

(C) धर्मवीर भारती

(D) महादेवी वर्मा

उत्तर:

(C) धर्मवीर भारती

व्याख्या: डॉ. धर्मवीर भारती प्रसिद्ध हिंदी साप्ताहिक पत्रिका 'धर्मयुग' के यशस्वी संपादक थे।

प्रश्न 6.

(बहुविकल्पीय)

जयशंकर प्रसाद की रचना नहीं है–

(A) आँसू

(B) लहर

(C) झरना

(D) यामा

उत्तर:

(D) यामा

व्याख्या: 'यामा' महादेवी वर्मा की प्रसिद्ध काव्य-कृति है, जबकि 'आँसू', 'लहर' और 'झरना' जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ हैं।

प्रश्न 1.

(वर्णनात्मक)

निम्नलिखित गद्यांशों में से किसी एक पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–

(क) यह कोई बात नहीं कि एक ही स्वभाव और रुचि के लोगों में ही मित्रता हो सकती है। समाज में विभिन्नता देखकर लोग एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। जो गुण इसमें नहीं हैं, हम चाहते हैं कि कोई ऐसा मित्र मिले जिसमें वे गुण हों। चिन्ताशील मनुष्य प्रफुल्लित चित्त का साथ ढूँढ़ता है, निर्बल बली का, धीर उत्साही का।

(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(iii) व्यक्ति एक-दूसरे की ओर क्या देखकर आकर्षित होते हैं?

उत्तर:

(क):

(i) सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के गद्य-खण्ड में संकलित एवं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'मित्रता' नामक निबन्ध से उद्धृत है।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: लेखक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी कहते हैं कि मित्रता के लिए दो व्यक्तियों का स्वभाव और पसंद एक जैसी होना अनिवार्य नहीं है। समाज में लोग अपने से विपरीत या भिन्न गुणों वाले व्यक्तियों की ओर आकर्षित होते हैं, ताकि वे उन गुणों को अपने मित्र के संग से प्राप्त कर सकें। चिंताग्रस्त व्यक्ति सदैव प्रसन्नचित्त व्यक्ति का साथ खोजता है, दुर्बल व्यक्ति बलवान का और गंभीर व्यक्ति उत्साही व्यक्ति का संग चाहता है।

(iii) व्यक्ति समाज में अपने से भिन्न गुणों (विभिन्नता) को देखकर एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं।

अथवा

(ख) ईर्ष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है। जो व्यक्ति ईर्ष्यालु स्वभाव का है, उसे फालतू बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उसे यह भी पता लगाना चाहिए कि जिस अभाव के कारण वह ईर्ष्यालु बन गया है उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका क्या है। जिस दिन उसके भीतर यह जिज्ञासा आएगी, उसी दिन से वह ईर्ष्या करना कम कर देगा।

(i) प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(iii) मानसिक अनुशासन क्या है?

उत्तर (ख):

(i) सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के गद्य-खण्ड में संकलित एवं रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा लिखित 'ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से' नामक निबन्ध से उद्धृत है।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: लेखक का कथन है कि ईर्ष्या की भावना से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय अपने मन को अनुशासित करना है। ईर्ष्यालु व्यक्ति को व्यर्थ की बातों पर ध्यान देने के स्थान पर अपने भीतर की कमियों को पहचानना चाहिए और उनकी पूर्ति के लिए रचनात्मक प्रयास करने चाहिए।

(iii) व्यर्थ की बातों को न सोचकर अपने अभावों को दूर करने के लिए रचनात्मक तथा सकारात्मक मार्ग खोजना ही मानसिक अनुशासन है।

प्रश्न 2.

(वर्णनात्मक)

निम्नलिखित पद्यांशों में से किसी एक पद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–

(क) चरन-कमल बंदौं हरि राई।

जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे कौं सब कुछ दरसाइ।

बहिरौ सुनै, गूँगा पुनि बोलै, रंक चले सिर छत्र धराई।

सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तिहिं पाइ।

(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(iii) 'बार-बार बंदौं तिहिं पाइ' में कौन-सा अलंकार प्रयुक्त है?

उत्तर:

(क):

(i) सन्दर्भ: प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के काव्य-खण्ड में संकलित महाकवि सूरदास द्वारा रचित 'सूरसागर' महाकाव्य के 'पद' शीर्षक से उद्धृत है।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: भक्तिकवि सूरदास जी भगवान श्रीकृष्ण के कमल रूपी चरणों की महिमा का गान करते हुए कहते हैं कि प्रभु की कृपा से अत्यंत लँगड़ा व्यक्ति भी दुर्गम पर्वतों को पार कर लेता है और अंधे व्यक्ति को सब कुछ दिखाई देने लगता है। बहरा सुनने लगता है, गूँगा व्यक्ति पुनः बोलने लगता है तथा अत्यंत दरिद्र व्यक्ति भी राजा बनकर अपने सिर पर छत्र धारण कर लेता है।

(iii) 'बार-बार बंदौं तिहिं पाइ' में 'बार-बार' शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकार तथा अनुप्रास अलंकार है।

अथवा

(ख) मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।

जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मंझारन।

पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर-धारन।

जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी-कूल कदंब की डारन।

(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(iii) कवि रसखान स्वयं को किस गिरि का पत्थर बनाना चाहते हैं?

उत्तर (ख):

(i) सन्दर्भ: प्रस्तुत सवैया हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के काव्य-खण्ड में संकलित कवि रसखान द्वारा रचित 'रसखान ग्रंथावली' के 'सवैये' शीर्षक से उद्धृत है।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: कवि रसखान ब्रजभूमि के प्रति अपना असीम प्रेम प्रकट करते हुए कहते हैं कि यदि अगले जन्म में मुझे मनुष्य योनि मिले, तो मेरी इच्छा है कि मैं ब्रज के गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच ही निवास करूँ। यदि मैं पशु बनूँ तो इसमें मेरा कोई वश नहीं, फिर भी मैं नित्य नंद बाबा की गायों के बीच चरना चाहता हूँ।

(iii) कवि रसखान स्वयं को उसी गोवर्धन पर्वत (गिरि) का पत्थर बनाना चाहते हैं जिसे श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र का घमंड तोड़ने के लिए अपनी अँगुली पर छत्र के रूप में उठा लिया था।

प्रश्न 3.

(वर्णनात्मक)

निम्नलिखित संस्कृत गद्यांशों में से किसी एक गद्यांश का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए–

(क) इयं नगरी विविधधर्माणां सङ्गमस्थली। महात्मा बुद्धः तीथर्करः पार्श्वनाथः सङ्कराचार्यः कबीरः गोस्वामी तुलसीदासः अन्ये च बहवः महात्मानः अत्रागत्य स्वीयान् विचारान् प्रासारयन्। न केवलं दर्शने, साहित्ये, धर्मे, अपि तु कलाक्षेत्रेऽपि इयं नगरी विविधानां कलानां, शिल्पानाञ्च कृते लोके विश्रुता।

उत्तर:

(क):

सन्दर्भ: प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के संस्कृत-खण्ड के 'वाराणसी' पाठ से उद्धृत है।

हिन्दी अनुवाद: यह नगरी विविध धर्मों की संगमस्थली है। महात्मा बुद्ध, तीर्थंकर पार्श्वनाथ, शंकराचार्य, कबीर, गोस्वामी तुलसीदास और अन्य बहुत से महात्माओं ने यहाँ आकर अपने विचारों का प्रसार किया। न केवल दर्शन, साहित्य और धर्म में, बल्कि कला के क्षेत्र में भी यह नगरी विविध कलाओं और शिल्पों के लिए संसार में प्रसिद्ध है।

अथवा

(ख) पुरुराजः–आम्! राष्ट्रद्रोहः! यवनराज! एकम् इदं भारतं राष्ट्रं बहूनि चात्र राज्यानि, बहवश्च शासकाः। त्वं मैत्रीसन्धिना तान् विभज्य भारतं जेतुम् इच्छसि। आम्भीकः चास्य प्रत्यक्षं प्रमाणम्।

अलक्षेन्द्रः–भारतम् एकं राष्ट्रम् इति तव वचनं विरुद्धम्। इह तावत् राजानः जनाः च परस्परं द्रुह्यन्ति।

उत्तर (ख):

सन्दर्भ: प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के संस्कृत-खण्ड के 'वीरः वीरेण पूज्यते' पाठ से उद्धृत है।

हिन्दी अनुवाद:

पुरुराज: हाँ! राष्ट्रद्रोह! यवनराज! यह भारत एक राष्ट्र है और यहाँ बहुत से राज्य तथा कई शासक हैं। तुम मित्रता की संधि द्वारा उन्हें विभाजित करके भारत को जीतना चाहते हो। आम्भीक इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

सिकंदर: "भारत एक राष्ट्र है" - तुम्हारा यह कथन गलत है। यहाँ तो राजा और प्रजा आपस में परस्पर द्वेष करते हैं।

प्रश्न 4.

(वर्णनात्मक)

निम्नलिखित श्लोकों में से किसी एक श्लोक का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए–

(क) बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः।

उभयत्र समो वीरः वीरभावो हि वीरता॥

उत्तर:

(क):

सन्दर्भ: प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के संस्कृत-खण्ड के 'वीरः वीरेण पूज्यते' पाठ से उद्धृत है।

हिन्दी अनुवाद: बंधन हो अथवा मरण हो, जीत हो अथवा हार हो; वीर पुरुष दोनों ही स्थितियों में समान रहता है। वीर भावना को ही वीरता कहते हैं।

अथवा

(ख) हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।

निराशीर्निर्ममो भूत्वा युद्धस्व विगतज्वरः॥

उत्तर (ख):

सन्दर्भ: प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के संस्कृत-खण्ड के 'वीरः वीरेण पूज्यते' पाठ से उद्धृत है।

हिन्दी अनुवाद: यदि युद्ध में मारे गए तो स्वर्ग प्राप्त करोगे और यदि जीत गए तो पृथ्वी के साम्राज्य का उपभोग करोगे। इसलिए इच्छा-रहित, ममता-रहित और संताप-रहित होकर युद्ध करो।

प्रश्न 5.

(वर्णनात्मक)

स्वपाठित 'खण्डकाव्य' के महानायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर:

स्वपाठित खण्डकाव्य 'मेवाड़-मुकुट' के महानायक 'महाराणा प्रताप' का चरित्र-चित्रण:

गौतम देव द्वारा रचित खण्डकाव्य 'मेवाड़-मुकुट' के महानायक मेवाड़ के स्वाभिमानी नरेश महाराणा प्रताप हैं। उनके चरित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

1. महान देशभक्त एवं स्वाभिमानी: महाराणा प्रताप देशभक्ति की साक्षात मूर्ति हैं। अकबर की विशाल सेना से पराजित होने के बाद भी उन्होंने पराधीनता स्वीकार नहीं की और जंगलों में भटकना स्वीकार किया।

2. धीर एवं वीर योद्धा: वे एक अद्वितीय वीर योद्धा हैं। संकट की घड़ी में भी वे अपना धैर्य नहीं खोते।

3. उदार एवं मानवीय दृष्टिकोण: वे शत्रु पक्ष की स्त्रियों के प्रति भी आदर एवं सम्मान का भाव रखते हैं।

4. दृढप्रतिज्ञ: वे प्रतिज्ञाबद्ध हैं कि जब तक वे मेवाड़ को पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं करा लेते, तब तक सुख-सुविधाओं का त्याग करेंगे।

अथवा

स्वपाठित 'खण्डकाव्य' के पंचम सर्ग का कथासार लिखिए।

उत्तर:

स्वपाठित खण्डकाव्य 'मेवाड़-मुकुट' के पंचम सर्ग ('चिन्ता सर्ग') का कथासार:

1. अरावली के जंगलों में निवास करते हुए महाराणा प्रताप मेवाड़ की दुर्दशा और अपनी साधनहीनता को लेकर अत्यधिक चिंतित हैं।

2. वे विचार करते हैं कि क्या वे मेवाड़ को पुनः स्वतंत्र करा सकेंगे। उनकी यह चिंता उनकी अगाध देशभक्ति को दर्शाती है।

3. उसी समय उनके निष्ठावान मंत्री भामाशाह का आगमन होता है। भामाशाह अपनी संचित अपार धनराशि महाराणा प्रताप के चरणों में समर्पित कर देते हैं।

4. इस धनराशि की सहायता से महाराणा प्रताप पुनः विशाल सेना का संगठन करते हैं और मेवाड़ की मुक्ति के लिए नव-उत्साह के साथ तत्पर हो जाते हैं।

प्रश्न 6.

(वर्णनात्मक)

(क) निम्नलिखित लेखकों में से किसी एक लेखक का जीवन-परिचय देते हुए उनकी किन्हीं दो रचनाओं का उल्लेख कीजिए–

(i) जयशंकर प्रसाद

(ii) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

(iii) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद

उत्तर:

(क):

(i) जयशंकर प्रसाद:

जीवन-परिचय: छायावाद के प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद का जन्म संवत् 1946 (सन् 1889 ई.) में काशी के प्रसिद्ध 'सुँघनी साहू' परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम देवीप्रसाद था। बाल्यावस्था में ही माता-पिता का देहावसान हो जाने के कारण इनकी शिक्षा का प्रबंध घर पर ही हुआ। इन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी और फारसी का गहन अध्ययन किया। अल्पायु में क्षयरोग से पीड़ित होने के कारण सन् 1937 ई. में इनका निधन हो गया।

दो रचनाएँ: (1) कामायनी (2) चन्द्रगुप्त।

(ii) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी:

जीवन-परिचय: प्रसिद्ध निबंधकार एवं संपादक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म सन् 1894 ई. में छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव में हुआ था। इन्होंने 'सरस्वती' पत्रिका का कुशल संपादन किया। इनकी रचनाओं में विचारशीलता और रोचकता का अद्भुत मिश्रण है। सन् 1971 ई. में इनका निधन हो गया।

दो रचनाएँ: (1) पंचपात्र (2) मकरंद बिंदु।

(iii) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद:

जीवन-परिचय: भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ० राजेन्द्र प्रसाद का जन्म बिहार राज्य के सारन जिले के जीरादेई गाँव में सन् 1884 ई. में हुआ था। इन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे एक उच्च कोटि के देशभक्त, सादा जीवन उच्च विचार के समर्थक एवं मेधावी विद्वान थे। सन् 1963 ई. में इनका देहावसान हुआ।

दो रचनाएँ: (1) मेरी आत्मकथा (2) भारतीय शिक्षा।

(ख) निम्नलिखित कवियों में से किसी एक कवि का जीवन-परिचय देते हुए उनकी किन्हीं दो रचनाओं का उल्लेख कीजिए–

(i) रसखान

(ii) बिहारी

(iii) मैथिलीशरण गुप्त

उत्तर (ख):

(i) रसखान:

जीवन-परिचय: कृष्णभक्त मुस्लिम कवि रसखान का जन्म सन् 1548 ई. के आसपास दिल्ली के समीप हुआ था। इनका वास्तविक नाम सैयद इब्राहिम था। ये गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के शिष्य बने और ब्रजभूमि में रहकर श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन हो गए। इनकी रचनाओं में सरस ब्रजभाषा का सुंदर प्रयोग हुआ है। सन् 1628 ई. के आसपास इनका निधन हो गया।

दो रचनाएँ: (1) सुजान रसखान (2) प्रेम-वाटिका।

(ii) बिहारी:

जीवन-परिचय: रीतिकाल के महान कवि बिहारीलाल का जन्म सन् 1595 ई. के लगभग ग्वालियर के पास बसुआ गोविंदपुर गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम केशवराय था। ये जयपुर के राजा जयसिंह के आश्रित कवि थे। इन्होंने केवल एक ग्रंथ 'बिहारी सतसई' की रचना की जिसमें 719 दोहे हैं। सन् 1663 ई. में इनका निधन हुआ।

दो रचनाएँ: (1) बिहारी सतसई (2) भक्ति एवं नीति के दोहे।

(iii) मैथिलीशरण गुप्त:

जीवन-परिचय: राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म सन् 1886 ई. में उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के चिरगाँव में हुआ था। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से इन्होंने खड़ी बोली में काव्य-रचना की। भारत सरकार ने इन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि और 'पद्मभूषण' से अलंकृत किया। सन् 1964 ई. में इनका निधन हो गया।

दो रचनाएँ: (1) साकेत (2) भारत-भारती।

प्रश्न 7.

7. सूफी काव्यधारा के कवि हैं–

(A) जायसी

(B) रैदास

(C) नानक

(D) सूरदास

उत्तर:

सही विकल्प: (A) जायसी

व्याख्या: मलिक मोहम्मद जायसी सूफी काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं।

प्रश्न 8.

8. छायावादी युग की रचना है–

(A) प्रेम-माधुरी

(B) उद्धव-शतक

(C) चित्राधार

(D) सारंगधर

उत्तर:

सही विकल्प: (C) चित्राधार

व्याख्या: 'चित्राधार' छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद की प्रारंभिक रचना है।

प्रश्न 9.

9. 'वैदेही बनवास' के रचनाकार हैं–

(A) शान्तिप्रिय कवि द्विवेदी

(B) अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

(C) रामचरित उपाध्याय

(D) सियारामशरण गुप्त

उत्तर:

सही विकल्प: (B) अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

व्याख्या: 'वैदेही बनवास' अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' द्वारा रचित प्रसिद्ध काव्य है।

प्रश्न 10.

10. धर्मवीर भारती ने लिखा है–

(A) अणिमा

(B) अपरा

(C) अन्धा-युग

(D) अर्चना

उत्तर:

सही विकल्प: (C) अन्धा-युग

व्याख्या: 'अन्धा-युग' धर्मवीर भारती द्वारा रचित प्रसिद्ध गीतिनाट्य है।

प्रश्न 11.

11. शोक किस रस का स्थायी भाव है–

(A) रौद्र रस

(B) वीभत्स रस

(C) भयानक रस

(D) करुण रस

उत्तर:

सही विकल्प: (D) करुण रस

व्याख्या: करुण रस का स्थायी भाव शोक होता है।

प्रश्न 12.

12. 'निर्मल तेरा नीर अमृत के सम उत्तम है।' पंक्ति में अलंकार है–

(A) रूपक

(B) उपमा

(C) यमक

(D) अनुप्रास

उत्तर:

सही विकल्प: (B) उपमा

व्याख्या: यहाँ 'नीर' (जल) की तुलना 'सम' शब्द का प्रयोग करके अमृत से की गई है, अतः इसमें उपमा अलंकार है।

प्रश्न 13.

रोला किस प्रकार का छन्द है?

(A) सममात्रिक

(B) अर्द्धसममात्रिक

(C) विषम मात्रिक

(D) वर्णिक छन्द

उत्तर:

(A) सममात्रिक

व्याख्या: रोला एक सममात्रिक छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं।

प्रश्न 14.

'सुगठित' शब्द में उपसर्ग है–

(A) स

(B) सु

(C) सुग

(D) गठित

उत्तर:

(B) सु

व्याख्या: 'सुगठित' शब्द 'सु' उपसर्ग और 'गठित' मूल शब्द के योग से बना है।

प्रश्न 15.

'वेद-पुराण' में समास है–

(A) द्विगु

(B) द्वन्द्व

(C) कर्मधारय

(D) तत्पुरुष

उत्तर:

(B) द्वन्द्व

व्याख्या: 'वेद-पुराण' का समास विग्रह 'वेद और पुराण' होता है, जिसमें दोनों पद प्रधान होने से द्वन्द्व समास है।

प्रश्न 16.

'कोकिल' का तद्भव है–

(A) कुक्कुट

(B) कुक्कर

(C) कोयल

(D) कोयला

उत्तर:

(C) कोयल

व्याख्या: तत्सम शब्द 'कोकिल' का तद्भव रूप 'कोयल' होता है।

प्रश्न 17.

'ताभिः' किस विभक्ति व वचन का रूप है–

(A) प्रथमा विभक्ति एकवचन

(B) तृतीया विभक्ति बहुवचन

(C) चतुर्थी विभक्ति एकवचन

(D) षष्ठी विभक्ति एकवचन

उत्तर:

(B) तृतीया विभक्ति बहुवचन

व्याख्या: संस्कृत व्याकरण में 'तद्' (स्त्रीलिंग) सर्वनाम रूप के अन्तर्गत 'ताभिः' तृतीया विभक्ति, बहुवचन का रूप है।

प्रश्न 18.

जिस वाक्य में एक ही मुख्य क्रिया होती है, उसे कहते हैं–

(A) सरल वाक्य

(B) संयुक्त वाक्य

(C) मिश्र वाक्य

(D) उप वाक्य

उत्तर:

(A) सरल वाक्य

व्याख्या: जिस वाक्य में एक ही उद्देश्य, एक ही विधेय तथा एक ही मुख्य क्रिया होती है, उसे सरल (साधारण) वाक्य कहते हैं।

प्रश्न 19.

19. वाच्य का भेद नहीं है–

(A) कर्तृवाच्य

(B) भाववाच्य

(C) कर्मवाच्य

(D) क्रियावाच्य

उत्तर:

(D) क्रियावाच्य

व्याख्या: हिन्दी व्याकरण में वाच्य के मुख्य तीन भेद होते हैं - कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य तथा भाववाच्य। 'क्रियावाच्य' वाच्य का भेद नहीं है।

प्रश्न 20.

20. हिन्दी में पदों की संख्या है–

(A) चार

(B) छह

(C) आठ

(D) सात

उत्तर:

(C) आठ

व्याख्या: हिन्दी व्याकरण में पद (शब्द-भेद) आठ प्रकार के होते हैं: संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक और विस्मयादिबोधक।

प्रश्न 1.

1. निम्नलिखित गद्यांशों में से किसी एक पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–

(क) यह कोई बात नहीं कि एक ही स्वभाव और रुचि के लोगों में ही मित्रता हो सकती है। समाज में विभिन्नता देखकर लोग एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। जो गुण इसमें नहीं हैं, हम चाहते हैं कि कोई ऐसा मित्र मिले जिसमें वे गुण हों। चिन्ताशील मनुष्य प्रफुल्लित चित्त का साथ ढूँढ़ता है, निर्बल बली का, धीर उत्साही का।

(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(iii) व्यक्ति एक-दूसरे की ओर क्या देखकर आकर्षित होते हैं?

उत्तर:

(क)

(i) सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के गद्य-खण्ड में संकलित 'मित्रता' नामक निबंध से उद्धृत है। इसके लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी कहते हैं कि मित्रता के लिए केवल समान स्वभाव और समान रुचि का होना ही अनिवार्य नहीं है। समाज में लोग अपने से भिन्न गुणों वाले व्यक्तियों की ओर भी आकर्षित होते हैं। व्यक्ति में जिन गुणों की कमी होती है, वह ऐसे मित्र की तलाश करता है जिसमें वे गुण विद्यमान हों, ताकि वह उससे प्रेरणा और सहयोग प्राप्त कर सके। उदाहरण के लिए, चिंता से ग्रस्त मनुष्य प्रसन्नचित्त व्यक्ति का साथ ढूँढ़ता है, निर्बल व्यक्ति बलवान का तथा धैर्यवान व्यक्ति उत्साही मित्र का संग पाना चाहता है।

(iii) उत्तर: व्यक्ति समाज में विभिन्नता तथा अपने अंदर अभाव वाले गुणों को दूसरे व्यक्ति में देखकर उसकी ओर आकर्षित होते हैं।

अथवा

(ख) ईर्ष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है। जो व्यक्ति ईर्ष्यालु स्वभाव का है, उसे फालतू बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उसे यह भी पता लगाना चाहिए कि जिस अभाव के कारण वह ईर्ष्यालु बन गया है उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका क्या है। जिस दिन उसके भीतर यह जिज्ञासा आएगी, उसी दिन से वह ईर्ष्या करना कम कर देगा।

(i) प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(iii) मानसिक अनुशासन क्या है?

उत्तर:

(ख)

(i) सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के गद्य-खण्ड में संकलित 'ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से' नामक पाठ से अवतरित है। इसके लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: लेखक का मत है कि ईर्ष्या जैसी नकारात्मक मनोवृत्ति से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय अपने मस्तिष्क को अनुशासित रखना है। ईर्ष्यालु व्यक्ति को व्यर्थ और निरर्थक चिंतन त्याग देना चाहिए। उसे निष्पक्ष होकर अपनी कमी या अभाव का पता लगाना चाहिए और उसे दूर करने के लिए रचनात्मक तथा सकारात्मक मार्ग अपनाना चाहिए।

(iii) उत्तर: मानसिक अनुशासन का अर्थ है अपने मन और चिंतन को व्यर्थ की ईर्ष्या व नकारात्मक बातों से हटाकर आत्म-नियंत्रण तथा रचनात्मक कार्यों की ओर लगाना।

प्रश्न 2.

2. निम्नलिखित पद्यांशों में से किसी एक पद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–

(क) चरन-कमल बंदौं हरि राई।

जाकी कृपा पंगु गिरिं लंघै, अंधे कौं सब कुछ दरसाइ।

बहिरौ सुनै, गूँगा पुनि बोलै, रंक चले सिर छत्र धराई।

सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तिहिं पाइ।

(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(iii) 'बार-बार बंदौं तिहिं पाइ' में कौन-सा अलंकार प्रयुक्त है?

उत्तर:

(क)

(i) सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के काव्य-खण्ड में संकलित महाकवि सूरदास द्वारा रचित 'पद' शीर्षक से उद्धृत है।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: भक्तिकाल के शिरोमणि कवि सूरदास जी श्रीहरि के कमल रूपी चरणों की वंदना करते हुए कहते हैं कि प्रभु की कृपा से लँगड़ा व्यक्ति भी विशाल पर्वत को लाँघ जाता है और अंधे व्यक्ति को सब कुछ दिखाई देने लगता है। प्रभु की असीम अनुकंपा से बहरा सुनने लगता है, गूँगा पुनः बोलने लगता है तथा अत्यंत निर्धन व्यक्ति भी राजा बनकर अपने सिर पर छत्र धारण कर लेता है।

(iii) उत्तर: 'बार-बार बंदौं तिहिं पाइ' में 'बार-बार' शब्द की पुनरावृत्ति के कारण पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार तथा वर्णों की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार प्रयुक्त है।

अथवा

(ख) मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।

जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मंझारन।

पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर-धारन।

जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी-कूल कदंब की डारन।

(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(iii) कवि रसखान स्वयं को किस गिरि का पत्थर बनाना चाहते हैं?

उत्तर:

(ख)

(i) सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के काव्य-खण्ड में संकलित कविरत्न रसखान द्वारा रचित 'सवैये' शीर्षक से उद्धृत है।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: कवि रसखान ब्रजभूमि तथा श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति प्रकट करते हुए कहते हैं कि यदि अगले जन्म में मुझे मनुष्य का शरीर मिले, तो मेरी इच्छा है कि मैं ब्रज के गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच ही निवास करूँ। यदि मैं पशु योनि में जन्म लूँ, जिस पर मेरा कोई वश नहीं है, तो भी मेरी यही कामना है कि मैं प्रतिदिन नंद बाबा की गायों के बीच चरा करूँ।

(iii) उत्तर: कवि रसखान स्वयं को उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनाना चाहते हैं जिसे श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र का अहंकार तोड़ने और गोकुलवासियों की रक्षा के लिए छत्र के रूप में अपनी उंगली पर उठाया था।

प्रश्न 3.

3. निम्नलिखित संस्कृत गद्यांशों में से किसी एक गद्यांश का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए–

(क) इयं नगरी विविधधर्माणां सङ्गमस्थली। महात्मा बुद्धः तीर्थकरः पार्श्वनाथः शङ्कराचार्यः कबीरः गोस्वामी तुलसीदासः अन्ये च बहवः महात्मानः अत्रागत्य स्वीयान् विचारान् प्रासारयन्। न केवलं दर्शने, साहित्ये, धर्मे, अपि तु कलाक्षेत्रेऽपि इयं नगरी विविधानां कलानां, शिल्पानाञ्च कृते लोके विश्रुता।

उत्तर:

(क)

सन्दर्भ: प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के 'संस्कृत-खण्ड' के 'वाराणसी' पाठ से उद्धृत है।

अनुवाद: यह नगरी (वाराणसी) विविध धर्मों की संगमस्थली है। महात्मा बुद्ध, तीर्थंकर पार्श्वनाथ, शंकराचार्य, कबीर, गोस्वामी तुलसीदास और अन्य बहुत-से महात्माओं ने यहाँ आकर अपने विचारों का प्रसार किया। न केवल दर्शन, साहित्य और धर्म में, अपितु कला के क्षेत्र में भी यह नगरी विविध कलाओं और शिल्पों के लिए संसार में प्रसिद्ध है।

अथवा

(ख) पुरुराजः–आम्! राष्ट्रद्रोहः! यवनराज! एकम् इदं भारतं राष्ट्रं बहूनि चात्र राज्यानि, बहवश्च शासकाः। त्वं मैत्रीसन्धिना तान् विभज्य भारतं जेतुम् इच्छसि। आम्भीकः चास्य प्रत्यक्षं प्रमाणम्।

अलक्षेन्द्रः–भारतम् एकं राष्ट्रम् इति तव वचनं विरुद्धम्। इह तावत् राजानः जनाः च परस्परं द्रुह्यन्ति।

उत्तर:

(ख)

सन्दर्भ: प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के 'संस्कृत-खण्ड' के 'वीरः वीरेण पूज्यते' पाठ से उद्धृत है।

अनुवाद:

पुरुराज: हाँ! राष्ट्रद्रोह, यवनराज! यह भारत एक राष्ट्र है और यहाँ बहुत-से राज्य तथा बहुत-से शासक हैं। तुम मित्रता की संधि द्वारा उन्हें विभाजित करके भारत को जीतने की इच्छा रखते हो। आम्भीक इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

सिकंदर (अलक्षेन्द्र): 'भारत एक राष्ट्र है' - तुम्हारा यह कथन तर्कहीन है। यहाँ के राजा और प्रजा आपस में परस्पर द्वेष (शत्रुता) करते हैं।

प्रश्न 4.

4. निम्नलिखित श्लोकों में से किसी एक श्लोक का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए–

(क) बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः।

उभयत्र समो वीरः वीरभावो हि वीरता॥

उत्तर:

(क)

सन्दर्भ: प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के 'संस्कृत-खण्ड' के 'वीरः वीरेण पूज्यते' पाठ से अवतरित है।

अनुवाद: बंधन हो अथवा मृत्यु हो, विजय हो अथवा पराजय हो; वीर पुरुष दोनों ही स्थितियों में समान (अप्रभावित) रहता है। वीर भाव (समानता एवं निर्भीकता की भावना) को ही वीरता कहते हैं।

अथवा

(ख) हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।

निराशीर्निर्ममो भूत्वा युद्धस्व विगतज्वरः॥

उत्तर:

(ख)

सन्दर्भ: प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी' के 'संस्कृत-खण्ड' के 'वीरः वीरेण पूज्यते' पाठ के अंतर्गत गीता-उपदेश प्रसंग से अवतरित है।

अनुवाद: (श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं अथवा पुरुराज सिकंदर से कहता है कि) यदि तुम युद्ध में मारे गए तो स्वर्ग प्राप्त करोगे और यदि जीत गए तो पृथ्वी के साम्राज्य का उपभोग करोगे। अतः तुम इच्छारहित, मोहरहित और संतापरहित होकर युद्ध करो।

प्रश्न 5.

स्वपठित 'खण्डकाव्य' के महानायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।

अथवा

स्वपठित 'खण्डकाव्य' के पंचम सर्ग का कथासार लिखिए।

उत्तर:

('मेवाड़-मुकुट' खण्डकाव्य के आधार पर उत्तर)

'मेवाड़-मुकुट' खण्डकाव्य के महानायक महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण:

महाराणा प्रताप 'मेवाड़-मुकुट' खण्डकाव्य के मुख्य नायक हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

1. महान देशभक्त और स्वाभिमानी: महाराणा प्रताप देशप्रेमी और परम स्वाभिमानी वीर हैं। वे अकबर की अधीनता स्वीकार करने की अपेक्षा जंगलों में भटकना तथा कष्ट सहना सहर्ष स्वीकार करते हैं।

2. महान सेनानी और धैर्यशील: वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपना धैर्य नहीं खोते। अरावली की गुफाओं में भटकते हुए भी वे मेवाड़ को स्वतंत्र कराने का दृढ़ संकल्प रखते हैं।

3. जन-नायक तथा उदार हृदय: वे अपनी प्रजा तथा सैनिकों से अगाध प्रेम करते हैं। भामाशाह द्वारा धन समर्पित किए जाने पर वे उनके प्रति अपार कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

4. कर्तव्यपरायण और दृढ़निश्चयी: महाराणा प्रताप अपने कर्तव्य के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं। वे अंतिम सांस तक स्वतंत्रता संग्राम जारी रखने का प्रण लेते हैं।

अथवा

'मेवाड़-मुकुट' खण्डकाव्य के पंचम सर्ग (चिन्ता) का कथासार:

पंचम सर्ग का नाम 'चिन्ता' है। अरावली की जनहीन गुफा में महाराणा प्रताप अत्यन्त चिन्तित अवस्था में बैठे हैं। उन्हें अपने देश मेवाड़ की पराधीनता, अपने परिवार के कष्टों और साधनों की कमी का गहरा दुख है। वे सोचते हैं कि क्या उन्हें अब आगे युद्ध स्थगित कर देना चाहिए, परन्तु उनका स्वाभिमानी मन पराजय स्वीकार करने को तैयार नहीं होता।

इसी चिन्ता में वे विचार करते हैं कि स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्राणों की बलि देना ही श्रेष्ठ मार्ग है। वे निश्चय करते हैं कि वे अंतिम श्वास तक मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते रहेंगे और अपनी मातृभूमि को पराधीन नहीं होने देंगे। इस सर्ग में महाराणा प्रताप के अंतर्द्वंद्व और उनके अचल राष्ट्रप्रेम का अत्यन्त मार्मिक एवं ओजस्वी चित्रण किया गया है।

प्रश्न 6.

(क) निम्नलिखित लेखकों में से किसी एक लेखक का जीवन-परिचय देते हुए उनकी किन्हीं दो रचनाओं का उल्लेख कीजिए–

(i) जयशंकर प्रसाद

(ii) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

(iii) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद

उत्तर:

(i) जयशंकर प्रसाद का जीवन-परिचय एवं रचनाएँ:

जीवन-परिचय:

छायावाद के प्रवर्तक महाकवि जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के प्रसिद्ध वैश्य परिवार में सन् 1889 ई० में हुआ था। इनके पिता का नाम देवीप्रसाद था। बाल्यावस्था में ही इनके पिता तथा भ्राता का देहांत हो गया, जिससे गृह-स्थली का सारा भार इन पर आ पड़ा। इन्होंने घर पर ही स्वाध्याय से संस्कृत, हिंदी, फारसी और अंग्रेजी का ज्ञान अर्जित किया। प्रसाद जी का स्वभाव सरल, स्वाभिमानी तथा हंसमुख था। सन् 1937 ई० में क्षयरोग से पीड़ित होकर इनका देहावसान हो गया।

दो प्रमुख रचनाएँ:

1. चन्द्रगुप्त (नाटक)

2. तितली (उपन्यास)

(ii) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जीवन-परिचय एवं रचनाएँ:

जीवन-परिचय:

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म सन् 1894 ई० में छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव में हुआ था। इनके पिता पुन्नालाल बख्शी साहित्य प्रेमी थे। बख्शी जी ने बी० ए० तक शिक्षा प्राप्त की और अध्यापन कार्य किया। वे प्रसिद्ध पत्रिका 'सरस्वती' के कुशल संपादक रहे। इन्होंने निबंध, आलोचना तथा कहानियों के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया। इनका निधन सन् 1971 ई० में हुआ।

दो प्रमुख रचनाएँ:

1. पंचपात्र (निबंध संग्रह)

2. कुछ बिखरे पन्ने (निबंध संग्रह)

(iii) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद का जीवन-परिचय एवं रचनाएँ:

जीवन-परिचय:

भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ० राजेन्द्र प्रसाद का जन्म बिहार राज्य के छपरा जिले के जीरादेई नामक ग्राम में सन् 1884 ई० में हुआ था। इन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम० ए० और एल-एल० एम० की परीक्षा उत्तीर्ण की। वे उच्च कोटि के मेधावी छात्र थे। गांधी जी से प्रभावित होकर वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। वे भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष बने और स्वतंत्रता के बाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया। सन् 1963 ई० में इनका देहावसान हो गया।

दो प्रमुख रचनाएँ:

1. मेरी आत्मकथा

2. भारतीय शिक्षा

(ख) निम्नलिखित कवियों में से किसी एक कवि का जीवन-परिचय देते हुए उनकी किन्हीं दो रचनाओं का उल्लेख कीजिए–

(i) रसखान

(ii) बिहारी

(iii) मैथिलीशरण गुप्त

उत्तर:

(i) रसखान का जीवन-परिचय एवं रचनाएँ:

जीवन-परिचय:

कृष्णभक्त कवि रसखान का जन्म सन् 1548 ई० के लगभग दिल्ली के पास हुआ था। इनका वास्तविक नाम सैयद इब्राहिम था। ये जाति के पठान थे। गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से दीक्षा लेकर ये ब्रजभूमि में रहने लगे और सर्वस्व श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया। इनकी भाषा सरस, मधुर और प्रभावपूर्ण ब्रजभाषा है। सन् 1628 ई० के लगभग इनका निधन हो गया।

दो प्रमुख रचनाएँ:

1. सुजान रसखान

2. प्रेम-वाटिका

(ii) बिहारी का जीवन-परिचय एवं रचनाएँ:

जीवन-परिचय:

रीतिकाल के महान कवि बिहारीलाल का जन्म सन् 1595 ई० के लगभग ग्वालियर में हुआ था। इनके पिता का नाम केशवराय था। इनका बाल्यकाल बुंदेलखंड में बीता और युवावस्था मथुरा में। ये जयपुर के राजा जयसिंह के आश्रित कवि थे। बिहारी जी ने केवल एक ग्रन्थ 'बिहारी सतसई' की रचना की, जिसमें 719 दोहे हैं। गागर में सागर भरने वाले इस महान कवि का निधन सन् 1663 ई० में हुआ।

दो प्रमुख रचनाएँ:

1. बिहारी सतसई (मुख्य ग्रन्थ)

2. सतसई के दोहे

(iii) मैथिलीशरण गुप्त का जीवन-परिचय एवं रचनाएँ:

जीवन-परिचय:

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के चिरगाँव में सन् 1886 ई० में हुआ था। इनके पिता सेठ रामचरण गुप्त साहित्य अनुरागी थे। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से इन्होंने खड़ी बोली में काव्य रचना प्रारंभ की। भारत सरकार ने इन्हें 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया तथा ये राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे। सन् 1964 ई० में इस महान राष्ट्रकवि का देहावसान हो गया।

दो प्रमुख रचनाएँ:

1. साकेत (महाकाव्य)

2. भारत-भारती

प्रश्न 7.

अपनी पाठ्यपुस्तक से कण्ठस्थ किया हुआ एक श्लोक लिखिए, जो इस प्रश्न-पत्र में न आया हो।

उत्तर:

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥

प्रश्न 8.

विद्यालय में खेल का सामान उपलब्ध कराने हेतु प्रधानाचार्य को एक प्रार्थना-पत्र लिखिए।

अथवा

सहायक अध्यापक के पद हेतु एक आवेदन-पत्र लिखिए।

उत्तर:

सेवा में,

श्रीमान प्रधानाचार्य महोदय,

राजकीय इंटर कॉलेज,

मेरठ (उत्तर प्रदेश)।

विषय: खेल का सामान उपलब्ध कराने हेतु प्रार्थना-पत्र।

महोदय,

सविनय निवेदन यह है कि मैं आपके विद्यालय की कक्षा 10 का छात्र प्रतिनिधि हूँ। हमारे विद्यालय के छात्र खेलों में अत्यधिक रुचि रखते हैं, किन्तु वर्तमान में खेल विभाग में पर्याप्त खेल सामग्री उपलब्ध नहीं है। पुरानी सामग्री टूट-फूट गई है, जिससे क्रिकेट, फुटबॉल तथा वॉलीबॉल का अभ्यास सुचारु रूप से नहीं हो पा रहा है।

शीघ्र ही अंतर्विद्यालयी खेल प्रतियोगिताएँ आयोजित होने वाली हैं। अतः आपसे विनम्र प्रार्थना है कि छात्रों के उज्ज्वल भविष्य तथा खेल अभ्यास हेतु खेलकूद की नई सामग्री (जैसे- क्रिकेट किट, फुटबॉल, वॉलीबॉल, नेट एवं बैडमिंटन) शीघ्र उपलब्ध कराने की कृपा करें।

इसके लिए हम सभी छात्र आपके सदैव आभारी रहेंगे।

सधन्यवाद।

दिनांक: 15 अक्टूबर 2025

भवदीय,

कक्षा-प्रतिनिधि एवं समस्त छात्र

कक्षा-10

राजकीय इंटर कॉलेज, मेरठ।

अथवा

सहायक अध्यापक के पद हेतु आवेदन-पत्र:

सेवा में,

प्रबंधक महोदय,

सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज,

वाराणसी (उत्तर प्रदेश)।

विषय: सहायक अध्यापक (हिंदी) पद हेतु आवेदन-पत्र।

महोदय,

दिनांक 10 अक्टूबर 2025 के 'दैनिक समाचार पत्र' में प्रकाशित आपके विज्ञापन के माध्यम से मुझे ज्ञात हुआ है कि आपके विद्यालय में 'सहायक अध्यापक (हिंदी)' का एक पद रिक्त है। मैं इस पद हेतु अपना आवेदन-पत्र आपकी सेवा में प्रेषित कर रहा हूँ। मेरी शैक्षणिक तथा अन्य योग्यताओं का विवरण निम्नवत् है:

1. नाम: विवेक शर्मा

2. पिता का नाम: श्री रामेश्वर शर्मा

3. जन्म तिथि: 12 अगस्त 1998

4. शैक्षणिक योग्यताएँ:

- हाईस्कूल: उत्तर प्रदेश बोर्ड (2014) - प्रथम श्रेणी

- इण्टरमीडिएट: उत्तर प्रदेश बोर्ड (2016) - प्रथम श्रेणी

- बी० ए० (हिंदी/संस्कृत): काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (2019) - प्रथम श्रेणी

- एम० ए० (हिंदी): काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (2021) - प्रथम श्रेणी

- बी० एड०: महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ (2023) - प्रथम श्रेणी

5. अनुभव: दो वर्ष का शिक्षण अनुभव।

मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यदि मुझे अवसर प्रदान किया गया, तो मैं अपने कार्य एवं निष्ठा से आपको पूर्णतः संतुष्ट रखूँगा।

संलग्नक: समस्त शैक्षणिक प्रमाण-पत्रों की छायाप्रतियाँ।

दिनांक: 15 अक्टूबर 2025

भवदीय,

विवेक शर्मा

पता: B-12, लंका, वाराणसी।

प्रश्न 9.

निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए–

(i) वाराणसी नगरी कस्याः नद्याः कूले स्थिता?

(ii) वीरः केन पूज्यते?

(iii) गीतायाः कः सन्देशः?

(iv) चन्द्रशेखरः स्वनाम किम् अकथयत्?

उत्तर:

(i) वाराणसी नगरी गङ्गायाः नद्याः कूले स्थिता।

(ii) वीरः वीरेण पूज्यते।

(iii) 'हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्' इति गीतायाः सन्देशः अस्ति।

(iv) चन्द्रशेखरः स्वनाम 'आजादः' इति अकथयत्।

प्रश्न 10.

10. निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर हिन्दी में निबन्ध लिखिए–

(i) अनुशासन की समस्या

(ii) जनसंख्या-विस्फोट–कारण एवं निवारण

(iii) पर्यावरण सुरक्षा

(iv) आतंकवाद

उत्तर:

(i) अनुशासन की समस्या

1. प्रस्तावना:

जीवन को सुचारु, व्यवस्थित तथा गरिमामय बनाने के लिए अनुशासन अत्यंत आवश्यक है। अनुशासन शब्द दो शब्दों 'अनु' और 'शासन' के मेल से बना है, जिसका अर्थ है नियमों का पालन करते हुए नियंत्रण में रहना। वर्तमान समाज में विद्यार्थियों तथा युवाओं में बढ़ती अनुशासनहीनता एक गंभीर चिंताओं का विषय बन चुकी है।

2. अनुशासन का अर्थ एवं महत्व:

अनुशासन का तात्पर्य अपने मन, वाणी तथा आचरण को नियंत्रित कर समाज और राष्ट्र के नियमों का पालन करना है। प्रकृति भी अनुशासन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है। सूर्य, चंद्रमा तथा ऋतुएँ सभी समय पर और नियमानुसार कार्य करते हैं। जिस प्रकार बिना पतवार के नाव दिशाहीन हो जाती है, उसी प्रकार अनुशासन के बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ हो जाता है।

3. अनुशासनहीनता के कारण:

आज समाज में अनुशासनहीनता फैलने के अनेक कारण हैं:

क. दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली जो केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर बल देती है और नैतिक शिक्षा का अभाव है।

ख. पारिवारिक वातावरण में नैतिक मूल्यों की कमी और अभिभावकों का व्यस्त जीवन।

ग. पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण और सोशल मीडिया का दुष्प्रभाव।

घ. राजनीति का छात्र जीवन में अनुचित हस्तक्षेप।

4. अनुशासनहीनता दूर करने के उपाय:

अनुशासनहीनता की समस्या का समाधान करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:

क. शिक्षा प्रणाली में नैतिक और व्यावहारिक शिक्षा को अनिवार्य किया जाना चाहिए।

ख. परिवारों में बच्चों को बाल्यकाल से ही सुसंस्कार और श्रेष्ठ आचरण की शिक्षा दी जानी चाहिए।

ग. युवाओं की ऊर्जा को खेलकूद, सामाजिक सेवा एवं रचनात्मक कार्यों में लगाया जाना चाहिए।

घ. शिक्षकों और अभिभावकों को स्वयं आदर्श आचरण प्रस्तुत करना चाहिए।

5. उपसंहार:

अनुशासन किसी भी राष्ट्र की उन्नति और चरित्र-निर्माण की रीढ़ है। यदि देश के युवा अनुशासित रहकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करेंगे, तो भारत पुनः विश्वगुरु के पद पर आसीन हो सकेगा।

(ii) जनसंख्या-विस्फोट–कारण एवं निवारण

1. प्रस्तावना:

वर्तमान समय में भारत तथा संपूर्ण विश्व के समक्ष जनसंख्या-विस्फोट एक विकराल समस्या बन चुका है। सीमित संसाधनों की तुलना में जनसंख्या की तीव्र गति से वृद्धि होना ही जनसंख्या-विस्फोट कहलाता है। यह समस्या देश के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय विकास में सबसे बड़ी बाधक है।

2. जनसंख्या-विस्फोट का अर्थ:

जब किसी देश या क्षेत्र की जनसंख्या उसकी धारण क्षमता और उपलब्ध संसाधनों की तुलना में अत्यधिक तीव्र गति से बढ़ने लगती है, तो इस स्थिति को जनसंख्या-विस्फोट कहते हैं।

3. जनसंख्या वृद्धि के कारण:

क. अशिक्षा एवं अज्ञानता: ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की कमी के कारण लोग छोटा परिवार सुखी परिवार का महत्व नहीं समझ पाते।

ख. सामाजिक मान्यताएँ: पुत्र प्राप्ति की लालसा तथा पुरानी सोच।

ग. कम उम्र में विवाह होना।

घ. स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार: मृत्यु दर में तेजी से गिरावट आई है, परंतु जन्म दर पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो सका है।

4. जनसंख्या वृद्धि के दुष्प्रभाव:

क. बेरोजगारी तथा निर्धनता में अत्यधिक वृद्धि।

ख. खाद्यान्न, आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाओं में कमी।

ग. प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन तथा पर्यावरण प्रदूषण।

घ. देश के प्रति व्यक्ति आय और आर्थिक विकास दर में गिरावट।

5. जनसंख्या नियंत्रण के उपाय:

क. बालिका शिक्षा एवं महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना।

ख. परिवार नियोजन कार्यक्रमों का व्यापक प्रचार-प्रसार करना।

ग. विवाह की न्यूनतम आयु का कड़ाई से पालन कराना।

घ. दो बच्चों के छोटे परिवार को अपनाने वालों को प्रोत्साहन प्रदान करना।

6. उपसंहार:

जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाए बिना देश की प्रगति की कल्पना अधूरी है। यह केवल सरकार का कार्य नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वे संयमित परिवार अपनाकर देश के विकास में अपना योगदान दें।

(iii) पर्यावरण सुरक्षा

1. प्रस्तावना:

पर्यावरण दो शब्दों से मिलकर बना है— 'परि' तथा 'आवरण', जिसका अर्थ है चारों ओर से ढका हुआ आवरण। हमारे आसपास की वायु, जल, मृदा, वनस्पति तथा जीव-जंतु मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते हैं। मानव जीवन और स्वस्थ प्रकृति का संबंध अटूट है। किंतु आधुनिकता और औद्योगिकीकरण की अंधी दौड़ में मानव ने पर्यावरण को अत्यधिक क्षति पहुँचाई है।

2. पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार एवं कारण:

क. वायु प्रदूषण: वाहनों और कारखानों से निकलने वाले धुएँ तथा विषैली गैसों के कारण।

ख. जल प्रदूषण: नदियों में औद्योगिक कचरा, सीवेज और प्लास्टिक फेंकने से।

ग. मृदा प्रदूषण: रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और प्लास्टिक कचरे का अनियंत्रित उपयोग।

घ. ध्वनि प्रदूषण: लाउडस्पीकर, वाहनों के हॉर्न और मशीनों का शोर।

3. पर्यावरण क्षति के दुष्प्रभाव:

पर्यावरण असंतुलन के कारण वैश्विक तापन (ग्लोबल वॉर्मिंग), असमय वर्षा, सूखा, प्राकृतिक आपदाएँ तथा कैंसर व श्वास रोग जैसी गंभीर बीमारियाँ निरंतर बढ़ रही हैं।

4. पर्यावरण सुरक्षा के उपाय:

क. सघन वृक्षारोपण अभियान चलाकर व्यापक स्तर पर पौधे लगाने चाहिए।

ख. सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध तथा पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना।

ग. सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का अधिकतम उपयोग करना।

घ. औद्योगिक अपशिष्ट का उचित निस्तारण करना।

ङ. जन-जागरूकता अभियानों का आयोजन करना।

5. उपसंहार:

"पर्यावरण की रक्षा, जीवन की सुरक्षा" केवल एक नारा नहीं, बल्कि समय की परम आवश्यकता है। यदि आज हमने अपनी प्रकृति की रक्षा नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। प्रत्येक नागरिक को पर्यावरण संरक्षण हेतु संकल्प लेना चाहिए।

(iv) आतंकवाद

1. प्रस्तावना:

आज संपूर्ण विश्व के लिए आतंकवाद एक भयंकर चुनौती और अभिशाप बन चुका है। आतंकवाद का अर्थ है हिंसा, भय और उपद्रव फैलाकर अपने अनुचित लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास करना। यह मानवता का सबसे बड़ा शत्रु है।

2. आतंकवाद का अर्थ:

अपने स्वार्थों, धार्मिक कट्टरता या राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए निरपराध लोगों की हत्या करना, भय का माहौल पैदा करना तथा देश की शांति को भंग करना ही आतंकवाद है।

3. आतंकवाद के मुख्य कारण:

क. धार्मिक कट्टरता तथा वैचारिक अंधभक्ति।

ख. बेरोजगारी, गरीबी और युवाओं को दिग्भ्रमित करना।

ग. सीमापार से घुसपैठ तथा प्रायोजित आतंकवाद।

घ. अशिक्षा तथा नैतिक शिक्षा की कमी।

4. आतंकवाद के दुष्परिणाम:

क. हज़ारों निर्दोष लोगों और सैनिकों की जान जाना।

ख. आर्थिक संपत्ति की भारी हानि तथा विकास कार्यों का अवरुद्ध होना।

ग. समाज में अविश्वास, भय और अस्थिरता का माहौल बनना।

घ. देश की अखंडता और संप्रभुता पर आघात होना।

5. आतंकवाद निवारण के उपाय:

क. आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कानून बनाना तथा उनका त्वरित क्रियान्वयन।

ख. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी देशों द्वारा एकजुट होकर आतंकवाद को वित्तीय मदद देने वाली संस्थाओं पर रोक लगाना।

ग. खुफिया तंत्र और सुरक्षा बलों को आधुनिक तकनीक से लैस करना।

घ. युवाओं को सही शिक्षा और रोजगार देकर उनके भटकाव को रोकना।

6. उपसंहार:

आतंकवाद मानवता के अस्तित्व के लिए सीधा खतरा है। इसे जड़ से समाप्त करने के लिए वैश्विक एकजुटता तथा कठोर नीति की आवश्यकता है। शांति, सौहार्द और भाईचारे से ही आतंकवाद जैसी बुराई पर विजय पाई जा सकती है।